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शुक्रवार, 23 अप्रैल 2010

भूमण्डलीय गांव में भूख का सवाल

एक आर्थिक सर्वसत्ता वाद गोलियों से नहीं वरन अकालों से हत्या करता है।

                                                                              मिशेल चोसडुवस्की , ग्लोबलाईजेशन आफ़ पावर्टी में

आज़ादी के बाद तमाम असफलताओं के बीच जिस एक सफलता को लेकर आश्वस्त हुआ जा सकता था वह यह थी कि भारत में अकाल पर लगभग पूरी तरह नियंत्रण पा लिया गया। अपनी स्पष्ट पूंजीवादी प्रवृति तथा क्षेत्रीय और फ़सली पूर्वाग्रहों के बावज़ूद हरित क्रांति के देश को खाद्यान्नों के मामले में आत्मनिर्भर बनाने के महत्वपूर्ण योगदान को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। इस प्रक्रिया में जहां एक तरफ़ खाद्यान्न उपलब्धता बढ़ी वहीं दूसरी तरफ़ सर्वसुलभ लोक वितरण प्रणाली (पी डी एस) के चलते लोगों को पूरे साल अपने गावों और कस्बों के क़रीब अनाज़ और दूसरी ज़रूरी चीज़ें उचित मूल्य पर उपलब्ध होने से देश के बड़े हिस्से में भूखमरी पर काबू पाया गया। कुछ आज़ादी की लड़ाई के हैंगओवर और कुछ देश के भीतर तथा बाहर पूंजीवाद विरोधी शक्तियों की प्रभावी उपस्थिति के कारण गांव, कृषि और गरीब सरकारों के एज़ेण्डे पर चाहे.अनचाहे हमेशा उपस्थित रहे। राजकीय पूंजीवाद के पब्लिक सेक्टर माडल के तहत कृषि लागतों तथा उत्पादों पर विभिन्न संरक्षण तथा सब्सीडियां उपलब्ध कराई गयीं। हालांकि यहां यह ज़िक्र करना भी बेहद ज़रूरी है कि इनमें से अधिकांश से लाभान्वित होने वाले बड़े किसान ही रहे, भूमि सुधारों को लागू न किये जाने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था में विषमता के आधारों में लगातार विस्तार हुआ और देश की व्यापक कृषि आबादी, जिनमें बड़ा हिस्सा भूमिहीन मज़दूरों के रूप में काम करने वाले दलितों और आदिवासियों का था, निरंतर सीमांत पर ही रही, शहर केन्द्रित औद्योगिक विकास के कारण गावों से बड़ी मात्रा में शहर आये लोगों के चलते हुई जनसंख्या वृद्धि के बरअक्स सुविधाओं में विस्तार न होने के कारण वहां झुग्गी-झोपड़ियों के रूप में ‘मानवता के जीवित नरकों’ में लाखों लोग न्यूनतम सुविधाओं के बिना रहने को मज़बूर हुए और ‘भूखमरी की रेखा’ के रूप में परिभाषित ग़रीबी रेखा के बावज़ूद जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा इस रेखा के नीचे ही रहा (दूसरे शब्दों में एक बड़ी आबादी दो जून के भोजन से भी वंचित रही।)



लेकिन नब्बे के दशक में ‘संरचनात्मक संयोजन’ वाली उदारीकरण के नाम से लागू नव साम्राज्यवादी नीतियों के लागू होने के बाद यह परिदृश्य भी पूरी तरह से बदल गया और इस वंचित तबके की चिन्तायें नीति निर्माताओं के एज़ेण्डे से पूरी तरह बाहर हो गयीं। इन नीतियों के तहत इस सिद्धांत को स्वीकार कर लिया गया कि सारे आर्थिक निर्णय बाज़ार की ताक़तों के भरोसे ही लिये जाने चाहिये। परिणाम यह हुआ कि समाज के वंचित तबके को दी जाने वाली सुविधायें एक-एक करके छीन ली गयीं और कार्यरूप में पहले से ही अनुपस्थित ‘समानता’ का विचार सिद्धांत रूप में भी तिरोहित कर दिया गया। इनके परिणाम भी फौरन ही दिखाई देने लगे। 1991 में इन नीतियों के लागू होने के तुरत बाद रसायनिक खाद की क़ीमतों में 40 फ़ीसदी की वृद्धि हो गयी, जुलाई 1991 में गेहूं और धान की क़ीमतों में 50 प्रतिशत की वृद्धि हुई, रोज़गारों में गिरावट आई, संगठित क्षेत्र की मज़दूरी की दर में कमी आई और भूख से होने वाली मौतों में वृद्धि हो गयी। (देखें चोसुडेवस्की की पूर्वोद्धृत पुस्तक का भारत संबधी अध्याय)



वैसे यह परिघटना केवल भारत तक ही सीमित नहीं थी। दुनिया में जहां.जहां ये नीतियां लागू की गयीं ऐसे ही परिणाम सामने आये। 1990 के पूर्व खाद्यान्नों के मामले में आत्मनिर्भर रवांडा में इन नीतियों के लागू होने के बाद अकाल का शिकार हुआ। इथोपिया, सोमालिया, कीनिया और अन्य सब सहारा देशों में सरंचनात्मक समायोजन (सैप) की इन नीतियों के चलते अकाल और अराजकता के अंतहीन दौर की शुरुआत हुई, लैटिन अमेरिकी देशों में रोज़गारों और वास्तविक मज़दूरी दर में भारी गिरावट आई, वियतनाम की अर्थव्यवस्था तबाह हो गयी और अकाल जैसे हालात पैदा हुए, ब्राजील की ग्रामीण अर्थव्यवस्था तहस-नहस हो गयी, पेरु में तो इन नीतियों की घोषणा के एक दिन में ईंधनों की क़ीमत 2,968 प्रतिशत और रोटी की क़ीमत 1150 प्रतिशत बढ़ गई और औसत वेतन में भारी गिरावट हुई जिसके फलस्वरूप कुपोषण, भुखमरी और बाल मृत्यु दर के आंकड़ों में भयावह इज़ाफ़ा हुआ, बांगलादेश, बोलीविया, पूर्व सोवियत संघ के तमाम संघटकों, पाकिस्तान और बांग्लादेश सहित कोई भी देश इन भयावह परिणामों से सुरक्षित नहीं रह सका। (देखें वही)



भारत में भी इनका प्रभाव पूर्व में उद्धृत आंकड़ो तक ही सीमित नहीं रहा। कृषि अर्थव्यवस्था पर इसके दुष्प्रभावों की सबसे भयावह परिणिति लाखों किसानों की आत्महत्या के रूप में हुई जिससे आज सब परिचित हैं। 1991 के बाद देश के भीतर खाद्यान्न उपलब्धता लगातार घटती चली गई। एनएसएस के आंकड़ो के अनुसार 1991 में प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन 510 ग्राम अनाज़ उपलब्ध था जो 2004 आते आते केवल 463 ग्राम रह गया। आज वर्तमान विश्व औसत 309 किलोग्राम की तुलना में भारत में प्रति व्यक्ति प्रतिवर्ष खाद्यान्न उपलब्धता है मात्र 155 किलोग्राम। इसका स्वाभाविक परिणाम भुख से मरने वाले तथा कुपोषित लोगों की संख्या में भारी वृद्धि के रूप में हमारे सामने आया है। संयुक्त राष्ट्र की आर्थिक एवं सामाजिक समिति की 20 मार्च 2006 को प्रस्तुत रिपोर्ट  में भोजन के अधिकार संबंधी विशेष अधिकारी ज्यां ज़ेगलर ने लिखा है कि पिछले वर्षों में खाद्यान्न उत्पादन की विकास दर जनसंख्या की विकास दर से तेज़ रही है, इसलिये राष्ट्रीय स्तर पर भारत एक अरब से अधिक की अपनी जनसंख्या को भोजन उपलब्ध कराने में सक्षम है। फिर भी इन प्रभावशाली उपलब्धियों के बावज़ूद भारत पारिवारिक स्तर पर खाद्यान्न सुरक्षा उपलब्ध कराने में असफल रहा है। कुपोषण तथा गरीबी का स्तर बहुत ऊंचा है और इस बात के पर्याप्त संकेत हैं कि 1990 के उत्तरार्ध में ग़रीबी और खाद्यान्न असुरक्षा में काफ़ी वृद्धि हुई है। ( पेज़ 5)



इस रिपोर्ट के अनुसार हर साल देश में बीस लाख बच्चे गंभीर कुपोषण और इलाज़ की जा सकने वाली बीमारियों की वज़ह से मर जाते हैं ( यानि इलाज़ की समुचित व्यवस्था न होने से)। बच्चों की संख्या के आधे से अधिक बच्चे गंभीर कुपोषण के शिकार हैं, कुल 47 प्रतिशत का वज़न औसत से कम है और 46 प्रतिशत की लंबाई। यह आंकड़ा दुनिया में सबसे ज़्यादा ऊंचे स्तर का है, ज़्यादातर सब सहारा देशों से भी बुरा। दुनिया के कुल कम वज़न वाले बच्चों में 42 प्रतिशत भारत में है। तीस प्रतिशत बच्चे पैदा होते समय ही कम वज़न के होते हैं जिसका अर्थ है कि उनकी मातायें भी कुपोषित होती हैं। बचपन के आरंभिक दौर में ही बच्चे कुपोषण का शिकार हो जाते हैं और बालिकाओं में यह प्रवृति अपेक्षाकृत ज़्यादा है जो समाज में औरतों के साथ होने वाले भेदभाव का स्पष्ट परिचायक है। रिपोर्ट के अनुसार अस्सी प्रतिशत लड़कियांए कन्या शिशु और औरतें कुपोषण का शिकार हैं।



इस रिपोर्ट के अनुसार बीस करोड़ से अधिक महिलायें, बच्चे और पुरुष दो जून की न्यूनतम आवश्यक भोजन आवश्यकतायें भी पूरी नहीं कर पाते। अपनी आय का सत्तर प्रतिशत भोजन पर ख़र्च करने के बावज़ूद इन्हें भारत सरकार द्वारा आवश्यक निर्धारित 1700 कैलोरी उर्ज़ा भी नहीं जुट पाती, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित 2100 कैलोरी की तो बात ही क्या है। देश में औसत कैलोरी उपभोग भी घटा है लेकिन यह जहां नई आर्थिक नीतियों के बाद उच्च आय वर्ग तथा मध्यम वर्ग की खाद्य आदतों में परिवर्तन का परिचायक है वहीं गरीब जनता की बढ़ती हुई बदहाली का। ग्रामीण क्षेत्रों में पिछले एक दशक में जहां अनाज़ों का उपभोग 2 14 प्रतिशत घट गया उनका कुल कैलोरी उपभोग 1 53 प्रतिशत कम हो गया, जिसका अर्थ है कि वे वास्तव में अलग-अलग तरह की चीज़ें खाने की जगह कम अनाज़ खा रहे हैं। ख़ासतौर पर यह इस तथ्य की रौशनी में और साफ़ हो जाता है कि नब्बे के दशक में खाद्यान्नों की कीमतों में वास्तविक मज़दूरी दर की तुलना में तीव्र वृद्धि हुई है ( वही पेज़ 6)



