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सोमवार, 25 अक्टूबर 2010

अर्जुन सेनगुप्ता - एक मानवतावादी विचारक का अवसान

अर्जुन सेन गुप्ता
एक मानवतावादी विचारक का अवसान

जाने-माने विकास अर्थशास्त्री अर्जुन सेनगुप्ता का पिछले दिनों दिल्ली के अखिल भारतीय आर्युविज्ञान संस्थान में देहान्त हो गया। वह कुछ समय से प्रोटेस्टेंट कैंसर से पीड़ित थे। अपने लंबे और सक्रिय जीवन में उन्हें एक शिक्षाविद, आर्थिक प्रशासक, ब्यूरोक्रेट, संसद सदस्य तथा कूटनीतिज्ञ के रूप में पर्याप्त सम्मान मिला।

10 जून, 1937 को कलकत्ता के एक उच्चशिक्षित मध्यवर्गीय संयुक्त परिवार में जन्मे श्री सेनगुप्ता वैसे तो शैक्षणिक तथा प्रशासनिक, दोनों क्षेत्रों में उच्च पदों पर रहे लेकिन असंगठित क्षेत्र के कामगारों पर बने राष्ट्रीय आयोग के अध्यक्ष के रूप में वर्ष 2004 में प्रस्तुत की गयी उनकी रिपोर्ट से उन्हें सबसे ज़्यादा ख्याति मिली। इस रिपोर्ट में एन एस एस की तमाम रिपोर्टों के विस्तृत विश्लेषण द्वारा उन्होंने यह निष्कर्ष दिया था कि देश के लगभग 70 प्रतिशत अर्थात लगभग 83.6 करोड़ लोग आज भी 20 रुपये रोज़ से कम में गुजारा करते हैं। उन्होंने इस रिपोर्ट में यह तर्क दिया था कि बिना इन लोगों की दशा सुधारे केवल लाभों को अधिकतम संभव करना किसी आर्थिक संवृद्धि का लक्ष्य नहीं होना चाहिये। उन्होंने यह भी लक्षित किया था कि गरीबी मिटाने के लिये जो विशाल धनराशि आवंटित की जाती है, उसका बड़ा हिस्सा सबसे ग़रीब लोगों तक पहुंच ही नहीं पाता, इसीलिये उनके सम्यक विकास के लिये विशेष लक्षित कार्यक्रमों और योजनाओं की ज़रूरत है। इस आयोग की अनुशंसा के चलते न केवल 2008 में असंगठित क्षेत्र सामाजिक सुरक्षा कानून बना, बल्कि बाद में ग़रीबी रेखा को लेकर चली बहस में भी इसकी बेहद अहम भूमिका रही। संसद के भीतर तथा बाहर भूमण्डलीकरण के समर्थकों के विकास के दावे को बेपर्द करने वाला यह आंकड़ा किसी सूत्र वाक्य की तरह प्रचलित हुआ। 

मृत्यु के समय वह राज्यसभा के सदस्य थे जहां वह अगस्त 2005 में चुने गये थे। वैसे प्रेसीडेंसी कालेज़, कलकत्ता से परास्नातक और मैसाच्यूट्स इंस्टीट्यूट आफ़ टेक्नालजी से अर्थशास्त्र में पी एच डी करने के बाद उन्होंने थोड़े समय के लिये लंदन स्कूल आफ इकानामिक्स और दिल्ली स्कूल आफ इकानामिक्स में अध्यापन भी किया था। इसके बाद उन्होंने 1981 से 1984 तक पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के विशेष सचिव (आर्थिक सलाहकार) पद पर कार्य किया। वह 1985 से 1990 तक विश्व बैंक के कार्यकारी निदेशक और बैंक के प्रबंध निदेशक के आर्थिक सलाहकार, तथा 1990 से 1993 तक यूरोपीय यूनियन में भारत के राजदूत रहे। इसके बाद वह 1993 से 1998 तक योजना आयोग के सदस्य सचिव रहे। राज्यसभा सदस्य रहते हुए वह संयुक्त राष्ट्र के विकास के अधिकार पर बने आयोग में भी स्वतंत्र विशेषज्ञ के रूप में सक्रिय थे। वहां उन्होंने गरीबी तथा मानवाधिकार हनन को पूर्णतः राष्ट्रीय अवधारणा की जगह एक वैश्विक समस्या के रूप में निरूपित किया था, और यह निष्कर्ष दिया था कि दुनिया भर के वंचित लोगों की भी दुनिया की संपदा तथा संसाधनों में न्यायसंगत हिस्सेदारी है ।

परंतु यहां हमें यह नहीं भूलना चाहिये कि वह 90 के दशक में शुरु किये गये सुधारों के विरोधी नहीं थे बल्कि उन्होंने 1980 के दशक में सरकारी उद्यमों के आर्थिक सुधार पर बने एक आयोग के अध्यक्ष के रूप में इन सुधारों की पूर्वपीठिका तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। आर्थिक सुधारों के आरंभिक दौर में वह विश्व बैंक के प्रबंध निदेशक के आर्थिक सलाहकार थे। दरअसल, वह नेहरु युग के उन मानवतावादी आर्थिक विचारकों में से थे जिनका मानना था कि एक पूंजीवादी व्यवस्था के भीतर भी सरकारी हस्तक्षेप तथा कल्याणकारी कार्यक्रमों द्वारा वंचित आबादी को यथेष्ट न्याय दिलाया जा सकता है। ऊपर उद्धृत रिपोर्ट में भी उन्होंने स्पष्ट किया है कि वह बाज़ार अर्थव्यवस्था या उदारीकरण के विरोधी नहीं लेकिन वंचित वर्गों को सरकार द्वारा सामाजिक सुरक्षा उपलब्ध करानी ही चाहिये। इसे एक विडंबना ही कहा जायेगा कि नव उदारवाद की जिन नीतियों के निर्माण में उनकी भूमिका रही, उन्हीं के कोख से उपजी भयावह वंचना को रेखांकित करने वाली रिपोर्ट ही अंततः उनके जीवन के सबसे महत्वपूर्ण योगदान के रूप में रेखांकित हुई। 

