शुक्रवार, 23 अप्रैल 2010
भूमण्डलीय गांव में भूख का सवाल
रविवार, 7 मार्च 2010
भूमण्डलीय ग्राम से बहिष्कृत शहरी ग़रीब
ग़रीबी की बहस हमारे देश में बहुत पुरानी है। औपनिवेशिक ग़ुलामी से मुक्ति के बाद से ही हमारे विकास की तमाम योजनाओं में ग़रीबी हटाने और देश के भीतर व्याप्त सामाजार्थिक विषमता को दूर करने की बातें की जाती रहीं। लोकतांत्रिक प्रणाली और शायद गांधी के ग्राम स्वराज से प्रभावित तत्कालीन कांग्रेसी और समाजवादी राजनेताओं और बुद्धिजीवियों ने गांवो के विकास और वहां की व्यापक ग़रीब आबादी की समस्याओं को केन्द्र में लाने के महती प्रयास किये। उदाहरण के लिये समाजवादी आंदोलन के एक प्रमुख नेता चौधरी चरण सिंह ने अपनी किताब – ‘भारत के आर्थिक दुःस्वप्न – कारण और निवारण ’ में गावों के विकास और वहां रह रही ग़रीब बहुसंख्या के विकास में असफल रहने का आरोप लगाते हुए तत्कालीन कांग्रेस सरकार की कड़ी आलोचना करते हुए विकल्प के रूप में ग्रामीण अर्थव्यवस्था के समग्र विकास के लिये लघु तथा कुटीर उद्योगों के विकास तथा सहकारिता के विस्तार का प्रस्ताव किया था। वहीं वामपंथी आंदोलन भी ग़रीबों के प्रति अपनी स्पष्ट पक्षधरता के बावज़ूद मुख्यतः संगठित क्षेत्र के कामगारों तक ही सीमित रहा। गांव तथा उसकी समस्यायें हिन्दी साहित्य की प्रगतिशील धारा पर भी हावी रहीं और एक दौर तो ऐसा आया था कि लेखक के लिये अपनी जनपक्षधरता साबित करने के लिये ग्रामीण परिवेश पर लिखना आवश्यक माना जाता था, और यह एक हद तक अब भी है।
भारत की विशाल ग्रामीण जनसंख्या तथा कृषि पर इसकी निर्भरता को देखते हुए यह स्वाभाविक भी था। लंबे औपनिवेशिक शासन के दौर में जिस तरह पारम्परिक अर्थव्यवस्था को नष्ट कर दिया था और पूरी दुनिया में हुए शहरीकरण के विपरीत भारत में नगरों से गावों की तरफ़ हुए पलायन ने स्थिति को बद से बद्तर बना दिया था। एक तरफ़ कृषि पर जनसंख्या का दबाव बढ़ा था तो दूसरी तरफ़ इस क्षेत्र की उत्पादकता भी काफ़ी कम थी। इसके साथ भू-वितरण में भयावह असमानता और गावों में पुरोगामी सामाजिक संरचनाओं की उपस्थिति ने गावों को, ख़ासतौर पर, वहां रहने वाली गरीब दलित-पिछड़ी आबादी के लिये नर्क में तब्दील कर दिया था। इसीलिये आज़ादी के बाद जब नेहरुवादी मिश्रित अर्थव्यवस्था के दौर में औद्योगीकरण आरंभ हुआ तो बड़ी संख्या में गावों से शहरों की तरफ़ माईग्रेशन हुआ। नये विकसित हो रहे शहरों में गावों की तलछट पर रह रहे ये लोग बेहतर रोज़गार, समानतापूर्ण व्यवहार और प्रगति के सपनों के साथ आये। महानगरों में व्यापक स्तर पर हो रहे निर्माण कार्यों और नई-नई फ़ैक्ट्रियों के लिये श्रमिकों की यह फ़ौज़ एक आवश्यकता भी थी। अपने बेहद सस्ते श्रम से इस विस्थापित सर्वहारा आबादी ने नये भारत के विकास में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और अब भी निभा रहे हैं। लेकिन विकास की सारी चमक-दमक के बावज़ूद यह तबका अपने बसाये शहरों में भी रहा अजनबी की ही तरह। जीवन की मूलभूत आवश्यकतायें अब भी उसके लिये एक सपना ही रहीं। शहरों की नई-नई बस्तियों में इनके लिये जगह नहीं थी। मज़दूरी के बेहद निचले स्तर और अक्सर आय की अनिश्चितता के कारण यह तबका, और ख़ास तौर पर इस आबादी का वह हिस्सा जो दैनिक वेतनभोगी में तब्दील हुआ या जिसने रिक्शा खींचने, सब्ज़ी बेचने, ठेले-खोमचे लगाने जैसे काम अपनाये, शहर में भी उतना ही बेगाना रहा जितना वह गांव में था, बल्कि शहरों की विशिष्ट संरचना के कारण अक्सर उससे भी ज़्यादा। इसे रहने की जगह मिली शहरों के बाहरी और निचले भागों में बसी झोपड़पट्टियों में और बिज़ली, साफ़ पानी, सैनिटेशन जैसी सुविधायें कभी इन तक पहुंची ही नहीं। शहर के संभ्रांत वर्ग के लिये यह ख़ूबसूरती पर लगे धब्बे की तरह अवांछनीय रहा तो राजनैतिक दलों के लिये एक वोटबैंक के रूप में अपनी अनुपयोगिता के कारण महत्वहीन। वैसे यह नियति तो मंत्र की तरह जाप किये गये ‘ भारत गावों में बसता है’ के बावज़ूद गावों की भी रही ही। यहां यह भी स्पष्ट कर देना आवश्यक होगा कि शहरी और ग्रामीण ग़रीबी आपस में विरोधाभासी या प्रतियोगी नहीं अपितु पूरी तरह से एक दूसरे के पूरक हैं। कृषि अर्थव्यवस्था के निरंतर बदहाल होते जाने के कारण हीं लोग गांव से शहरों की ओर रोज़गार की तलाश में आने पर मज़बूर होते हैं और शहरी ग़रीबों की संख्या बढ़ती चली जाती है।
पिछले दिनों संयुक्त राष्ट्र संघ विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) के सहयोग से भारत सरकार के भवन निर्माण तथा शहरी विकास मंत्रालय द्वारा ज़ारी पहली ‘शहरी ग़रीबी रिपोर्ट’ में प्रस्तुत आंकड़े तथा तथ्य स्थिति की भयावहता ही बयान नहीं करते अपितु इस संदर्भ में फैले तमाम दुष्प्रचारों की कलई भी उतारते हैं।