यह रिपोर्ट इस तथ्य की ओर भी पर्याप्त संकेत करती है कि गरीबी के आंकड़े में जिस कमी का दावा सरकार कर रही है वह दरअसल आंकड़ों की कलाबाजी है। साथ ही नई आर्थिक नीतियों के फलस्वरूप देश के भीतर आर्थिक असमानता की खाई भी और ज़्यादा गहरी हुई है। गावों के भीतर इन नीतियों के लागू होने के बाद ज़मीन की मिल्कियत लगातार कुछ हाथों में सिमटती गई है जिससे भूमिहीन श्रमिकों की संख्या में बढ़ोत्तरी हुई है। देश के भीतर आज ग्रामीण आबादी का 47 प्रतिशत ऐसे ही श्रमिकों का है। शहरी क्षेत्रों में भी श्रम नियमों में ढील के फलस्वरूप भारी संख्या में लोग बेरोज़गार हुए हैं और सुरक्षित रोज़गारों में कमी आई है। अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में चाय की क़ीमतों में आई कमी के चलते साठ हज़ार से अधिक मज़दूर बेरोज़गार हुए हैं और लाखों अन्य की वास्तविक मज़दूरी में कमी होने से उनके परिवारों में भुखमरी जैसी स्थित पैदा हुई है। ऐक्शन एड के एक अध्ययन के मुताबिक मार्च 2002 से फ़रवरी 2003 के बीच केवल चार बागानों में ही 240 मज़दूरों की भूख की वज़ह से मौत हो गई।



इसके पहले 2000.2001 के आंकड़ों के आधार पर अंतर्राष्ट्रीय खाद्य नीति एवम शोध संस्थान द्वारा प्रस्तुत ग्लोबल हंगर इंडेक्स ने भी भारत में भुखमरी की समस्या में लगातार हो रही वृद्धि का खुलासा किया था। इस रिपोर्ट के अनुसार वैश्विक परिदृश्य पर नायक की तरह उभरने के दावों के बीच भारत इस रिर्पोर्ट में शामिल सबसे बदतर स्थिति वाले 88 देशों में 66वें क्रम पर है। यहाँ 2 करोड़ से भी अधिक भूखे तथा कुपोषित लोग रहते हैं और इस तरह यह दुनिया की सबसे बड़ी कुपोषित आबादी का घर है। विकसित पश्चिमी देशों और चीन को तो छोड़िये हमारा क्रम मंगोलिया, म्यानमार, श्रीलंका, कीनिया, सूडान और पाकिस्तान के भी बाद आता है।



स्पष्ट है कि भूमण्डलीकरण के बाद के दौर में तमाम दावों और विकास दर में उछाल के बावज़ूद जीवन की न्यूनतम ज़रूरतों से समाज का एक बड़ा तबका महरूम होता जा रहा है। रिसाव का वह सिद्धांत पूरी तरह से विफल होता दिख रहा है जो ऊपरी संस्तर पर समृद्धि आने के चलते इसके अपने आप निचले संस्तरों तक पहुंचने को स्वयंसिद्ध मान रहा था। बराबरी या सामाजिक न्याय जैसी बातें तो ख़ैर इसके एज़ेण्डे में थी हीं नहीं।



यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि गरीब तबके के बीच खाद्यान्न उपलब्धता में यह कमी राष्ट्रीय स्तर पर अनाज़ की कमी की वज़ह से नहीं है। ज्यां जेगलर का पूर्व में दिया गया उद्धरण इस ओर स्पष्ट संकेत करता है। पहले भी आकलैण्ड स्थित ‘खाद्य एवं विकास नीति संस्थान’ के कार्यकारी निदेशक एरिक हाल्ट गिमनेज द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट ‘विश्व खाद्य संकट : इसके पीछे क्या है में यह साफ़ तौर पर कहा गया था कि लोग भूखे हैं और यह प्राकृतिक नहीं है’। खाद्य संकट की भयावहता का जिक्र करते हुए वह बताते हैं कि 1974 में विकासशील देशों में 5 करोड़ लोग भूखे थे और उस वर्ष आयोजित विश्व खाद्य सम्मेलन ने अगले दस सालों में दुनिया से भूख को पूरी तरह से समाप्त करने का प्रस्ताव पास किया था लेकिन 1996, 2006 और 2008 में यह लगातार बढकर क्रमशः 8.3 करोड, 8.5 करोड़ और 8.62 करोड़ हो गई। यही नहीं, अब तक विकासशील और पिछड़ी अर्थव्यवस्थाओं में ही सिमटी यह बीमारी अमेरिका में भी पहुंच गई है। 2008 में वहाँ भूख के शिकार लोगों की संख्या 35 लाख (12 प्रतिशत) तक पहुंच गयी जबकि इस वर्ष सरकारी ख़जाने से पोषण कार्यक्रमों के लिए कुल बज़ट 60 लाख डालर दिया गया! ऐसे में एशिया और अफ्रीका के हालात कोई भी समझ सकता है।



गिमनेज इसके कारणों की सटीक तलाश करते हुए बताते हैं कि पहली बात तो यह कि इसका जनसंख्या वृद्धि से कोई लेना-देना नहीं है। पिछले वर्षों में हमेशा यह तर्क दिया जाता रहा कि जनसंख्या बढने की तेज़ रफ़्तार के चलते खाद्यान्नों का उत्पादन पिछड़ जाता है लेकिन विगत चार वर्षों में जहाँ जनसंख्या की वार्षिक वृद्धि दर 1.14 प्रतिशत रही वहीं अनाज का उत्पादन 2 फीसदी सालाना की दर से बढ़ा। वर्ल्ड हंगर प्रोग्राम के कार्यकारी निदेशक जोसेट शीरन कहते हैं कि ‘‘ पहले से ज्यादा लोग अब भूखे हैं। अनाज भरा पड़ा है लेकिन लोग खरीद नहीं पा रहे हैं।’’



इसलिए अगर प्रति व्यक्ति खाद्यान्न उपलब्धता में कमी आई है तो फिर कारण अन्य हैं। कारण हैं – जनविरोधी नीतियां, गैरबराबरी आधारित व्यापार संबंध और विकास की गलत अवधारणा। गिमनेज का मानना है कि वर्तमान खाद्यान्न संकट के लिए बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ जिम्मेदार हैं। कृषि में उनके बढ़ते हस्तक्षेप से किसान तबाह हो रहे हैं। ब्रेटनवुड्स समझौते से प्राप्त अकूत ताक़त से इन्होंने कृषि उत्पादों से लेकर खाद, बीज, कीटाणुनाशकों और उत्पादन तकनीकों तक पर कब्ज़ा कर लिया है और इसका प्रयोग कर अपार लाभ कमाया है। बाज़ार से कृषि को जोड़ने का कोई लाभ कम से कम एषिया और अफ्रीका के ग़रीब किसानो को तो नहीं ही मिला है। इसका दूसरा पक्ष है अनाजों की क़ीमतों में भारी वृद्धि। मार्च 2008 में विश्व बाज़ार में गेंहू का दाम पिछले साल की तुलना में 130 फ़ीसदी, सोया का 87 फ़ीसदी चावल का 74 फ़ीसदी और मक्के का 31 फ़ीसदी बढ़ गया। पिछले तीन वर्षों में अनाजों के विश्व मूल्य सूचकांक मंे 83 फ़ीसदी की बढ़ोत्तरी हुई जबकि पिछले तीन महीनों में यह वृद्धि 45 फ़ीसदी की हुई जिससे यह सूचकांक 1845 में अपने निर्माण से अब तक के सबसे ऊँचे स्तर पर पहुंच गया। इसका सीधा परिणाम आम आदमी की क्रय शक्ति के सतत संकुचन रूप में सामने आ रहा है। लोग अनाज के रूप में अपनी सबसे प्राथमिक ज़रूरत को पूरा करने में भी असमर्थ हैं नतीजा भूख से पीड़ित और कुपोषित लोगों की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि।



भूख के इसी सवाल को लेकर और भोजन को संवैधानिक अधिकार घोषित करने की मांग को लेकर अप्रैल 2001 में पीपुल्स यूनियन फ़ार सिविल लिबर्टी की राजस्थान इकाई ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की। याचिका की मूल प्रस्थापना यह थी कि भोजन का अधिकार भारतीय संविधान के आर्टिकल 21 के अंतर्गत आने वाले मूलभूत अधिकार जीवन के अधिकार में ही सन्निहित है। इसके पहले भी 1978 में मेनका गांधी बनाम भारत सरकार तथा 1990 में शान्तिस्टार बिल्डर्स बनाम नारायण खीमालाल टोटामे के मुकदमे में उच्च न्यायालय भोजन के अधिकार को आर्टिकल 21 के तहत मान चुका है। इसके अलावा आर्टिकल 39 ए ( सभी लोगों को जीवन पालने के संदर्भ में पर्याप्त साधन उपलब्ध कराने से संबद्ध), आर्टिकल 47 ( सरकार के प्राथमिक कार्य के रूप में आवश्यक पोषण , जीवन स्तर एवं जन स्वास्थ्य सुधार को चिन्हित करने से संबद्ध तथा आर्टिकल 32(1) ( मूल अधिकारों की उपेक्षा पर उच्च न्यायालय में सीधे अपील करने के अधिकार) के सहारे न्यायालय में भोजन के अधिकार को सुनिश्चित कराने के लिये चली इस क़ानूनी लड़ाई में कई महत्वपूर्ण फ़ैसले सामने आये। (इस याचिका का महत्व इस रूप में भी बहुत बढ़ जाता है कि 2001-2002 के दौरान भारत में जहां एक तरफ़ खाद्यान्न का रिकार्ड उत्पादन हुआ वहीं सूखा प्रभावित इलाक़ों में अकाल जैसी भयावह स्थितियां पैदा हो गयीं। ग़रीब तथा सूखा पीड़ित लोगों को अनाज़ पहुंचाने की जगह अनाज़ के अतिरिक्त स्टाक को बेहद सस्ते दरों पर अमेरिका सहित तमाम देशों को बेच दिया गया और वहां इस अनाज़ का उपयोग जानवरों को खिलाने के लिये किया गया। बाद में इस पूरे मामले में हुए घोटाले का भी पर्दाफ़ाश हुआ जिसके अनुसार अनाज़ की एक बड़ी मात्रा फ़र्ज़ी निर्यात बिलों के ज़रिये काले बाज़ार तक पहुंची। इस मामले की जांच अब तक ज़ारी है।) इस याचिका में राज्य द्वारा भूख राहत उपलब्ध कराने में विफलता को दो विशिष्ट आधारों पर प्रस्तुत किया गया, पहला, लोक वितरण प्रणाली घोर अनदेखी और दूसरा सूखा राहत योजनाओं की अपर्याप्तता। न्यायालय से अपील की गयी कि वह सरकार को फौरन सूखा पीड़ित गांवों में पर्याप्त रोज़गार उपलब्ध कराने, कार्य करने में अक्षम लोगों को सहायता प्रदान करने, लोक वितरण प्रणाली के तहत अनाज़ का क़ोटा बढ़ाने तथा सभी लोगों को सब्सीडाइज़ दरों पर अनाज़ उपलब्ध कराने हेतु निर्देशित करे।.



न्यायालयों के अनुकूल रुख तथा देश भर के मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की सक्रियता के फलस्वरूप कालांतर में ऐसी याचिकाओं में काफ़ी वृद्धि हुई तथा इनके तहत तमाम मांगे सामने आईं। न्यायालय ने अपने 44 से अधिक अंतरिम आदेशों में सरकार को भोजन तथा राहत के लिये बनाये गये तमाम कार्यक्रमों के संबध में अनेक महत्वपूर्ण निर्देश दिये। भूख से होने वाली मौतों तथा इन कार्यक्रमों की असफलता के लिये सरकारों तथा अधिकारियों को सीधे ज़िम्मेदार बनाया गया तथा इन अंतरिम आदेशों के अनुपालन तथा क्रियान्वयन को सुनिश्चित करने के लिये विशेष गैरसरकारी आयुक्त नियुक्त किये गये। वर्तमान में योजना आयोग के पूर्व सचिव डा एन सी सक्सेना इसके आयुक्त हैं और उनकी सहायता के लिये पूर्व आई ए एस और सामाजिक कार्यकर्ता हर्ष मंदर और डा सी पी सुजय की नियुक्ति की गयी है। इन अंतरिम आदेशों में से पहला 28 नवंबर 2001 को ज़ारी किया गया जो आठ खाद्यान्न राहत योजनाओं पर केन्द्रित था, लोक वितरण प्रणाली, अन्त्योदय अन्न योजना, मध्यान्ह भोजन योजना, एकीकृत बाल विकास योजना, अन्नपूर्णा योजना, राष्ट्रीय वृद्धावस्था पेंशन योजना, राष्ट्रीय मातृत्व लाभ योजना और राष्ट्रीय परिवार लाभ योजना। इस अंतरिम योजना द्वारा इन आठ योजनाओं के अंतर्गत मिलने वाले लाभों को अधिकार में परिवर्तित कर दिया गया। अर्थात अब इनके द्वारा मिलने वाली सहायता में कमी या अनदेखी के खिलाफ़ ज़रूरत पड़ने पर न्यायालय में जाया जा सकता था। मध्यान्ह भोजन के संदर्भ में खाद्यान्न देने की जगह पका हुआ खाना देने के निर्देश दिये गये। इसके अलावा लोक वितरण प्रणाली को दुरुस्त बनाये जाने के संबंध में भी कई आदेश दिये गये और ग्राम सभा सहित संबद्ध एजेंसियों तथा अधिकारियों को ज़िम्मेदार बनाया गया।

( न्यायालय के अंतरिम आदेशों तथा अन्य विवरणों पर विस्तार से जानने के लिये देखें राईट टू फ़ूड की वेबसाईट WWW.RIGHTTOFOODINDIA.ORG)



देश के भीतर इन्हीं दबावों और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ज़ारी तमाम रिपोर्टों के कारण हो रही छीछालेदर से बचने के लिये पिछले चुनाव से पहले कांग्रेस नीत यू पी ए ने भोजन के अधिकार को अपने घोषणापत्र में शामिल करते हुए भोजन का अधिकार कानून बनाये जाने का वायदा किया था। वैसे इस बार निर्बाध सत्ता में आने के बाद ऐसे कई क़ानून बनाये गये हैं जो ऊपर से देखने में तो क्रांतिकारी लगते हैं परंतु उनका थोड़ा गहरा अध्ययन सरकार की मंशा को साफ़ कर देता है। उदारीकरण की गति को तीव्रतम संभव स्तर पर ले जाने को कटिबद्ध इस सरकार के लिये ऐसे अधिकार बस जनता के बीच फैलती जा रही बदहाली के बरक्स चेहरा छुपाने और लीपापोती के माध्यम हैं। शिक्षा के अधिकार के बाद हाल में ही जब प्रस्तावित राष्ट्रीय खाद्यान्न सुरक्षा विधेयक की ड्राफ़्ट कापी सामने आई तो यह और स्पष्ट हो गया।



यह प्रस्तावित बिल खाद्यान्न सुरक्षा उपलब्ध कराने की जगह पहले से उपलब्ध सुविधाओं में ही कटौती करने वाला है। भोजन का अधिकार आंदोलन से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता ज्यां द्रेज़ के अनुसार जहां तक भुखमरी समाप्त करने का सवाल है यह प्रस्तावित बिल बिल्कुल अप्रभावी है। यह वर्तमान खाद्य उपलब्धता में कुछ नहीं जोड़ता। गरीबी रेखा के नीचे रहने वालों का आवंटन उस स्तर से भी नीचा हो गया है जिसके लिये न्यायालय ने आदेश दिये थे और बाकियों के लिये यह कोई गारंटी नहीं देता। यह प्रस्तावित बिल अवश्य फिर से बनाया जाना चाहिये। ( देखें फ्रंटलाईन, 23 अप्रैल,2010, पेज़ 11)



इस बिल की सबसे पहली समस्या है कि यह खाद्यान्न सुरक्षा को केवल ग़रीबी रेखा से नीचे वाली आबादी के लिये सीमित करता है। इसकी प्रस्तावना के पहले हिस्से में कहा गया है कि, यह एक ऐसा क़ानून जो भारत की समस्त जनता को खाद्यान्न सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिये क़ानूनी ढांचा उपलब्ध करायेगा जिससे उनकी सक्रिय तथा स्वस्थ जीवनशैली को प्रोत्साहित किया जा सके और वे राष्ट्रनिर्माण में उत्पादक भूमिका निभा सकें।‘ अब इस हिस्से में बात चाहे जितनी अच्छी लगती हो लेकिन खाद्यान्न सुरक्षा जैसी किसी चीज़ को समुचित रूप से परिभाषित न किये जाने और राष्ट्र निर्माण जैसी अमूर्त शब्दावली को रोज़गार सहित किसी भी मूर्त परिभाषा से न जोड़े जाने के कारण इसका कोई सम्यक अर्थ नहीं निकलता, यही नहीं ‘ समस्त नागरिकों’ को खाद्यान्न सुरक्षा उपलब्ध कराये जाने की बात भी अगली ही लाईन में मुगालता साबित होती है जब यह कहा जाता है कि’ यह क़ानून समाज के गरीब, असुरक्षित और भेद्य वर्ग लोक वितरण प्रणाली में सुधार द्वारा प्रति व्यक्ति प्रतिमाह खाद्यान्न की एक न्यूनतम मात्रा उपलब्ध करायेगा। साफ़ है कि इस परिभाषा में वे करोड़ों लोग छूट जायेंगे जो सरकारी ग़रीबी रेखा से ऊपर हैं। अब इन लोगों को खाद्यान्न सुरक्षा का कानूनी कवच खाद्यान्न उपलब्ध कराये बिना कैसे मिलेगा यह कोई भी समझ सकता है। यहां एक झोल यह भी है कि इस प्रस्तावित बिल के अनुसार राज्य सरकारें सिर्फ़ उन लोगों को राहत प्रदान कर सकेंगी जो केन्द्र सरकार द्वारा अति ग़रीब के रूप में चिन्हित हैं। इस प्रकार केरल और तमिलनाडु जैसे राज्य जहां लोकवितरण प्रणाली का सार्वत्रीकरण किया जा चुका है पहले से दी जा रही राहत को वापस लेने पर मज़बूर होंगे। यहां यह बता देना समीचीन होगा कि सक्सेना समिति द्वारा परिभाषित गरीबी रेखा को स्वीकार न किये जाने के पीछे एक तर्क यह था कि इस परिभाषा से ग़रीबों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि हो जायेगी और इतने लोगों को सस्ते क़ीमत पर खाद्यान्न उपलब्ध करा पाना संभव नहीं होगा। इन अति गरीब परिवारों के लिये भी मात्र 25 किलो अनाज़ उपलब्ध कराने की बात है जबकि अब तक उन्हें अंत्योदय योजना के तहत 35 किलो अनाज़ मिल रहा था।



यही नहीं, इस योजना से अतिवाद, नक्सलवाद तथा आतंकवाद पीड़ित इलाकों को अलग रखा गया है और युद्ध, आर्थिक आपातकाल जैसे समयों में स्थगित करने का प्रस्ताव है। इसका मतलब यह हुआ कि अगर मंदी जैसी कोई आर्थिक समस्या आई या फिर युद्ध छिड़ा तो उसके पहले शिकार ग़रीब होंगे जिनसे सस्ते अनाज़ की यह सीमित राहत भी छिन जायेगी साथ ही सबसे गरीब आदिवासी जो नक्सल पीड़ित इलाक़ों में रहते हैं उन तक भी इस योजना का लाभ नहीं पहुंचेगा।



दरअसल, लोकवितरण प्रणाली का सार्वत्रीकरण इस पूरे आंदोलन में एक अत्यंत महत्वपूर्ण मांग रही है। आर्थिक सुधारों के बाद सर्वसुलभ लोक वितरण प्रणाली के बाद जबसे इसे लक्षित ( टारगेटेड) बना दिया गया तभी से इसकी भारी अनदेखी हुई है और एक व्यवस्था के रूप में यह बिल्कुल नाकारा साबित हुई है। भोजन के अधिकार आंदोलन से जुड़े लोगों का तर्क है कि इसे फिर से सभी के लिये सुलभ बनाया जाना चाहिये। ऐसा करने से एक तरफ़ उन लोगों को भी राहत मिलेगी जो गरीबी रेखा कार्ड से किंचित कारणों से महरूम हैं और दूसरी तरफ़ अनाज़ की बढ़ती क़ीमतों पर काबू भी पाया जा सकेगा।



कुल मिलाकर इस कानून का सारा ज़ोर बस लक्षित लोक वितरण प्रणाली के तहत चिन्हित परिवारों को न्यूनतम मदद उपलब्ध करा कर सारी ज़िम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेना है। इस बात को बिल्कुल नज़रअंदाज़ कर दिया गया है कि तथाकथित एपीएल आबादी का भी एक बड़ा हिस्सा कुपोषण और भुखमरी का शिकार है। यही वज़ह है कि इस आंदोलन से जुड़े लोगों ने इस प्रस्तावित क़ानून का तीखा विरोध दर्ज़ कराया जिसके बाद सत्ताधारी दल के भीतर भी इसको लेकर असंतोष स्पष्ट दिखाई दिया। अब यह कहा जा रहा है कि इन कमियों को दूर करके संशोधित ड्राफ़्ट पेश किया जायेगा।