इस रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि भारत में जिस जनसंख्या वृद्धि को सबसे बड़ी समस्या के रूप में निरूपित किया जाता है शहरों में वह दूसरे एशियाई देशों से कम है। इसके अनुसार पिछले दिनों भारत की संवृद्धि दर एशिया की कुछ सबसे तेज़ विकसित हो रही अर्थव्यवस्थाओं के समकक्ष 8 फ़ीसदी रही लेकिन यहां शहरीकरण की वृद्धि दर 28 फ़ीसदी रही जो एशिया की औसत शहरीकरण वृद्धि दर से कम रही। लेकिन इसके बावज़ूद यहां गरीबों का अनुपात 25 फीसदी है। रिपोर्ट का यह भी मानना है कि पिछले दो दशकों में ग्रामीण और शहरी ग़रीबी के बीच का अंतर कम हुआ है। साथ ही संवृद्धि दर के तेज़ होने का असर शहरी ग़रीबी के कम होने के रूप में नहीं हुआ है। जिसके चलते शहरों में झुग्गी-झोपड़ी में रहने वालों की संख्या बढ़ी है। 2001 की जनगणना के अनुसार भारत के शहरों में झुग्गी-झोपड़ी में रहने वालों की संख्या 42 करोड़ छह लाख है जो कि लगभग स्पेन की कुल जनसंख्या के बराबर है। यही नहीं झुग्गी-झोपड़ी में रहने वालों की संख्या में वृद्धि के बावज़ूद झुग्गी-झोपड़ियों की संख्या में वृद्धि न होने के कारण इनका स्तर और भी बद्तर हुआ है। इन जगहों पर सुविधाओं का भयावह अभाव है। ऐसी लगभग 55 फीसदी बस्तियों में शौचालयों की कोई व्यवस्था नहीं है और ये पानी, बिज़ली, जैसी चीज़ों से भी महरूम हैं। इसके अलावा इसी जनगणना के अनुसार अब भी शहरों में सात लाख अठहत्तर लोगों के पास अपनी कहने को कोई छत नहीं है और ये फुटपाथों , रेल की पटरियों के किनारे, खुले मैदानों तथा सड़कों के इर्द-गिर्द रात बिताने को मज़बूर हैं। इनके लिये रैन बसेरों का इंतज़ाम कितना नाकाफ़ी है यह देखने के लिये दिल्ली का उदाहरण काफ़ी होगा जहां लगभग एक लाख निराश्रितों के लिये बस 2937 लोगों की क्षमता वाले 14 रैन बसेरे हैं यानि सिर्फ़ तीन फीसदी लोगों के लिये शेष या तो खुले आसमान के नीचे सोते हैं या फिर निजी ठेकेदारों के रहमोकरम पर। रिपोर्ट में एक अध्ययन का भी ज़िक्र है जिसके अनुसार महानगरों के निराश्रित मर्द, औरत और बच्चे अक्सर पुलिस के दुर्व्यवहार के शिकार होते हैं। रईसजादों द्वारा इनको कुचले जाने के किस्से तो आये दिन अख़बारों में आते ही रहते हैं।
रविवार, 10 जनवरी 2010
यह रेखा ग़रीबों की गर्दन से गुज़रती है...

आजकल दिल्ली में है जे़रे बहस ये मुद्दुआ
उन्नीसवीं सदी के प्रसिद्ध समाजशास्त्री हरबर्ट स्पेंसर ने शायद सबसे पहली बार आधिकारिक तौर पर सामाजिक परिक्षेत्र में योग्यतम की उत्तरजीविता के मुहावरे का प्रयोग किया था। उनका मानना था कि ‘‘गरीब लोग आलसी होते हैं,काम नहीं करना चाहते और जो काम नहीं करना चाहते उन्हें खाने का भी कोई अधिकार नहीं है।‘‘ इसी आधार पर उनका तर्क था कि ‘‘गरीबी उन्मूलन जैसी योजनाओं के जरिये सरकार का हस्तक्षेप न्यूनतम होना चाहिये।‘‘ दरअसल, स्पेन्सर पूंजीवादी दुनिया के वैचारिक प्रतिनिधि के रूप में सामने आते हैं। बीसवीं सदी के आरंभिक वर्षों में रूस सहित कई देशों में समाजवादी शासन व्यवस्थाओं की स्थापना और पूरी दुनिया में समाजवाद की एक विचार के रूप में प्रतिष्ठा तथा तद्जन्य सामाजिक- राजनैतिक आलोड़नों के बरअक्स पूंजीवाद के लिये मानवीय चेहरा अपनाना आवश्यक हो गया था। फिर भी तीस के दशक की महामंदी के दौर में क्लासिकल अर्थव्यवस्था के ‘लैसेज फेयर‘े ( सरकार के हस्तक्षेप से पूर्णतः मुक्त बाजार आधारित अर्थव्यवस्था) सिद्धांत को तिलांजलि देकर कीन्स की राज्य हस्तक्षेप पर आधारित नीतियों का लागू किया जाना पूरी दुनिया की पूँजीवादी व्यवस्थाओं की मजबूरियों को प्रदर्शित करता था न कि उनकी प्रतिबद्धताओं और पक्षधरताओं में किसी परिवर्तन को। मंदी से उबरने के साथ ही जब कालांतर में पूंजीवाद ने खुद को फिर मजबूत किया तो इस सैद्धांतिक अवस्थिति में भी परिवर्तन हुआ और पाल ए सैमुएल्सन जैसे सिद्धांतकारों ने कीन्सीय तथा क्लासिकीय सिद्धांतो के घालमेल से नवक्लासिकीय सिंथेसिस की जिस अवधारणा को जन्म दिया था उसकी तार्किक परिणिति नव उदारवादी सिद्धांतों की पुनसर््थापना के रूप में होनी तय थी। भारत सहित दुनिया के अधिकांश हिस्से में मिश्रित अर्थव्यवस्था की नीति के तहत कल्याणकारी राज्य की जो अवधारणा प्रस्तुत की गई थी वह नब्बे के दशक में सोवियत संघ के विघटन के बाद लागू संरचनात्मक संयोजन वाली नई आर्थिक नीतियों से प्रतिस्थापित कर दी गयी। इन नीतियों के तहत गरीबों तथा वंचितों को दी जाने वाली तमाम सुविधायें धीरे-धीरे छीनी जाने लगीं। पश्चिमी देशों में यह प्रक्रिया पहले ही शुरु हो चुकी थी। उदाहरण के लिये मार्ग्रेट थैचर के शासनकाल में 1980 में पेंशन निर्धारण के लिये औसत आय का आधार समाप्त कर दिया गया और 1987-88 में बच्चों पर मिलने वाली सुविधायें। इसके परिणाम भी उसी दौर में आने लगे थे - 1079 से 1997 के बीच ब्रिटेन में अमीरों और गरीबों के बीच की खाई अभूतपूर्व रूप से बढ गयी!