दरअसल, अगर ये सारी आपत्तियां दूर भी कर दी जायें तो भी यह ध्यान में रखा जाना चाहिये कि भोजन के अधिकार में सारी कवायद अनाज़ को दुकानों में उपलब्ध करा देने भर पर है। अगर ऐसा संभव हो भी जाता है तो भी गांवों तथा शहरों में रोज़गारों में लगातार आती कमी, अनाज़ों तथा जीवनावश्यक वस्तुओं की क़ीमतों में अभूतपूर्व कृषि के कार्पोरेटीकरण तथा सरकारी अनदेखी से लगातार अलाभकारी होते जाने और नव साम्राज्यवादी नीतियों के चलते धन और आय के सीमित हाथों में सतत संकेन्द्रण के कारण लोगों की क्रयशक्ति में लगातार कमी आई है। शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी सुविधाओं के निजीकरण ने इन मदों में आम आदमी को अपने बज़ट का बड़ा हिस्सा ख़र्च करने पर मज़बूर किया है। अपनी इस घटती हुई तथा अनिश्चित क्रय शक्ति के चलते आम आदमी अपने तथा अपने बच्चों के लिये आवश्यक पोषण में कटौती करने पर मज़बूर हुआ है। आय में वृद्धि के नियमित प्रयासों के बिना न्यायालय या संविधान द्वारा दिये गये कोई भी अधिकार अंततः काग़ज़ी घोषणा बनकर ही रह जायेगें। नव साम्राज्यवादी शासन व्यवस्था के तहत यह संभव ही नहीं है कि धन और आय के समान वितरण हेतु कोई सार्थक कदम उठाया जा सके क्योंकि असमानता और अतिरेकों का सीमित हाथों में संकेन्द्रण इसकी परिचालक शक्ति है। बहुराष्ट्रीय पूंजी सस्ते श्रम और संसाधनों की तलाश में पूरी दुनिया में घूमती है। अतिरेक के इसी अंध लालसा का परिणाम है विकासशील कहलाने वाली तमाम व्यवस्थाओं में श्रमिकों की तबाही और ज़मीनों तथा प्राकृतिक संसाधनों की भयावह लूट के चलते अभूतपूर्व विस्थापन। मंदियों की नियमित पुनरावृत्ति तथा हिंसक प्रतिरोधों के बावज़ूद मुनाफ़े की इस अदम्य लालसा में कोई कमी नहीं आई है। सेज़ ही नहीं आईपीएल जैसे भ्रष्ट तथा अश्लील कृत्यों में हमने सत्ता वर्ग तथा पूंजीपतियों की जो नाभिनालबद्धता देखी है उसके बरक्स ऐसे किसी क्रांतिकारी परिवर्तन की उम्मीद करना बस दिवास्वप्न ही होगा। अगर इस परिस्थिति को बदलकर इन नीतियों का वैकल्पिक माडल प्रस्तुत कर कोई जनता के बड़े समूह को इस वंचना तथा शोषण से मुक्ति दिला सकता है तो वे हैं वैज्ञानिक समाजवाद की पक्षधर जनता की ताक़तें। अपने बिखराव, टूटफूट तथा संभ्रम से बाहर निकलकर इन्हें आज यह ऐतिहासिक ज़िम्मेदारी निभानी ही होगी।




रविवार, 7 मार्च 2010

भूमण्डलीय ग्राम से बहिष्कृत शहरी ग़रीब



ग़रीबी की बहस हमारे देश में बहुत पुरानी है। औपनिवेशिक ग़ुलामी से मुक्ति के बाद से ही हमारे विकास की तमाम योजनाओं में ग़रीबी हटाने और देश के भीतर व्याप्त सामाजार्थिक विषमता को दूर करने की बातें की जाती रहीं। लोकतांत्रिक प्रणाली और शायद गांधी के ग्राम स्वराज से प्रभावित तत्कालीन कांग्रेसी और समाजवादी राजनेताओं और बुद्धिजीवियों ने गांवो के विकास और वहां की व्यापक ग़रीब आबादी की समस्याओं को केन्द्र में लाने के महती प्रयास किये। उदाहरण के लिये समाजवादी आंदोलन के एक प्रमुख नेता चौधरी चरण सिंह ने अपनी किताब – ‘भारत के आर्थिक दुःस्वप्न – कारण और निवारण ’ में गावों के विकास और वहां रह रही ग़रीब बहुसंख्या के विकास में असफल रहने का आरोप लगाते हुए तत्कालीन कांग्रेस सरकार की कड़ी आलोचना करते हुए विकल्प के रूप में ग्रामीण अर्थव्यवस्था के समग्र विकास के लिये लघु तथा कुटीर उद्योगों के विकास तथा सहकारिता के विस्तार का प्रस्ताव किया था। वहीं वामपंथी आंदोलन भी ग़रीबों के प्रति अपनी स्पष्ट पक्षधरता के बावज़ूद मुख्यतः संगठित क्षेत्र के कामगारों तक ही सीमित रहा। गांव तथा उसकी समस्यायें हिन्दी साहित्य की प्रगतिशील धारा पर भी हावी रहीं और एक दौर तो ऐसा आया था कि लेखक के लिये अपनी जनपक्षधरता साबित करने के लिये ग्रामीण परिवेश पर लिखना आवश्यक माना जाता था, और यह एक हद तक अब भी है।
भारत की विशाल ग्रामीण जनसंख्या तथा कृषि पर इसकी निर्भरता को देखते हुए यह स्वाभाविक भी था। लंबे औपनिवेशिक शासन के दौर में जिस तरह पारम्परिक अर्थव्यवस्था को नष्ट कर दिया था और पूरी दुनिया में हुए शहरीकरण के विपरीत भारत में नगरों से गावों की तरफ़ हुए पलायन ने स्थिति को बद से बद्तर बना दिया था। एक तरफ़ कृषि पर जनसंख्या का दबाव बढ़ा था तो दूसरी तरफ़ इस क्षेत्र की उत्पादकता भी काफ़ी कम थी। इसके साथ भू-वितरण में भयावह असमानता और गावों में पुरोगामी सामाजिक संरचनाओं की उपस्थिति ने गावों को, ख़ासतौर पर, वहां रहने वाली गरीब दलित-पिछड़ी आबादी के लिये नर्क में तब्दील कर दिया था। इसीलिये आज़ादी के बाद जब नेहरुवादी मिश्रित अर्थव्यवस्था के दौर में औद्योगीकरण आरंभ हुआ तो बड़ी संख्या में गावों से शहरों की तरफ़ माईग्रेशन हुआ। नये विकसित हो रहे शहरों में गावों की तलछट पर रह रहे ये लोग बेहतर रोज़गार, समानतापूर्ण व्यवहार और प्रगति के सपनों के साथ आये। महानगरों में व्यापक स्तर पर हो रहे निर्माण कार्यों और नई-नई फ़ैक्ट्रियों के लिये श्रमिकों की यह फ़ौज़ एक आवश्यकता भी थी। अपने बेहद सस्ते श्रम से इस विस्थापित सर्वहारा आबादी ने नये भारत के विकास में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और अब भी निभा रहे हैं। लेकिन विकास की सारी चमक-दमक के बावज़ूद यह तबका अपने बसाये शहरों में भी रहा अजनबी की ही तरह। जीवन की मूलभूत आवश्यकतायें अब भी उसके लिये एक सपना ही रहीं। शहरों की नई-नई बस्तियों में इनके लिये जगह नहीं थी। मज़दूरी के बेहद निचले स्तर और अक्सर आय की अनिश्चितता के कारण यह तबका, और ख़ास तौर पर इस आबादी का वह हिस्सा जो दैनिक वेतनभोगी में तब्दील हुआ या जिसने रिक्शा खींचने, सब्ज़ी बेचने, ठेले-खोमचे लगाने जैसे काम अपनाये, शहर में भी उतना ही बेगाना रहा जितना वह गांव में था, बल्कि शहरों की विशिष्ट संरचना के कारण अक्सर उससे भी ज़्यादा। इसे रहने की जगह मिली शहरों के बाहरी और निचले भागों में बसी झोपड़पट्टियों में और बिज़ली, साफ़ पानी, सैनिटेशन जैसी सुविधायें कभी इन तक पहुंची ही नहीं। शहर के संभ्रांत वर्ग के लिये यह ख़ूबसूरती पर लगे धब्बे की तरह अवांछनीय रहा तो राजनैतिक दलों के लिये एक वोटबैंक के रूप में अपनी अनुपयोगिता के कारण महत्वहीन। वैसे यह नियति तो मंत्र की तरह जाप किये गये ‘ भारत गावों में बसता है’ के बावज़ूद गावों की भी रही ही। यहां यह भी स्पष्ट कर देना आवश्यक होगा कि शहरी और ग्रामीण ग़रीबी आपस में विरोधाभासी या प्रतियोगी नहीं अपितु पूरी तरह से एक दूसरे के पूरक हैं। कृषि अर्थव्यवस्था के निरंतर बदहाल होते जाने के कारण हीं लोग गांव से शहरों की ओर रोज़गार की तलाश में आने पर मज़बूर होते हैं और शहरी ग़रीबों की संख्या बढ़ती चली जाती है।
पिछले दिनों संयुक्त राष्ट्र संघ विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) के सहयोग से भारत सरकार के भवन निर्माण तथा शहरी विकास मंत्रालय द्वारा ज़ारी पहली ‘शहरी ग़रीबी रिपोर्ट’ में प्रस्तुत आंकड़े तथा तथ्य स्थिति की भयावहता ही बयान नहीं करते अपितु इस संदर्भ में फैले तमाम दुष्प्रचारों की कलई भी उतारते हैं।

इस रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि भारत में जिस जनसंख्या वृद्धि को सबसे बड़ी समस्या के रूप में निरूपित किया जाता है शहरों में वह दूसरे एशियाई देशों से कम है। इसके अनुसार पिछले दिनों भारत की संवृद्धि दर एशिया की कुछ सबसे तेज़ विकसित हो रही अर्थव्यवस्थाओं के समकक्ष 8 फ़ीसदी रही लेकिन यहां शहरीकरण की वृद्धि दर 28 फ़ीसदी रही जो एशिया की औसत शहरीकरण वृद्धि दर से कम रही। लेकिन इसके बावज़ूद यहां गरीबों का अनुपात 25 फीसदी है। रिपोर्ट का यह भी मानना है कि पिछले दो दशकों में ग्रामीण और शहरी ग़रीबी के बीच का अंतर कम हुआ है। साथ ही संवृद्धि दर के तेज़ होने का असर शहरी ग़रीबी के कम होने के रूप में नहीं हुआ है। जिसके चलते शहरों में झुग्गी-झोपड़ी में रहने वालों की संख्या बढ़ी है। 2001 की जनगणना के अनुसार भारत के शहरों में झुग्गी-झोपड़ी में रहने वालों की संख्या 42 करोड़ छह लाख है जो कि लगभग स्पेन की कुल जनसंख्या के बराबर है। यही नहीं झुग्गी-झोपड़ी में रहने वालों की संख्या में वृद्धि के बावज़ूद झुग्गी-झोपड़ियों की संख्या में वृद्धि न होने के कारण इनका स्तर और भी बद्तर हुआ है। इन जगहों पर सुविधाओं का भयावह अभाव है। ऐसी लगभग 55 फीसदी बस्तियों में शौचालयों की कोई व्यवस्था नहीं है और ये पानी, बिज़ली, जैसी चीज़ों से भी महरूम हैं। इसके अलावा इसी जनगणना के अनुसार अब भी शहरों में सात लाख अठहत्तर लोगों के पास अपनी कहने को कोई छत नहीं है और ये फुटपाथों , रेल की पटरियों के किनारे, खुले मैदानों तथा सड़कों के इर्द-गिर्द रात बिताने को मज़बूर हैं। इनके लिये रैन बसेरों का इंतज़ाम कितना नाकाफ़ी है यह देखने के लिये दिल्ली का उदाहरण काफ़ी होगा जहां लगभग एक लाख निराश्रितों के लिये बस 2937 लोगों की क्षमता वाले 14 रैन बसेरे हैं यानि सिर्फ़ तीन फीसदी लोगों के लिये शेष या तो खुले आसमान के नीचे सोते हैं या फिर निजी ठेकेदारों के रहमोकरम पर रिपोर्ट में एक अध्ययन का भी ज़िक्र है जिसके अनुसार महानगरों के निराश्रित मर्द, औरत और बच्चे अक्सर पुलिस के दुर्व्यवहार के शिकार होते हैं। रईसजादों द्वारा इनको कुचले जाने के किस्से तो आये दिन अख़बारों में आते ही रहते हैं।

दरअसल, जैसा कि पूर्व में उद्धृत रिपोर्ट से स्पष्ट है, नई आर्थिक नीतियों के लागू होने के बाद से यह समस्या और गंभीर हुई है। श्रम क़ानूनों में ढील, सरकारी संस्थानों का निजीकरण और कल्याणकारी सरकारी ख़र्चों की कमी ने इस बदहाली को नये आयाम दे दिये हैं। रिसाव के जिस सिद्धांत के तहत माना गया था कि उच्च संवृद्धि दर से अपनेआप व्यापक ग़रीब आबादी का जीवन स्तर सुधरेगा, वह पिछले बीस सालों में कहीं लागू होता नहीं दिखता। इस प्रक्रिया में अगर कुछ बढ़ा है तो वह है आर्थिक वैषम्य। ऐसे में इस रिपोर्ट में मूलभूत सुविधाओं के आवंटन में बराबरी, छोटे तथा मध्य आकार के कस्बों को विशेष सहायता, विकेंद्रीकरण हेतु संविधान में सुधार, गरीब लोगों तथा झुग्गी-झोपड़ियों के लिये सब्सीडियों का विस्तार, सैनिटेशन तथा पेयजल उपलब्ध कराने के प्रयास जैसे जो उपाय सुझाये गये हैं उनके लागू हो पाने की उम्मीद शायद ही किसी को हो।

रविवार, 10 जनवरी 2010

यह रेखा ग़रीबों की गर्दन से गुज़रती है...



आजकल दिल्ली में है जे़रे बहस ये मुद्दुआ


उन्नीसवीं सदी के प्रसिद्ध समाजशास्त्री हरबर्ट स्पेंसर ने शायद सबसे पहली बार आधिकारिक तौर पर सामाजिक परिक्षेत्र में योग्यतम की उत्तरजीविता के मुहावरे का प्रयोग किया था। उनका मानना था कि ‘‘गरीब लोग आलसी होते हैं,काम नहीं करना चाहते और जो काम नहीं करना चाहते उन्हें खाने का भी कोई अधिकार नहीं है।‘‘ इसी आधार पर उनका तर्क था कि ‘‘गरीबी उन्मूलन जैसी योजनाओं के जरिये सरकार का हस्तक्षेप न्यूनतम होना चाहिये।‘‘ दरअसल, स्पेन्सर पूंजीवादी दुनिया के वैचारिक प्रतिनिधि के रूप में सामने आते हैं। बीसवीं सदी के आरंभिक वर्षों में रूस सहित कई देशों में समाजवादी शासन व्यवस्थाओं की स्थापना और पूरी दुनिया में समाजवाद की एक विचार के रूप में प्रतिष्ठा तथा तद्जन्य सामाजिक- राजनैतिक आलोड़नों के बरअक्स पूंजीवाद के लिये मानवीय चेहरा अपनाना आवश्यक हो गया था। फिर भी तीस के दशक की महामंदी के दौर में क्लासिकल अर्थव्यवस्था के ‘लैसेज फेयर‘े ( सरकार के हस्तक्षेप से पूर्णतः मुक्त बाजार आधारित अर्थव्यवस्था) सिद्धांत को तिलांजलि देकर कीन्स की राज्य हस्तक्षेप पर आधारित नीतियों का लागू किया जाना पूरी दुनिया की पूँजीवादी व्यवस्थाओं की मजबूरियों को प्रदर्शित करता था न कि उनकी प्रतिबद्धताओं और पक्षधरताओं में किसी परिवर्तन को। मंदी से उबरने के साथ ही जब कालांतर में पूंजीवाद ने खुद को फिर मजबूत किया तो इस सैद्धांतिक अवस्थिति में भी परिवर्तन हुआ और पाल ए सैमुएल्सन जैसे सिद्धांतकारों ने कीन्सीय तथा क्लासिकीय सिद्धांतो के घालमेल से नवक्लासिकीय सिंथेसिस की जिस अवधारणा को जन्म दिया था उसकी तार्किक परिणिति नव उदारवादी सिद्धांतों की पुनसर््थापना के रूप में होनी तय थी। भारत सहित दुनिया के अधिकांश हिस्से में मिश्रित अर्थव्यवस्था की नीति के तहत कल्याणकारी राज्य की जो अवधारणा प्रस्तुत की गई थी वह नब्बे के दशक में सोवियत संघ के विघटन के बाद लागू संरचनात्मक संयोजन वाली नई आर्थिक नीतियों से प्रतिस्थापित कर दी गयी। इन नीतियों के तहत गरीबों तथा वंचितों को दी जाने वाली तमाम सुविधायें धीरे-धीरे छीनी जाने लगीं। पश्चिमी देशों में यह प्रक्रिया पहले ही शुरु हो चुकी थी। उदाहरण के लिये मार्ग्रेट थैचर के शासनकाल में 1980 में पेंशन निर्धारण के लिये औसत आय का आधार समाप्त कर दिया गया और 1987-88 में बच्चों पर मिलने वाली सुविधायें। इसके परिणाम भी उसी दौर में आने लगे थे - 1079 से 1997 के बीच ब्रिटेन में अमीरों और गरीबों के बीच की खाई अभूतपूर्व रूप से बढ गयी!


भारत में भी इन नीतियों का प्रसार निश्चित तौर पर सरकारों की बदली प्रतिबद्धताओं का स्पष्ट प्रतिबिंबन था। इनके विस्तार में जाना तो इस लेख की विषयवस्तु के मद्देनजर विषयांतर होगा, लेकिन यह तो स्पष्ट है ही अपने आरंभिक दौर में कुछ तो मुक्ति आंदोलन और नई-नई मिली आजादी के हैंगओवर और कुछ देश-दुनिया में जारी आँदोलनों के दबाव में पूँजीवादी नीतियों को भी समाजवाद के मुलम्मे में पेश किये जाने का दौर नब्बे के दशक के आरंभ में ही इतिहास बन गया और साठ के दशक में अमेरिका में विकसित ‘रिसाव के सिद्धांत‘ को आधिकारिक तौर पर स्वीकार कर पूरा जोर निजी पूंजी के विकास पर लगाया गया। आय तथा वितरण की असमानता में विस्तार अब कोई चिंता का विषय नहीं रह गया बल्कि इसे संवृद्धि के लिये आवश्यक मान कर स्वीकार किया गया और गरीबों तथा जरूरतमंदों की सहायता के लिये दी जाने वाली राशि को ‘संसाधनों की बर्बादी‘ के रूप में निरूपित किया गया। ऐसे में यह अनपेक्षित नहीं था कि पिछले दिनों जब भारत में गरीबी रेखा पर बहस के दौरान तमाम अर्थशास्त्रियों ने वास्तविक रूप से गरीबों की संख्या आधिकारिक आकड़ों से कई गुना बताई तो तर्क दिये गये कि ‘‘अगर गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों की संख्या इतनी बढ़ जायेगी तो उनके कल्याण के लिये लागू योजनाओं में धन का अतिरिक्त आवण्टन करना होगा जिसके लिये सरकार के पास पैसा नहीं है (सक्सेना समिति को लिखे गये योजना आयोग के पत्र से)!‘‘ इसी सरकार के पास पिछले वर्ष पूँजीपतियों को मंदी से निपटने के नाम पर विभिन्न सहायता और छूट के रूप में करोड़ों रुपये देने के लिये पर्याप्त धन था!


गरीबी रेखा के रूप में गरीबी को निर्धारित करने का प्रस्ताव सबसे पहले 1957 में इण्डियन लेबर कांफ्रेंस के दौरान दिया गया था। उसी के बाद योजना आयोग ने एक वर्किंग ग्रुप बनाया था जिसने भारत के लिये ‘आवश्यक कैलोरी उपभोग‘ की अवधारणा पर आधारित गरीबी रेखा का प्रस्ताव किया। इसके तहत उस समय बीस रुपये प्रतिमाह को विभाजक रेखा के रूप में स्वीकृत किया गया। 1979 में योजना आयोग ने ही गरीबी को पुनर्परिभाषित करने करने के लिये एक टास्क फोर्स का गठन किया गया। लेकिन इसने भी मामूली फेरबदल के साथ मूलतः ‘आवश्यक कैलोरी उपभोग‘ की अवधारणा को ही आधार बनाया। 1973 की कीमतों को आधार बनाते हुए इसने ग्रामीण क्षेत्रों के लिये 49 रुपये प्रतिव्यक्ति प्रतिमाह तथा शहरी क्षेत्रों के लिये 57 रुपये की विभाजक रेखा तय की। मुद्रास्फीति के अनुसार इसमें समय-समय पर समायोजन किया गया और वर्तमान में यह शहरी क्षेत्रों के लिये 559 रुपये और गाँवों के लिये 368 रुपये है। योजना आयोग गरीबी रेखा के निर्धारण के लिये राष्ट्रीय तथा राज्य स्तर पर एन एस एस ओ के उपभोक्ता व्यय सर्वेक्षणों के आधार पर विभाजक रेखा तय करता है। 2004-2005 के लिये प्रोफेसर लकड़वाला की अध्यक्षता में 1997 में बने एक्स्पर्ट ग्रुप द्वारा की गयी अनुशंसा के आधार पर जो आंकड़े निकाले गये थे उनके अनुसार देश में उस समय गरीबों की कुल संख्या 28।3 प्रतिशत थी।