भारत में भी इन नीतियों का प्रसार निश्चित तौर पर सरकारों की बदली प्रतिबद्धताओं का स्पष्ट प्रतिबिंबन था। इनके विस्तार में जाना तो इस लेख की विषयवस्तु के मद्देनजर विषयांतर होगा, लेकिन यह तो स्पष्ट है ही अपने आरंभिक दौर में कुछ तो मुक्ति आंदोलन और नई-नई मिली आजादी के हैंगओवर और कुछ देश-दुनिया में जारी आँदोलनों के दबाव में पूँजीवादी नीतियों को भी समाजवाद के मुलम्मे में पेश किये जाने का दौर नब्बे के दशक के आरंभ में ही इतिहास बन गया और साठ के दशक में अमेरिका में विकसित ‘रिसाव के सिद्धांत‘ को आधिकारिक तौर पर स्वीकार कर पूरा जोर निजी पूंजी के विकास पर लगाया गया। आय तथा वितरण की असमानता में विस्तार अब कोई चिंता का विषय नहीं रह गया बल्कि इसे संवृद्धि के लिये आवश्यक मान कर स्वीकार किया गया और गरीबों तथा जरूरतमंदों की सहायता के लिये दी जाने वाली राशि को ‘संसाधनों की बर्बादी‘ के रूप में निरूपित किया गया। ऐसे में यह अनपेक्षित नहीं था कि पिछले दिनों जब भारत में गरीबी रेखा पर बहस के दौरान तमाम अर्थशास्त्रियों ने वास्तविक रूप से गरीबों की संख्या आधिकारिक आकड़ों से कई गुना बताई तो तर्क दिये गये कि ‘‘अगर गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों की संख्या इतनी बढ़ जायेगी तो उनके कल्याण के लिये लागू योजनाओं में धन का अतिरिक्त आवण्टन करना होगा जिसके लिये सरकार के पास पैसा नहीं है (सक्सेना समिति को लिखे गये योजना आयोग के पत्र से)!‘‘ इसी सरकार के पास पिछले वर्ष पूँजीपतियों को मंदी से निपटने के नाम पर विभिन्न सहायता और छूट के रूप में करोड़ों रुपये देने के लिये पर्याप्त धन था!
गरीबी रेखा के रूप में गरीबी को निर्धारित करने का प्रस्ताव सबसे पहले 1957 में इण्डियन लेबर कांफ्रेंस के दौरान दिया गया था। उसी के बाद योजना आयोग ने एक वर्किंग ग्रुप बनाया था जिसने भारत के लिये ‘आवश्यक कैलोरी उपभोग‘ की अवधारणा पर आधारित गरीबी रेखा का प्रस्ताव किया। इसके तहत उस समय बीस रुपये प्रतिमाह को विभाजक रेखा के रूप में स्वीकृत किया गया। 1979 में योजना आयोग ने ही गरीबी को पुनर्परिभाषित करने करने के लिये एक टास्क फोर्स का गठन किया गया। लेकिन इसने भी मामूली फेरबदल के साथ मूलतः ‘आवश्यक कैलोरी उपभोग‘ की अवधारणा को ही आधार बनाया। 1973 की कीमतों को आधार बनाते हुए इसने ग्रामीण क्षेत्रों के लिये 49 रुपये प्रतिव्यक्ति प्रतिमाह तथा शहरी क्षेत्रों के लिये 57 रुपये की विभाजक रेखा तय की। मुद्रास्फीति के अनुसार इसमें समय-समय पर समायोजन किया गया और वर्तमान में यह शहरी क्षेत्रों के लिये 559 रुपये और गाँवों के लिये 368 रुपये है। योजना आयोग गरीबी रेखा के निर्धारण के लिये राष्ट्रीय तथा राज्य स्तर पर एन एस एस ओ के उपभोक्ता व्यय सर्वेक्षणों के आधार पर विभाजक रेखा तय करता है। 2004-2005 के लिये प्रोफेसर लकड़वाला की अध्यक्षता में 1997 में बने एक्स्पर्ट ग्रुप द्वारा की गयी अनुशंसा के आधार पर जो आंकड़े निकाले गये थे उनके अनुसार देश में उस समय गरीबों की कुल संख्या 28।3 प्रतिशत थी।
‘सेन्टर फार पालिसी आल्टरनेटिव‘ की एक रिपोर्ट में मोहन गुरुस्वामी और रोनाल्ड जोसेफ एब्राहम इस गरीबी रेखा को ‘भूखमरी रेखा‘ कहते हैं। कारण साफ है। इसके निर्धारण का इकलौता आधार आवश्यक कैलोरी उपभोग है। यानि इसके अनुसार वह आदमी गरीब नहीं है जो येन केन प्रकारेण दो जून अपना पेट भर ले और अगले दिन काम करने के लिये जिन्दा रहे। युनिसेफ स्वस्थ शरीर के लिये प्रोटीन, वसा, लवण, लौह और विटामिन जैसे तमाम अन्य तत्वों को जरूरी बताता है जिसके अभाव में मनुष्य कुपोषित रह जाता है तथा उसकी बौद्धिक व शारीरिक क्षमतायें प्रभावित होती हैं। लेकिन गरीबी रेखा तो केवल जिन्दा रहने के लिये जरूरी भोजन से आगे नहीं बढ़ती। इसके अलावा शायद व्यवस्था यह मानकर चलती है कि आबादी के इस हिस्से का स्वास्थ्य, शिक्षा, मनोरंजन, घर, साफ पानी, सैनिटेशन जैसी तमाम मूलभूत सुविधाओं पर तो कोई हक है ही नहीं । वैसे तो जिस ‘आवश्यक कैलोरी उपभोग‘ की बात की जाती है ( शहरों में 2100 तथा गांवों में 2400 कैलोरी प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन) वह भी दिन भर शारीरिक श्रम