‘सेन्टर फार पालिसी आल्टरनेटिव‘ की एक रिपोर्ट में मोहन गुरुस्वामी और रोनाल्ड जोसेफ एब्राहम इस गरीबी रेखा को ‘भूखमरी रेखा‘ कहते हैं। कारण साफ है। इसके निर्धारण का इकलौता आधार आवश्यक कैलोरी उपभोग है। यानि इसके अनुसार वह आदमी गरीब नहीं है जो येन केन प्रकारेण दो जून अपना पेट भर ले और अगले दिन काम करने के लिये जिन्दा रहे। युनिसेफ स्वस्थ शरीर के लिये प्रोटीन, वसा, लवण, लौह और विटामिन जैसे तमाम अन्य तत्वों को जरूरी बताता है जिसके अभाव में मनुष्य कुपोषित रह जाता है तथा उसकी बौद्धिक व शारीरिक क्षमतायें प्रभावित होती हैं। लेकिन गरीबी रेखा तो केवल जिन्दा रहने के लिये जरूरी भोजन से आगे नहीं बढ़ती। इसके अलावा शायद व्यवस्था यह मानकर चलती है कि आबादी के इस हिस्से का स्वास्थ्य, शिक्षा, मनोरंजन, घर, साफ पानी, सैनिटेशन जैसी तमाम मूलभूत सुविधाओं पर तो कोई हक है ही नहीं । वैसे तो जिस ‘आवश्यक कैलोरी उपभोग‘ की बात की जाती है ( शहरों में 2100 तथा गांवों में 2400 कैलोरी प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन) वह भी दिन भर शारीरिक श्रम करने वालों के लिहाज से अपर्याप्त है। ‘इण्डियन काउंसिल आफ मेडिकल रिसर्च‘ के अनुसार भारी काम में लगे हुए पुरुषों को 3800 कैलोरी तथा महिलाओं को प्रतिदिन 2925 कैलोरी की आवश्यकता है। यही नहीं, अनाजों की कीमतों में तुलनात्मक वृद्धि व उपलब्धता में कमी, स्वास्थ्य तथा शिक्षा जैसे क्षेत्रों में सरकार की घटती भागीदारी, विस्थापन तथा तमाम ऐसी ही दूसरी परिघटनाओं की रोशनी में यह रेखा आर्थिक स्थिति के आधार पर समाज को जिन दो हिस्सों में बांटती है उसमें ऊपरी हिस्से के निचले आधारों में एक बहुत बड़ी आबादी भयावह गरीबी और वंचना का जीवन जीने के लिये मजबूर है और तमाम सरकारी योजनायें उसको लाभार्थियों की श्रेणी से उसके आधिकारिक तौर पर गरीब न होने के कारण बाहर कर देती है।


इसी वजह से भारत सरकार के गरीबी के आधिकारिक आंकड़े हमेशा से विवाद में रहे हैं। विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय तथा दूसरी स्वतंत्र संस्थाओं के अध्ययनों में देश में वास्तविक गरीबों की संख्या के आंकड़े सरकारी आंकड़ों से कहीं ज्यादा रहे हैं। अभी हाल ही में विश्व बैंक की ‘ग्लोबल इकोनामिक प्रास्पेक्ट्स फार 2009‘ नाम से जारी रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि 2015 में भारत की एक तिहाई आबादी बेहद गरीबी ( 1.25 डालर यानि लगभग 60 रुपये प्रतिदिन प्रतिव्यक्ति से भी कम आय) में गुजारा कर रही होगी। इस रिपोर्ट के अनुसार यह स्थिति सब सहारा देशों को छोड़कर पूरी दुनिया में सबसे बद्तर होगी। यही नहीं, यह रिपोर्ट भारत की तुलनात्मक स्थिति के लगातार बद्तर होते जाने की ओर भी इशारा करती है। इसके अनुसार जहां 1990 में भारत की स्थिति चीन से बेहतर थी वहीं 2005 में जहां चीन में गरीबों का प्रतिशत 15.9 रह गया, भारत में यह 41.6 थी।
इन्हीं विसंगतियों के मद्देनजर पिछले दिनों सरकार ने गरीबी रेखा के पुनर्निर्धारण के लिये जो नयी कवायदें शुरु कीं उन्होंने इस जिन्न को बोतल से बाहर निकाल दिया है। सबसे पहले आई असंगठित क्षेत्र के उद्यमों के लिये गठित राष्ट्रीय आयोग (अर्जुन सेनगुप्ता समिति) की रिपोर्ट ने देश में तहलका ही मचा दिया था। इसके अनुसार देश की 77 फीसदी आबादी 20 रुपये रोज से कम में गुजारा करती है। दो अंको वाली संवृद्धि दर और शाईनिंग इण्डिया के दौर में यह आंकड़ा सच्चाई के घिनौने चेहरे से नकाब खींचकर उतार देने वाला था। समिति ने असंगठित क्षेत्र के लिये दी जाने वाली सुविधायें इस आबादी तक पहुंचाने की सिफारिश की थी। लेकिन बात यहीं पर खत्म नहीं हुई। भारत सरकार द्वारा गरीबी रेखा के निर्धारण के लिये मानक तैयार करने के लिये ग्रामीण विकास मंत्रालय के पूर्व सचिव श्री एन के सक्सेना की अध्यक्षता में जो समिति बनाई थी उसके आंकड़े और भी चैंकाने वाले थे। इस समिति ने अगस्त-2009 में पेश अपनी रिपोर्ट में गरीबी रेखा से ऊपर रहने वालों के विभाजन के लिये पांच मानक सुझाये। जिसमें शहरी क्षेत्रों में न्यूनतम 1000 रुपये तथा ग्रामीण क्षेत्रों में न्यूनतम 700 रुपयों का उपभोग या पक्के घर या दो पहिया वाहन या मशीनीकृत कृषि उपकरणों जैसे ट्रैक्टर या जिले की औसत प्रतिव्यक्ति भू संपति का स्वामित्व। इस आधार पर समिति पर गरीबी रेखा के निर्धारण पर समिति ने पाया कि भारत की ग्रामीण जनसंख्या का कम से कम पचास फीसदी इसके नीचे जीवनयापन कर रहा है। सक्सेना समिति ने खाद्य मंत्रालय के आंकड़ों का भी जिक्र किया है जिसके अनुसार गांवों में 10।5 करोड़ बीपीएल राशन कार्ड हैं। अगर इसी को आधार बनाया जाय तो भी गांवों में गरीबी रेखा से नीचे रह रहे लोगों की संख्या लगभग 53 करोड़ ठहरती है जो कुल आबादी का लगभग पचास फीसदी है।


समिति का यह भी मानना कि जहां आधिकारिक तौर पर 1973-74 से 2004-05 के बीच गरीबी 56 प्रतिशत से घटकर 28 प्रतिशत हो गयी वहीं गरीबों की वास्तविक संख्या में कोई कमी नहीं आयी। अपने निष्कर्ष में वह कहते हैं कि ‘गरीब परिवारों की एक बहुत बड़ी संख्या गरीबी उन्मूलन के कार्यक्रमों से बहिष्कृत रही है और ये निश्चित रूप से सुदूर क्षेत्रों में रहने वाले बेजुबान लोग ही होंगे।‘लेकिन सरकार ने इस समिति की अनुशंसाओं को लागू करने से साफ इंकार कर दिया। योजना आयोग द्वारा समिति को लिखे गये पत्र का जिक्र पहले ही किया जा चुका है। ग्रामीण विकास मंत्री श्री सी पी जोशी ने इस पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा था कि ‘सक्सेना समिति को गरीबों की गणना करने के लिये नहीं सिर्फ गरीबों की पहचान करने के लिये नयी प्रणाली विकसित करने के लिये कहा गया था।‘
इस दौरान योजना आयोग के एक सदस्य अभिजीत सेन ने तर्क दिया था कि गरीबों की गणना आवश्यक कैलोरी उपभोग की जगह आय के आधार की जानी जानी चाहिये। उनका यह भी मानना था कि मौजूदा मानकों के आधार पर गणना से शहरी क्षेत्रों में गरीबों की वास्तविक संख्या 64 फीसदी तथा गांवों में अस्सी फीसदी है।


इस संदर्भ में केन्द्र सरकार द्वारा प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार समिति के तत्कालीन अध्यक्ष सुरेश तेंदुलकर समिति को गरीबों की संख्या की गणना की जिम्मेदारी दी गयी थी। इस आयोग की पिछले महीने प्रस्तुत रिपोर्ट एक तरफ तो आवश्यक कैलोरी उपभोग वाली परिभाषा से आगे बढ़ने की कोशिश करती है तो दूसरी तरफ आंकड़ों में गरीबी कम रखने का दबाव भी इस पर साफ दिखाई देता है।
तेंदुलकर समिति के अनुसार 2004-05 में भारत की कुल आबादी का 37।2 फीसदी हिस्सा गरीबी रेखा के नीचे है। यह आंकड़ा योजना आयोग के 27.5 फीसदी से तो अधिक है लेकिन अभिजित सेन कमेटी या ऐसे अन्य अध्ययनों के निष्कर्षों से कम। हालांकि योजना आयोग से इसकी सीधी तुलना मानकों के परिवर्तन के कारण संभव नहीं है। आयोग के अनुसार बिहार तथा उड़ीसा में ग्रामीण गरीबी का प्रतिशत क्रमशः 55.7 तथा 60.8 है, उल्लेखनीय है कि सेन कमेटी के अनुसार इन दोनों प्रदेशों में ग्रामीण गरीबी का प्रतिशत 80 से अधिक था। आयोग ने ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी निर्धारण के लिये सीमारेखा 356.30 से बढ़ाकर 444.68 रुपये और शहरी क्षेत्रों में 538.60 रुपये से बढ़ाकर 578.80 की है। इस आधार पर दैनिक उपभोग की राशि शहरों में लगभग 19 रुपये और गांवों में लगभग 15 रुपये ठहरती है जो विश्वबैंक द्वारा तय की गयी अंतर्राष्ट्रीय गरीबी रेखा (20 रुपये) से कम है।