करने वालों के लिहाज से अपर्याप्त है। ‘इण्डियन काउंसिल आफ मेडिकल रिसर्च‘ के अनुसार भारी काम में लगे हुए पुरुषों को 3800 कैलोरी तथा महिलाओं को प्रतिदिन 2925 कैलोरी की आवश्यकता है। यही नहीं, अनाजों की कीमतों में तुलनात्मक वृद्धि व उपलब्धता में कमी, स्वास्थ्य तथा शिक्षा जैसे क्षेत्रों में सरकार की घटती भागीदारी, विस्थापन तथा तमाम ऐसी ही दूसरी परिघटनाओं की रोशनी में यह रेखा आर्थिक स्थिति के आधार पर समाज को जिन दो हिस्सों में बांटती है उसमें ऊपरी हिस्से के निचले आधारों में एक बहुत बड़ी आबादी भयावह गरीबी और वंचना का जीवन जीने के लिये मजबूर है और तमाम सरकारी योजनायें उसको लाभार्थियों की श्रेणी से उसके आधिकारिक तौर पर गरीब न होने के कारण बाहर कर देती है।
इसी वजह से भारत सरकार के गरीबी के आधिकारिक आंकड़े हमेशा से विवाद में रहे हैं। विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय तथा दूसरी स्वतंत्र संस्थाओं के अध्ययनों में देश में वास्तविक गरीबों की संख्या के आंकड़े सरकारी आंकड़ों से कहीं ज्यादा रहे हैं। अभी हाल ही में विश्व बैंक की ‘ग्लोबल इकोनामिक प्रास्पेक्ट्स फार 2009‘ नाम से जारी रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि 2015 में भारत की एक तिहाई आबादी बेहद गरीबी ( 1.25 डालर यानि लगभग 60 रुपये प्रतिदिन प्रतिव्यक्ति से भी कम आय) में गुजारा कर रही होगी। इस रिपोर्ट के अनुसार यह स्थिति सब सहारा देशों को छोड़कर पूरी दुनिया में सबसे बद्तर होगी। यही नहीं, यह रिपोर्ट भारत की तुलनात्मक स्थिति के लगातार बद्तर होते जाने की ओर भी इशारा करती है। इसके अनुसार जहां 1990 में भारत की स्थिति चीन से बेहतर थी वहीं 2005 में जहां चीन में गरीबों का प्रतिशत 15.9 रह गया, भारत में यह 41.6 थी।
इन्हीं विसंगतियों के मद्देनजर पिछले दिनों सरकार ने गरीबी रेखा के पुनर्निर्धारण के लिये जो नयी कवायदें शुरु कीं उन्होंने इस जिन्न को बोतल से बाहर निकाल दिया है। सबसे पहले आई असंगठित क्षेत्र के उद्यमों के लिये गठित राष्ट्रीय आयोग (अर्जुन सेनगुप्ता समिति) की रिपोर्ट ने देश में तहलका ही मचा दिया था। इसके अनुसार देश की 77 फीसदी आबादी 20 रुपये रोज से कम में गुजारा करती है। दो अंको वाली संवृद्धि दर और शाईनिंग इण्डिया के दौर में यह आंकड़ा सच्चाई के घिनौने चेहरे से नकाब खींचकर उतार देने वाला था। समिति ने असंगठित क्षेत्र के लिये दी जाने वाली सुविधायें इस आबादी तक पहुंचाने की सिफारिश की थी। लेकिन बात यहीं पर खत्म नहीं हुई। भारत सरकार द्वारा गरीबी रेखा के निर्धारण के लिये मानक तैयार करने के लिये ग्रामीण विकास मंत्रालय के पूर्व सचिव श्री एन के सक्सेना की अध्यक्षता में जो समिति बनाई थी उसके आंकड़े और भी चैंकाने वाले थे। इस समिति ने अगस्त-2009 में पेश अपनी रिपोर्ट में गरीबी रेखा से ऊपर रहने वालों के विभाजन के लिये पांच मानक सुझाये। जिसमें शहरी क्षेत्रों में न्यूनतम 1000 रुपये तथा ग्रामीण क्षेत्रों में न्यूनतम 700 रुपयों का उपभोग या पक्के घर या दो पहिया वाहन या मशीनीकृत कृषि उपकरणों जैसे ट्रैक्टर या जिले की औसत प्रतिव्यक्ति भू संपति का स्वामित्व। इस आधार पर समिति पर गरीबी रेखा के निर्धारण पर समिति ने पाया कि भारत की ग्रामीण जनसंख्या का कम से कम पचास फीसदी इसके नीचे जीवनयापन कर रहा है। सक्सेना समिति ने खाद्य मंत्रालय के आंकड़ों का भी जिक्र किया है जिसके अनुसार गांवों में 10।5 करोड़ बीपीएल राशन कार्ड हैं। अगर इसी को आधार बनाया जाय तो भी गांवों में गरीबी रेखा से नीचे रह रहे लोगों की संख्या लगभग 53 करोड़ ठहरती है जो कुल आबादी का लगभग पचास फीसदी है।
समिति का यह भी मानना कि जहां आधिकारिक तौर पर 1973-74 से 2004-05 के बीच गरीबी 56 प्रतिशत से घटकर 28 प्रतिशत हो गयी वहीं गरीबों की वास्तविक संख्या में कोई कमी नहीं आयी। अपने निष्कर्ष में वह कहते हैं कि ‘गरीब परिवारों की एक बहुत बड़ी संख्या गरीबी उन्मूलन के कार्यक्रमों से बहिष्कृत रही है और ये निश्चित रूप से सुदूर क्षेत्रों में रहने वाले बेजुबान लोग ही होंगे।‘लेकिन सरकार ने इस समिति की अनुशंसाओं को लागू करने से साफ इंकार कर दिया। योजना आयोग द्वारा समिति को लिखे गये पत्र का जिक्र पहले ही किया जा चुका है। ग्रामीण विकास मंत्री श्री सी पी जोशी ने इस पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा था कि ‘सक्सेना समिति को गरीबों की गणना करने के लिये नहीं सिर्फ गरीबों की पहचान करने के लिये नयी प्रणाली विकसित करने के लिये कहा गया था।‘
इस दौरान योजना आयोग के एक सदस्य अभिजीत सेन ने तर्क दिया था कि गरीबों की गणना आवश्यक कैलोरी उपभोग की जगह आय के आधार की जानी जानी चाहिये। उनका यह भी मानना था कि मौजूदा मानकों के आधार पर गणना से शहरी क्षेत्रों में गरीबों की वास्तविक संख्या 64 फीसदी तथा गांवों में अस्सी फीसदी है।
इस संदर्भ में केन्द्र सरकार द्वारा प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार समिति के तत्कालीन अध्यक्ष सुरेश तेंदुलकर समिति को गरीबों की संख्या की गणना की जिम्मेदारी दी गयी थी। इस आयोग की पिछले महीने प्रस्तुत रिपोर्ट एक तरफ तो आवश्यक कैलोरी उपभोग वाली परिभाषा से आगे बढ़ने की कोशिश करती है तो दूसरी तरफ आंकड़ों में गरीबी कम रखने का दबाव भी इस पर साफ दिखाई देता है।
तेंदुलकर समिति के अनुसार 2004-05 में भारत की कुल आबादी का 37।2 फीसदी हिस्सा गरीबी रेखा के नीचे है। यह आंकड़ा योजना आयोग के 27.5 फीसदी से तो अधिक है लेकिन अभिजित सेन कमेटी या ऐसे अन्य अध्ययनों के निष्कर्षों से कम। हालांकि योजना आयोग से इसकी सीधी तुलना मानकों के परिवर्तन के कारण संभव नहीं है। आयोग के अनुसार बिहार तथा उड़ीसा में ग्रामीण गरीबी का प्रतिशत क्रमशः 55.7 तथा 60.8 है, उल्लेखनीय है कि सेन कमेटी के अनुसार इन दोनों प्रदेशों में ग्रामीण गरीबी का प्रतिशत 80 से अधिक था। आयोग ने ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी निर्धारण के लिये सीमारेखा 356.30 से बढ़ाकर 444.68 रुपये और शहरी क्षेत्रों में 538.60 रुपये से बढ़ाकर 578.80 की है। इस आधार पर दैनिक उपभोग की राशि शहरों में लगभग 19 रुपये और गांवों में लगभग 15 रुपये ठहरती है जो विश्वबैंक द्वारा तय की गयी अंतर्राष्ट्रीय गरीबी रेखा (20 रुपये) से कम है।
समिति ने आवश्यक कैलोरी वाले मानक को पूरी तरह समाप्त कर दिया है। इसकी जगह पर समिति का जोर शिक्षा, स्वास्थ्य तथा अन्य क्षेत्रों में होने वाले खर्चों को भोजन के साथ समायोजित कर ग्रामीण तथा शहरी विभाजन को समाप्त कर क्रय शक्ति समानता पर आधारित एक अखिल भारतीय गरीबी रेखा के निर्धारण पर है। यह अवधारणा के रूप में 1973-74 वाले मानकों से निश्चित रूप से बेहतर हैं जिसमें शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी तमाम जरूरतों को सरकार द्वारा मुफ्त उपलब्ध कराये जाने की मान्यता पर आधारित थे। लेकिन आवश्यक कैलोरी उपभोग वाली अवधारणा को पूरी तरह से खत्म किया जाना, खासतौर से तब, जबकि पिछले दिनों अंतर्राष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान के अंतर्राष्ट्रीय भूख सूचकांक में भारत को 66 वें पायदान पर रखा गया है और खाद्यान्न संकट, खाद्यान्नों की कीमतों में अभूतपूर्व तेजी तथा कुपोषण की समस्या लगातार गहराती गयी है, इसकी नीयत पर सवाल उठाता ही है। इस दौर में पेश की गयी इस अवधारणा का अर्थ होगा कि गरीबी रेखा से वास्तविक गरीबों का बहुलांश बाहर रह जायेगा। यहां पर यह भी बता देना आवश्यक है कि कई हालिया अध्ययन बताते हैं कि सबसे गरीब दस फीसदी लोगों का कैलोरी उपभोग सबसे अमीर दस फीसदी लोगों के कैलोरी उपभोग से कम है जबकि यह तो सर्वज्ञात तथ्य है कि जहां अमीर आदमी तमाम दूसरी पोषक चीजों का उपभोग करता है वहीं गरीबों का वह तबका अपनी लगभग पूरी आय भोजन पर ही खर्च करता है।
दरअसल मानकों के न्यायपूर्ण निर्धारण के लिये जहां एक तरफ आवश्यक कैलोरी उपभोग की अवधारणा को इण्डियन काउंसिल आफ मेडिकल रिसर्च की पूर्व में उद्धृत अनुशंसा के आधार पर और ऊंचे स्तर पर ले जाते हुए इसमें पोषण के लिये आवश्यक अन्य तत्वों के साथ समायोजित किया जाना चाहिये था और इसके साथ एक सम्मानजनक जीवनस्तर के लिये आवश्यक शिक्षा, स्वास्थ्य, मनोरंजन, घर, पीने का साफ पानी, सैनिटेशन जैसी तमाम चीजों से जोड़कर देखा जाना चाहिये था। इस संदर्भ में सेंटर फार आल्टरनेटिव पालिसी रिसर्च द्वारा मूलभूत आवश्यकताओं की कीमत पर आधारित गरीबी की विभाजक रेखा ज्यादा न्यायपूर्ण लगती है जिसमें 2004-2005 के लिये अखिल भारतीय स्तर पर 840 रुपये प्रतिव्यक्ति प्रतिमाह का निर्धारण किया गया है । इसके साथ ही एन के सक्सेना द्वारा सुझाये गये मानक भी सच के ज्यादा करीब हैं।