समिति ने आवश्यक कैलोरी वाले मानक को पूरी तरह समाप्त कर दिया है। इसकी जगह पर समिति का जोर शिक्षा, स्वास्थ्य तथा अन्य क्षेत्रों में होने वाले खर्चों को भोजन के साथ समायोजित कर ग्रामीण तथा शहरी विभाजन को समाप्त कर क्रय शक्ति समानता पर आधारित एक अखिल भारतीय गरीबी रेखा के निर्धारण पर है। यह अवधारणा के रूप में 1973-74 वाले मानकों से निश्चित रूप से बेहतर हैं जिसमें शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी तमाम जरूरतों को सरकार द्वारा मुफ्त उपलब्ध कराये जाने की मान्यता पर आधारित थे। लेकिन आवश्यक कैलोरी उपभोग वाली अवधारणा को पूरी तरह से खत्म किया जाना, खासतौर से तब, जबकि पिछले दिनों अंतर्राष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान के अंतर्राष्ट्रीय भूख सूचकांक में भारत को 66 वें पायदान पर रखा गया है और खाद्यान्न संकट, खाद्यान्नों की कीमतों में अभूतपूर्व तेजी तथा कुपोषण की समस्या लगातार गहराती गयी है, इसकी नीयत पर सवाल उठाता ही है। इस दौर में पेश की गयी इस अवधारणा का अर्थ होगा कि गरीबी रेखा से वास्तविक गरीबों का बहुलांश बाहर रह जायेगा। यहां पर यह भी बता देना आवश्यक है कि कई हालिया अध्ययन बताते हैं कि सबसे गरीब दस फीसदी लोगों का कैलोरी उपभोग सबसे अमीर दस फीसदी लोगों के कैलोरी उपभोग से कम है जबकि यह तो सर्वज्ञात तथ्य है कि जहां अमीर आदमी तमाम दूसरी पोषक चीजों का उपभोग करता है वहीं गरीबों का वह तबका अपनी लगभग पूरी आय भोजन पर ही खर्च करता है।


दरअसल मानकों के न्यायपूर्ण निर्धारण के लिये जहां एक तरफ आवश्यक कैलोरी उपभोग की अवधारणा को इण्डियन काउंसिल आफ मेडिकल रिसर्च की पूर्व में उद्धृत अनुशंसा के आधार पर और ऊंचे स्तर पर ले जाते हुए इसमें पोषण के लिये आवश्यक अन्य तत्वों के साथ समायोजित किया जाना चाहिये था और इसके साथ एक सम्मानजनक जीवनस्तर के लिये आवश्यक शिक्षा, स्वास्थ्य, मनोरंजन, घर, पीने का साफ पानी, सैनिटेशन जैसी तमाम चीजों से जोड़कर देखा जाना चाहिये था। इस संदर्भ में सेंटर फार आल्टरनेटिव पालिसी रिसर्च द्वारा मूलभूत आवश्यकताओं की कीमत पर आधारित गरीबी की विभाजक रेखा ज्यादा न्यायपूर्ण लगती है जिसमें 2004-2005 के लिये अखिल भारतीय स्तर पर 840 रुपये प्रतिव्यक्ति प्रतिमाह का निर्धारण किया गया है । इसके साथ ही एन के सक्सेना द्वारा सुझाये गये मानक भी सच के ज्यादा करीब हैं।


साथ ही तेंदुलकर समिति गरीबी निर्धारण के आधारों में विस्तार के दावे के बावजूद गरीबी की बहुआयामी प्रकृति के बारे में कोई पहल नहीं करती। पहले की तमाम रिपोर्टों की तरह यह भी गरीबी को महज आर्थिक समस्या की तरह निरूपित करती है। इसके सामाजिक-सांस्कृतिक आयामों को समझे बिना इसे जड़मूल से समाप्त किया ही नहीं जा सकता। जाति, लिंग, शारीरिक अक्षमता, क्षेत्रीय असंतुलन जैसे तमाम कारक भारत में गरीबी को निर्धारित करते हैं।


दरअसल वस्तुस्थिति यह है कि गरीबी के इन तकनीकी निर्धारणों के मूल में उस बड़ी हकीकत पर परदा डालना है कि इन सब कवायदों के मूल में भयावह तरीके से विस्तारित होती आर्थिक असमानता की खाई के सवाल को दबाये रखना है। नई आर्थिक नीतियों से लाभान्वित होने वाले छोटे से तबके के प्रति अपनी स्पष्ट प्रतिबद्धता और सामाजार्थिक समानता के उद्देश्य को पूर्ण तिलांजलि दे चुकीं शासन व्यवस्थाओं के लिये गरीबी उन्मूलन की योजनायें एक तरफ तो जनाक्रोशों को दबाये रखने वाले ‘सेफ्टी वाल्व‘ हैं तो दूसरी तरफ हर पांच साल पर होने वाले चुनावों के मद्देनजर एक ‘आवश्यक फिजूलखर्ची‘। ऐसे में यह स्वाभाविक ही है कि गरीबी को एक असमाधेय समस्या के रूप में निरूपित कर नरेगा जैसी कुछेक योजनाओं द्वारा थोड़ा-बहुत लाभ एक सीमित आबादी तक पहुंचाया जाता है लेकिन भूमि सुधार, आय तथा व्यय पर करों द्वारा नियंत्रण तथा पुनर्वितरण जैसे बड़े और समस्या के जड़ पर प्रहार करने वाले उपाय सरकारों की कार्यसूची में शामिल ही नहीं होते। इस नई कवायद के पीछे भी येन केन प्रकारेण आधिकारिक रूप से गरीबों की संख्या को न्यूनतम स्तर पर रखना है जिससे कि प्रस्तावित राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून में सब्सीडियों पर नियंत्रण रखा जा सके। खाद्य एवं लोक वितरण मंत्रालय द्वारा राज्य सरकारों को प्रेषित इस कानून के अवधारणा पत्र में साफ किया गया है कि गरीबी रेखा के नीचे रहने वालों की संख्या के निर्धारण का अधिकार अनन्य रूप से केन्द्र सरकारों के पास ही रहेगा। राज्य सरकारों को टारगेटेड बीपीएल के अंतर्गत लाभान्वित होने वाले परिवारों की संख्या पर नियंत्रण रखने की ताकीद की गयी है। यह कानून इस सूची की सालाना समीक्षा को आवश्यक बना देगा। अपनी ड्राफ्ट गाइडलाइन में यह पहले ही चेता चुका था कि ‘अगर राज्य सरकारों पर बीपीएल सूची बनाने का काम छोड़ दिया गया तो भारत में गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों की संख्या कुल ग्रामीण आबादी की 80-85 फीसदी तक हो जाने की आशंका है।‘ साफ है कि ऐसी नीयत के साथ बनने वाले खाद्य सुरक्षा कानून का हश्र भी कुछ दिनों पहले बने शिक्षा के अधिकार कानून जैसा ही होना है।


गरीबी रेखा के रूप में आय या आवश्यक कैलोरी उपभोग के किसी एक खास आंकड़े को विभाजक बना देना रोज बदलती कीमतों और रोजगार की अनिश्चितता की रोशनी में दरअसल एक भद्दा मजाक है। जब दाल 90 रुपये, चावल 20 रुपये, आटा 17 रुपये किलो बिक रहा है, डाक्टरों की फीस आसमान छू रही है, दवायें इतनी मंहगी हैं और बसों तथा रेलों से कार्यस्थल तक पहुंचने में ही 10-15 रुपये खर्च हो जाते हैं तो दिल्ली में बैठकर यह तय करना कि 15 या 20 रुपये रोज में एक आदमी अपना खर्च चला सकता है और उससे अधिक पाने वालों को सहायता देने की कोई जरूरत नहीं है उस सरकार की प्रतिबद्धता को स्पष्ट कर देता है जो पिछले साल पिछले बजट में पूंजीपतियों को सहायता और करों में छूट के रूप में 4,18,095 करोड़ रुपयों की सौगात दे चुकी है।

रविवार, 16 अगस्त 2009

रोशन कंगूरों की स्याह बुनियाद


विकास क्या है और इसके वास्तविक पैमाने कौन से होने चाहिए इसे लेकर एक सनातन बहस चलती ही रही है। लेकिन समाजवादी रूस के पतन के बाद जैसे-जैसे दुनिया भर में नवउदारवादी नीतियों का वर्चस्व स्थापित होता गया है विकास का अर्थ आर्थिक वृद्धि तक सीमित होता गया है। एक आम समझ यह बनी है कि अगर पूँजी की उत्पादकता लगातार बढ़ रही है और उद्योगपतियों की समृद्धि का स्तर सतत् ऊँचा उठ रहा है तो अर्थव्यवस्था का विकास हो रहा है। रहा सवाल आम लोगों और ग़रीब बहुसंख्या का तो उन्हें ‘टपक बूंद (ट्रिकल डाऊन) सिद्धांत’ के भरोसे छोड़ दिया जाता है जिसके अंर्तगत यह मान्यता दी जाती है कि दीर्घकाल में समृद्धि की कुछ बूंदे रिस-रिस कर निचले संस्तरों तक भी पहुंचेंगी। समानता का विचार तो ख़ैर यहाँ सिरे से ही गायब होता है लेकिन समृद्धि के आधारों के क्रमिक विस्तार के इस दीर्घकाल की अवधि होती कितनी है यह भी किसी को पता नहीं होता। इस सिद्धांत की अर्थषास्त्रीय व्याख्या तो एक अलग मसला है लेकिन अगर इसे अनुभव के आधार पर कसें तो भी इसमें तमाम झोल दिखाई देते हैं। विगत दो दशकों से चल रही नवउदारवादी नीतियों के फलस्वरूप उद्योगपतियों की आर्थिक समृद्धि के महासागर की बूंदे उस सबसे निचले संस्तर तक नहीं पहुंची हैं बल्कि वंचित जन का जीवनस्तर कई माामलों में तो और भी बदतर हुआ है।


अभी हाल ही में विश्व बाज़ार के बेताज बाद्शाह अमेरिका में ही स्थित दो अलग-अलग संस्थानों की रिर्पोटें सच के इस बदशक्ल चेहरे को बेपर्दा करती हैं। यहाँ यह स्पष्ट कर देना भी ज़रूरी है कि इसमें दुनिया भर के बाज़ारों में जारी मंदी का क़िस्सा शामिल नहीं है ; इन दोनो रिर्पोटों का अध्ययन काल इस परिघटना के सतह पर आने से पहले का है।


इनमें पहली रिपोर्ट आॅकलैण्ड स्थित ‘खाद्य एवं विकास नीति संस्थान’ के कार्यकारी निदेषक एरिक हाॅल्ट गिमनेज द्वारा प्रस्तुत ‘विश्व खाद्य संकटः इसके पीछे क्या है और इस बारे में हम क्या कर सकते हैं’ विश्व भर में व्याप्त खाद्य संकट के कारणों तथा इसके हल के लिए आवश्यक नीतिगत प्रयासों की पड़ताल करती है तो ‘अंर्तराष्ट्रीय खाद्य नीति एवं शोध संस्थान द्वारा प्रस्तुत दूसरी रिर्पोर्ट दुनिया भर के देषों के लिए बनाए गये ‘भूमण्डलीय भूख सूचकांक’ के जरिये भूख और कुपोषण की भयावह तस्वीर पेष करती है।