साथ ही तेंदुलकर समिति गरीबी निर्धारण के आधारों में विस्तार के दावे के बावजूद गरीबी की बहुआयामी प्रकृति के बारे में कोई पहल नहीं करती। पहले की तमाम रिपोर्टों की तरह यह भी गरीबी को महज आर्थिक समस्या की तरह निरूपित करती है। इसके सामाजिक-सांस्कृतिक आयामों को समझे बिना इसे जड़मूल से समाप्त किया ही नहीं जा सकता। जाति, लिंग, शारीरिक अक्षमता, क्षेत्रीय असंतुलन जैसे तमाम कारक भारत में गरीबी को निर्धारित करते हैं।
दरअसल वस्तुस्थिति यह है कि गरीबी के इन तकनीकी निर्धारणों के मूल में उस बड़ी हकीकत पर परदा डालना है कि इन सब कवायदों के मूल में भयावह तरीके से विस्तारित होती आर्थिक असमानता की खाई के सवाल को दबाये रखना है। नई आर्थिक नीतियों से लाभान्वित होने वाले छोटे से तबके के प्रति अपनी स्पष्ट प्रतिबद्धता और सामाजार्थिक समानता के उद्देश्य को पूर्ण तिलांजलि दे चुकीं शासन व्यवस्थाओं के लिये गरीबी उन्मूलन की योजनायें एक तरफ तो जनाक्रोशों को दबाये रखने वाले ‘सेफ्टी वाल्व‘ हैं तो दूसरी तरफ हर पांच साल पर होने वाले चुनावों के मद्देनजर एक ‘आवश्यक फिजूलखर्ची‘। ऐसे में यह स्वाभाविक ही है कि गरीबी को एक असमाधेय समस्या के रूप में निरूपित कर नरेगा जैसी कुछेक योजनाओं द्वारा थोड़ा-बहुत लाभ एक सीमित आबादी तक पहुंचाया जाता है लेकिन भूमि सुधार, आय तथा व्यय पर करों द्वारा नियंत्रण तथा पुनर्वितरण जैसे बड़े और समस्या के जड़ पर प्रहार करने वाले उपाय सरकारों की कार्यसूची में शामिल ही नहीं होते। इस नई कवायद के पीछे भी येन केन प्रकारेण आधिकारिक रूप से गरीबों की संख्या को न्यूनतम स्तर पर रखना है जिससे कि प्रस्तावित राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून में सब्सीडियों पर नियंत्रण रखा जा सके। खाद्य एवं लोक वितरण मंत्रालय द्वारा राज्य सरकारों को प्रेषित इस कानून के अवधारणा पत्र में साफ किया गया है कि गरीबी रेखा के नीचे रहने वालों की संख्या के निर्धारण का अधिकार अनन्य रूप से केन्द्र सरकारों के पास ही रहेगा। राज्य सरकारों को टारगेटेड बीपीएल के अंतर्गत लाभान्वित होने वाले परिवारों की संख्या पर नियंत्रण रखने की ताकीद की गयी है। यह कानून इस सूची की सालाना समीक्षा को आवश्यक बना देगा। अपनी ड्राफ्ट गाइडलाइन में यह पहले ही चेता चुका था कि ‘अगर राज्य सरकारों पर बीपीएल सूची बनाने का काम छोड़ दिया गया तो भारत में गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों की संख्या कुल ग्रामीण आबादी की 80-85 फीसदी तक हो जाने की आशंका है।‘ साफ है कि ऐसी नीयत के साथ बनने वाले खाद्य सुरक्षा कानून का हश्र भी कुछ दिनों पहले बने शिक्षा के अधिकार कानून जैसा ही होना है।
गरीबी रेखा के रूप में आय या आवश्यक कैलोरी उपभोग के किसी एक खास आंकड़े को विभाजक बना देना रोज बदलती कीमतों और रोजगार की अनिश्चितता की रोशनी में दरअसल एक भद्दा मजाक है। जब दाल 90 रुपये, चावल 20 रुपये, आटा 17 रुपये किलो बिक रहा है, डाक्टरों की फीस आसमान छू रही है, दवायें इतनी मंहगी हैं और बसों तथा रेलों से कार्यस्थल तक पहुंचने में ही 10-15 रुपये खर्च हो जाते हैं तो दिल्ली में बैठकर यह तय करना कि 15 या 20 रुपये रोज में एक आदमी अपना खर्च चला सकता है और उससे अधिक पाने वालों को सहायता देने की कोई जरूरत नहीं है उस सरकार की प्रतिबद्धता को स्पष्ट कर देता है जो पिछले साल पिछले बजट में पूंजीपतियों को सहायता और करों में छूट के रूप में 4,18,095 करोड़ रुपयों की सौगात दे चुकी है।
रविवार, 16 अगस्त 2009
रोशन कंगूरों की स्याह बुनियाद
विकास क्या है और इसके वास्तविक पैमाने कौन से होने चाहिए इसे लेकर एक सनातन बहस चलती ही रही है। लेकिन समाजवादी रूस के पतन के बाद जैसे-जैसे दुनिया भर में नवउदारवादी नीतियों का वर्चस्व स्थापित होता गया है विकास का अर्थ आर्थिक वृद्धि तक सीमित होता गया है। एक आम समझ यह बनी है कि अगर पूँजी की उत्पादकता लगातार बढ़ रही है और उद्योगपतियों की समृद्धि का स्तर सतत् ऊँचा उठ रहा है तो अर्थव्यवस्था का विकास हो रहा है। रहा सवाल आम लोगों और ग़रीब बहुसंख्या का तो उन्हें ‘टपक बूंद (ट्रिकल डाऊन) सिद्धांत’ के भरोसे छोड़ दिया जाता है जिसके अंर्तगत यह मान्यता दी जाती है कि दीर्घकाल में समृद्धि की कुछ बूंदे रिस-रिस कर निचले संस्तरों तक भी पहुंचेंगी। समानता का विचार तो ख़ैर यहाँ सिरे से ही गायब होता है लेकिन समृद्धि के आधारों के क्रमिक विस्तार के इस दीर्घकाल की अवधि होती कितनी है यह भी किसी को पता नहीं होता। इस सिद्धांत की अर्थषास्त्रीय व्याख्या तो एक अलग मसला है लेकिन अगर इसे अनुभव के आधार पर कसें तो भी इसमें तमाम झोल दिखाई देते हैं। विगत दो दशकों से चल रही नवउदारवादी नीतियों के फलस्वरूप उद्योगपतियों की आर्थिक समृद्धि के महासागर की बूंदे उस सबसे निचले संस्तर तक नहीं पहुंची हैं बल्कि वंचित जन का जीवनस्तर कई माामलों में तो और भी बदतर हुआ है।
अभी हाल ही में विश्व बाज़ार के बेताज बाद्शाह अमेरिका में ही स्थित दो अलग-अलग संस्थानों की रिर्पोटें सच के इस बदशक्ल चेहरे को बेपर्दा करती हैं। यहाँ यह स्पष्ट कर देना भी ज़रूरी है कि इसमें दुनिया भर के बाज़ारों में जारी मंदी का क़िस्सा शामिल नहीं है ; इन दोनो रिर्पोटों का अध्ययन काल इस परिघटना के सतह पर आने से पहले का है।
इनमें पहली रिपोर्ट आॅकलैण्ड स्थित ‘खाद्य एवं विकास नीति संस्थान’ के कार्यकारी निदेषक एरिक हाॅल्ट गिमनेज द्वारा प्रस्तुत ‘विश्व खाद्य संकटः इसके पीछे क्या है और इस बारे में हम क्या कर सकते हैं’ विश्व भर में व्याप्त खाद्य संकट के कारणों तथा इसके हल के लिए आवश्यक नीतिगत प्रयासों की पड़ताल करती है तो ‘अंर्तराष्ट्रीय खाद्य नीति एवं शोध संस्थान द्वारा प्रस्तुत दूसरी रिर्पोर्ट दुनिया भर के देषों के लिए बनाए गये ‘भूमण्डलीय भूख सूचकांक’ के जरिये भूख और कुपोषण की भयावह तस्वीर पेष करती है।
गिमनेज अपनी रिपोर्ट के पहला अध्याय ‘एक ख़ामोश सूनामी’ का आरंभ करते हैं एक बेहद अर्थवान टिप्पणी से: ‘’लोग भूखे हैं और यह प्राकृतिक नहीं है’। खाद्य संकट की भयावहता का जिक्र करते हुए वह बताते हैं कि 1974 में विकासशील देषों में 5 करोड़ लोग भूखे थे और उस वर्ष आयोजित विश्व खाद्य सम्मेलन ने अगले दस सालों में दुनिया से भूख को पूरी तरह से समाप्त करने का प्रस्ताव पास किया था लेकिन 1996, 2006 और 2008 में यह लगातार बढकर क्रमश 8।3 करोड, 8.5 करोड़ और 8.62 करोड़ हो गई। यही नहीं, अब तक विकासशील और पिछड़ी अर्थव्यवस्थाओं में ही सिमटी यह बीमारी अमेरिका में भी पहुंच गई है। 2008 में वहाँ भूख के शिकार लोगों की संख्या 35 लाख (12 प्रतिशत) तक पहुंच गयी जबकि इस वर्ष सरकारी ख़जाने से पोषण कार्यक्रमों के लिए कुल बज़ट 60 लाख डालर दिया गया! ऐसे में एशिया और अफ्रीका के हालात कोई भी समझ सकता है ( इस पर विस्तार से चर्चा आगे अंर्तराष्ट्रीय खाद्य नीति एवं शोध संस्थान द्वारा प्रस्तुत दूसरी रिर्पोर्ट के संदर्भ में की जायेगी )।
गिमनेज इसके कारणों की सटीक तलाश करते हैं। पहली बात तो यह कि इसका जनसंख्या वृद्धि से कोई लेना-देना नहीं है। पिछले वर्षों में हमेशा यह तर्क दिया जाता रहा कि जनसंख्या बढने की तेज़ ऱतार के चलते खाद्यान्नों का उत्पादन पिछड़ जाता है लेकिन विगत चार वर्षों में जहाँ जनसंख्या की वार्षिक वृद्धि दर 1.14 प्रतिशत रही वहीं अनाज का उत्पादन 2 फीसदी सालाना की दर से बढ़ा। वल्र्ड हंगर प्रोग्राम के कार्यकारी निदेषक जोसेट शीरन कहते हैं कि ‘‘ पहले से ज्यादा लोग अब भूखे हैं। अनाज भरा पड़ा है लेकिन लोग खरीद नहीं पा रहे हैं।’’
इस रिर्पोर्ट में वर्ष 2001-2006 के आँकड़ों के आधार पर विभिन्न देषों को कुपोषण तथा भूखमरी के आधार पर क्रमवार व्यवस्थित किया गया है। इसके लिए एक ‘भूमण्डलीय भूख सूचकांक’ बनाया गया है और 1990 के आधार वर्ष पर विभिन्न देषों को शून्य से सौ तक के पैमाने पर रखा गया है और सबसे ख़राब स्थिति वाले 88 देषों को चिन्हित किया गया है। इस सूचकांक के निर्धारण लिए तीन आधार लिए गए हैं- पहला, कुपोषण की षिकार जनसंख्या का अनुपात, दूसरा पाँच साल से कम उम्र के कुपोषित बच्चों का अनुपात और तीसरा इसी उम्र के बच्चों की मृत्यु दर। इस अध्ययन में अन्य देशों के साथ-साथ भारत के संदर्भ में भी अनेक महत्वपूर्ण निष्कर्ष सामने आये हैं जिनसे इस अवधि में दुनिया भर में बढ़ती हुई असमानताओं और पूंजी के सतत संकेन्द्रण के चलते निचले संस्तरों की बढ़ती जा रही बदहाली के स्पष्ट प्रमाण मिलते हैं।