गिमनेज अपनी रिपोर्ट के पहला अध्याय ‘एक ख़ामोश सूनामी’ का आरंभ करते हैं एक बेहद अर्थवान टिप्पणी से: ‘’लोग भूखे हैं और यह प्राकृतिक नहीं है’। खाद्य संकट की भयावहता का जिक्र करते हुए वह बताते हैं कि 1974 में विकासशील देषों में 5 करोड़ लोग भूखे थे और उस वर्ष आयोजित विश्व खाद्य सम्मेलन ने अगले दस सालों में दुनिया से भूख को पूरी तरह से समाप्त करने का प्रस्ताव पास किया था लेकिन 1996, 2006 और 2008 में यह लगातार बढकर क्रमश 8।3 करोड, 8.5 करोड़ और 8.62 करोड़ हो गई। यही नहीं, अब तक विकासशील और पिछड़ी अर्थव्यवस्थाओं में ही सिमटी यह बीमारी अमेरिका में भी पहुंच गई है। 2008 में वहाँ भूख के शिकार लोगों की संख्या 35 लाख (12 प्रतिशत) तक पहुंच गयी जबकि इस वर्ष सरकारी ख़जाने से पोषण कार्यक्रमों के लिए कुल बज़ट 60 लाख डालर दिया गया! ऐसे में एशिया और अफ्रीका के हालात कोई भी समझ सकता है ( इस पर विस्तार से चर्चा आगे अंर्तराष्ट्रीय खाद्य नीति एवं शोध संस्थान द्वारा प्रस्तुत दूसरी रिर्पोर्ट के संदर्भ में की जायेगी )।


गिमनेज इसके कारणों की सटीक तलाश करते हैं। पहली बात तो यह कि इसका जनसंख्या वृद्धि से कोई लेना-देना नहीं है। पिछले वर्षों में हमेशा यह तर्क दिया जाता रहा कि जनसंख्या बढने की तेज़ ऱतार के चलते खाद्यान्नों का उत्पादन पिछड़ जाता है लेकिन विगत चार वर्षों में जहाँ जनसंख्या की वार्षिक वृद्धि दर 1.14 प्रतिशत रही वहीं अनाज का उत्पादन 2 फीसदी सालाना की दर से बढ़ा। वल्र्ड हंगर प्रोग्राम के कार्यकारी निदेषक जोसेट शीरन कहते हैं कि ‘‘ पहले से ज्यादा लोग अब भूखे हैं। अनाज भरा पड़ा है लेकिन लोग खरीद नहीं पा रहे हैं।’’


इसलिए अगर प्रति व्यक्ति खाद्यान्न उपलब्धता में कमी आई है तो फिर कारण अन्य हैं। कारण हैं - जनविरोधी नीतियां, गैरबराबरी आधारित व्यापार संबंध और विकास की गलत अवधारणा। गिमनेज का मानना है कि वर्तमान खाद्यान्न संकट के लिए बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ निम्मेदार हैं। कृषि में उनके बढ़ते हस्तक्षेप से किसान तबाह हो रहे हैं। ब्रेटनवुड्स समझौते से प्राप्त अकूत ताक़त से इन्होंने कृषि उत्पादों से लेकर खाद, बीज, कीटाणुनाषकों और उत्पादन तकनीकों तक पर कब्ज़ा कर लिया है और इसका प्रयोग कर अपार लाभ कमाया है। बाज़ार से कृषि को जोड़ने का कोई लाभ कम से कम एषिया और अफ्रीका के ग़रीब किसानो को तो नहीं ही मिला है। इसका दूसरा पक्ष है अनाजों की क़ीमतों में भारी वृद्धि। मार्च 2008 में विष्व बाज़ार में गेंहू का दाम पिछले साल की तुलना में 130 फ़ीसदी, सोया का 87 फ़ीसदी चावल का 74 फ़ीसदी और मक्के का 31 फ़ीसदी बढ़ गया। पिछले तीन वर्षों में अनाजों के विष्व मूल्य सूचकांक मंे 83 फ़ीसदी की बढ़ोत्तरी हुई जबकि पिछले तीन महीनों में यह वृद्धि 45 फ़ीसदी की हुई जिससे यह सूचकांक 1845 में अपने निर्माण से अब तक के सबसे ऊँचे स्तर पर पहुंच गया। इसका सीधा परिणाम आम आदमी की क्रय षक्ति के सतत संकुचन रूप में सामने आ रहा है। लोग अनाज के रूप में अपनी सबसे प्राथमिक ज़रूरत को पूरा करने में भी असमर्थ हैं नतीजा भूख से पीड़ित और कुपोषित लोगों की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि। इसी तथ्य का प्रतिबिंबन अंर्तराष्ट्रीय खाद्य नीति एवं शोध संस्थान द्वारा प्रस्तुत रिर्पोर्ट में होता है।


इस रिर्पोर्ट में वर्ष 2001-2006 के आँकड़ों के आधार पर विभिन्न देषों को कुपोषण तथा भूखमरी के आधार पर क्रमवार व्यवस्थित किया गया है। इसके लिए एक ‘भूमण्डलीय भूख सूचकांक’ बनाया गया है और 1990 के आधार वर्ष पर विभिन्न देषों को शून्य से सौ तक के पैमाने पर रखा गया है और सबसे ख़राब स्थिति वाले 88 देषों को चिन्हित किया गया है। इस सूचकांक के निर्धारण लिए तीन आधार लिए गए हैं- पहला, कुपोषण की षिकार जनसंख्या का अनुपात, दूसरा पाँच साल से कम उम्र के कुपोषित बच्चों का अनुपात और तीसरा इसी उम्र के बच्चों की मृत्यु दर। इस अध्ययन में अन्य देशों के साथ-साथ भारत के संदर्भ में भी अनेक महत्वपूर्ण निष्कर्ष सामने आये हैं जिनसे इस अवधि में दुनिया भर में बढ़ती हुई असमानताओं और पूंजी के सतत संकेन्द्रण के चलते निचले संस्तरों की बढ़ती जा रही बदहाली के स्पष्ट प्रमाण मिलते हैं।


इस अवधि में विश्व की कुल मिलाकर स्थिति सुधरी है। 1990 के 15।2 से बढ़कर दुनिया के लिए इस सूचकांक का स्तर 2008 में 18.7 हो गया है। लेकिन इसका वितरण बेहद असमान रहा है। सबसे बुरी स्थिति सब-सहारा देषों तथा दक्षिणी एषिया के देषों की है जहाँ इस सूचकांक का मूल्य क्रमषः 23.3 तथा 23.0 है। कांगो, इरीट्रिया, बरण्डी, नाईजर, सियेरा लियेन, लिबेरिया, इथियोपिया जैसे देषों में हालात पहले से भी बद्तर हो गये हैं जबकि कुवैत, पेरू, सीरिया, तुर्की, मैक्सिको और क्यूबा में स्थिति में सबसे ज्यादा सुधार हुआ है।


भारत के संदर्भ में इस अध्ययन के नतीजे चैंकाने वाले हैं। वैष्विक परिदृष्य पर नायक की तरह उभरने के दावों के बीच भारत इस रिर्पोर्ट में शामिल सबसे बदतर स्थिति वाले 88 देषों में 66वें क्रम पर है। यहाँ 2 करोड़ से भी अधिक भूखे तथा कुपोषित लोग रहते हैं और इस तरह यह दुनिया की सबसे बड़ी कुपोषित आबादी का घर है। विकसित पष्चिमी देषों और चीन कोे तो छोड़िये हमारा क्रम मंगोलिया, म्यानमार, श्रीलंका, कीनिया, सूडान और पाकिस्तान के भी बाद आता है। देष के प्रमुख 17 प्रदेषों, जिनमें लगभग 95 फ़ीसदी जनसंख्या निवास करती है, के विषद अध्ययन के दौरान प्राप्त राज्यवार आँकड़े तो और भी चैंकाने वाले हैं। इनमें से कोई भी प्रदेष ऐसा नहीं जिसे सामान्य या फिर निम्न स्तर पर भूख तथा कुपोषण प्रभावित कहा जा सके। जहाँ सबसे बेहतर प्रदर्शन पंजाब का है वहीं मध्यप्रद्श की स्थिति सबसे बुरी है।


राज्यवार स्थिति का थोड़ा और विष्लेषण करें तो यह अध्ययन राज्योें को तीन श्रेणियों में बांटता है। पंजाब, असम, केरल और आंध्र प्रदेष क्रमश पहले तीन स्थानों पर हैं और इन्हें गंभीर रूप से प्रभावित क्षेत्रों में रखा गया हैजिनके लिए सूचकांक 20 से नीचे पाया गया। दूसरी श्रेणी में सूचकांक 20 और 29।9 के बीच हरियाणा, राजस्थान, पष्चिम बंगाल, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेष, महाराष्ट्र, कर्नाटक, उड़ीसा, गुजरात, छत्तीसगढ़, बिहार, और झारखण्ड को भयावह स्थिति वाले क्षेत्रों के रूप में चिन्हित किया गया है और अत्यंत ख़तरनाक रूप से प्रभावित क्षेत्र के रूप में मध्यप्रदेष को जहाँ सूचकांक 30.9 पाया गया। दूसरे शब्दों मे कहें तो जहाँ पंजाब की स्थिति 33 अन्य विकासशील देशों के जैसी ही है वहीं बिहार और झारखण्ड के हालात जिम्बाबवे और हैती से भी बदतर हैं और मध्यप्रदेश की हालत इथियोपिया और चाड के बीच की!


इस स्थिति के मूल में वही सारे मसाईल हैं जिनका जिक्र गिमनेज़ ने अपनी रिर्पोर्ट में किया है। विकास के नवउदारवादी माॅडल से बहिष्कृत लोगों की जिंदगी दिन ब दिन बदतर होती गई है। कृषि को बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हाथों में सौंपने के तमाम विनाषकारी परिणामों ने अनाज़ को आदमी से दूर कर दिया है। चंद्रयान भेजने और विकास के नित नये कंगूरे सजाने की होड़ में बुनियाद की स्याहियों को नज़रअंदाज किया जा रहा है। इस मुक्त बाज़ार में जहाँ मुद्रा को पर लग गये हैं वहीं श्रम की जं़ज़ीरें और मज़बूत हुई हंै फलस्वरूप न तो रोज़गार बढ़ रहे हैं न ही वास्तविक श्रम मूल्य। और अगर इसमें विष्वव्यापी मंदी के असर को भी जोड़ दें तो एक बेहद ख़ौफनाक पसेमंज़र दिखाई देता है जिसमें उस ‘जादूई बूंद’ के इंतजार में टकटकी लगाये दम तोड़ते लोगों की लंबी कतारें हैं।


पुनश्च - अभी हाल में संघ ने हिंदू सम्मान की रक्षा के लिए चार बच्चे पैदा करने की सलाह दी है। मौलाना लोग भी ऐसी सलाहें बाँटते ही रहते हैं। सुदर्शन जी और उनके मौलाना भाई जानते हैं कि ये भूखे-नंगे-बीमार लोग सबसे ज्यादा उन्हीं के काम आते हैं खा़सकर तब, जब दुनिया को बदलने का दावा करने वाले पस्तहिम्मती का षिकार हों। वैसे जानते तो यह हम भी हैं।