इस अवधि में विश्व की कुल मिलाकर स्थिति सुधरी है। 1990 के 15।2 से बढ़कर दुनिया के लिए इस सूचकांक का स्तर 2008 में 18.7 हो गया है। लेकिन इसका वितरण बेहद असमान रहा है। सबसे बुरी स्थिति सब-सहारा देषों तथा दक्षिणी एषिया के देषों की है जहाँ इस सूचकांक का मूल्य क्रमषः 23.3 तथा 23.0 है। कांगो, इरीट्रिया, बरण्डी, नाईजर, सियेरा लियेन, लिबेरिया, इथियोपिया जैसे देषों में हालात पहले से भी बद्तर हो गये हैं जबकि कुवैत, पेरू, सीरिया, तुर्की, मैक्सिको और क्यूबा में स्थिति में सबसे ज्यादा सुधार हुआ है।
भारत के संदर्भ में इस अध्ययन के नतीजे चैंकाने वाले हैं। वैष्विक परिदृष्य पर नायक की तरह उभरने के दावों के बीच भारत इस रिर्पोर्ट में शामिल सबसे बदतर स्थिति वाले 88 देषों में 66वें क्रम पर है। यहाँ 2 करोड़ से भी अधिक भूखे तथा कुपोषित लोग रहते हैं और इस तरह यह दुनिया की सबसे बड़ी कुपोषित आबादी का घर है। विकसित पष्चिमी देषों और चीन कोे तो छोड़िये हमारा क्रम मंगोलिया, म्यानमार, श्रीलंका, कीनिया, सूडान और पाकिस्तान के भी बाद आता है। देष के प्रमुख 17 प्रदेषों, जिनमें लगभग 95 फ़ीसदी जनसंख्या निवास करती है, के विषद अध्ययन के दौरान प्राप्त राज्यवार आँकड़े तो और भी चैंकाने वाले हैं। इनमें से कोई भी प्रदेष ऐसा नहीं जिसे सामान्य या फिर निम्न स्तर पर भूख तथा कुपोषण प्रभावित कहा जा सके। जहाँ सबसे बेहतर प्रदर्शन पंजाब का है वहीं मध्यप्रद्श की स्थिति सबसे बुरी है।
राज्यवार स्थिति का थोड़ा और विष्लेषण करें तो यह अध्ययन राज्योें को तीन श्रेणियों में बांटता है। पंजाब, असम, केरल और आंध्र प्रदेष क्रमश पहले तीन स्थानों पर हैं और इन्हें गंभीर रूप से प्रभावित क्षेत्रों में रखा गया हैजिनके लिए सूचकांक 20 से नीचे पाया गया। दूसरी श्रेणी में सूचकांक 20 और 29।9 के बीच हरियाणा, राजस्थान, पष्चिम बंगाल, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेष, महाराष्ट्र, कर्नाटक, उड़ीसा, गुजरात, छत्तीसगढ़, बिहार, और झारखण्ड को भयावह स्थिति वाले क्षेत्रों के रूप में चिन्हित किया गया है और अत्यंत ख़तरनाक रूप से प्रभावित क्षेत्र के रूप में मध्यप्रदेष को जहाँ सूचकांक 30.9 पाया गया। दूसरे शब्दों मे कहें तो जहाँ पंजाब की स्थिति 33 अन्य विकासशील देशों के जैसी ही है वहीं बिहार और झारखण्ड के हालात जिम्बाबवे और हैती से भी बदतर हैं और मध्यप्रदेश की हालत इथियोपिया और चाड के बीच की!
इस स्थिति के मूल में वही सारे मसाईल हैं जिनका जिक्र गिमनेज़ ने अपनी रिर्पोर्ट में किया है। विकास के नवउदारवादी माॅडल से बहिष्कृत लोगों की जिंदगी दिन ब दिन बदतर होती गई है। कृषि को बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हाथों में सौंपने के तमाम विनाषकारी परिणामों ने अनाज़ को आदमी से दूर कर दिया है। चंद्रयान भेजने और विकास के नित नये कंगूरे सजाने की होड़ में बुनियाद की स्याहियों को नज़रअंदाज किया जा रहा है। इस मुक्त बाज़ार में जहाँ मुद्रा को पर लग गये हैं वहीं श्रम की जं़ज़ीरें और मज़बूत हुई हंै फलस्वरूप न तो रोज़गार बढ़ रहे हैं न ही वास्तविक श्रम मूल्य। और अगर इसमें विष्वव्यापी मंदी के असर को भी जोड़ दें तो एक बेहद ख़ौफनाक पसेमंज़र दिखाई देता है जिसमें उस ‘जादूई बूंद’ के इंतजार में टकटकी लगाये दम तोड़ते लोगों की लंबी कतारें हैं।
पुनश्च - अभी हाल में संघ ने हिंदू सम्मान की रक्षा के लिए चार बच्चे पैदा करने की सलाह दी है। मौलाना लोग भी ऐसी सलाहें बाँटते ही रहते हैं। सुदर्शन जी और उनके मौलाना भाई जानते हैं कि ये भूखे-नंगे-बीमार लोग सबसे ज्यादा उन्हीं के काम आते हैं खा़सकर तब, जब दुनिया को बदलने का दावा करने वाले पस्तहिम्मती का षिकार हों। वैसे जानते तो यह हम भी हैं।