शनिवार, 19 दिसंबर 2009

आधुनिक अर्थशास्त्र का पिता





पाल एन्थनी सेमुएल्सन


(15 मई 191 से 13 दिसंबर 2009)



पाल ए सेमुएल्सन से मेरा परिचय अर्थशास्त्र के आम विद्यार्थियों की तरह स्नातक के पहले साल में आर्थिक सिद्धांत पर लिखी उनकी अतिप्रसिद्ध किताब ‘इकोनोमिक्स-ऐन इन्ट्रोडक्ट्री एनालिसिस‘ के माध्यम से हुआ था। 1948 के दौरान लिखी गयी यह किताब कीन्स की जेनेरल थियरी की ही तरह दुनिया भर के अर्थशास्त्र के विद्यार्थियों के लिये बेहद ज़रूरी किताब मानी जाती है। दरअसल दुनिया की चालीस भाषाओं में अनुदित उनकी यह किताब आधुनिक अर्थशास्त्र और विशेषकर कीन्सीय अर्थशास्त्र को समझने के लिये अद्वितीय किताब है जिसके बारे में एम आई टी में उनके सहयोगी जेम्स पोटेर्बा ने कहा था, ‘यह किताब एक शोधकर्ता और एक अध्यापक के रूप में और एक ऐसे व्यक्ति के रूप में जिसने समकालीन अर्थशास्त्र के हर पहलू कि जिम्मेदारी ली, सैमुएल्सन की विरासत है।‘ समकालीन अकादमिक जगत में किसी कोर्स की किताब का यूं किंवदंती बन जाना एक आश्चर्य ही है।


सेमुएल्सन नवकीन्सवाद के प्रणेताओं में से एक थे और नवक्लासिकीय अर्थशास्त्र के विकास में उनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। उन्होने नवक्लासिकीय तथा नवकीन्सीय सिद्धांतों को आपस में जोडकर जिस सैद्धांतिक व्यव्स्था को जन्म दिया था उसे नवक्लासिकीय सिंथेसिस कहा जाता है। कहना न होगा की पूंजीवादी अर्थशास्त्र का वर्तमान परिदृश्य इसी सैद्धांतिक अवस्थिति से संचालित है। इसीलिये आर्थिक इतिहासकार रेन्डल ने उन्हें ‘आधुनिक अर्थशास्त्र का पिता‘ कहा था। उनकी मृत्यु के बाद प्रकाशित एक आलेख में अमर्त्य सेन ने उन्हें ‘आधुनिक अर्थशास्त्र का सृजनकर्ता और पद्धति निर्माता‘ कहा है।



वह पहले अर्थशास्त्री ने जिन्होंने आर्थिक विवेचनाओं में गणितीय तथा भौतिकी सूत्रों का व्यापक प्रयोग किया।इस पद्धति का प्रमुख इस्तेमाल उन्होंने अर्थव्यवस्था के गतिमान तथा स्थैतिक संतुलनों के समेकन से वास्तविक संतुलन की स्थितियों के लिये गणितीय माडल प्रस्तुत करने में किया। इस प्रणाली ने सामान्य संतुलन सिद्धांत के विकास में बहुमूल्य योगदान दिया। ‘उपभोक्ता वरीयता सिद्धांत‘ में उनके द्वारा प्रस्तावित ‘प्रकट वरीयता सिद्धांत‘, कल्याण अर्थशास्त्र में किसी आर्थिक निर्णय के सामाजिक कल्याण पर प्रभाव को नापने के लिये दिये गये उनके ‘लिन्ढाल-सेमुएल्सन-बावेन स्थितियों के सिद्धांत‘, लोक वित्त के क्षेत्र में लोक तथा निजी वस्तुओं के आदर्श निर्धारण के लिये प्रस्तुत माडल और अंतर्राष्ट्रीय अर्थशास्त्र में उनके द्वारा विकसित दो ट्रेड माडल आधुनिक अर्थशास्त्र को दिये गये उनके तमाम अवदानों में सबसे उल्लेखनीय हैं। वह नोबल पुरस्कार पाने वाले पहले अमेरिकी अर्थशास्त्री थे 1970 में उन्हें सम्मानित करते हुए नोबेल पुरस्कार समिति ने कहा था कि, ‘‘सैमुएल्सन का सबसे बडा अवदान यही है कि उन्होंने अपने किसी भी अन्य समकालीन अर्थशास्त्री की तुलना में आर्थिक विज्ञान के सामान्य विवेचनात्मक एवं विश्लेशणात्मक स्तर के उन्नयन में अधिक योगदान दिया है। उन्होंने वस्तुतः आर्थिक सिद्धांत के एक बडे हिस्से का पुनर्लेखन किया है।‘‘


दरअसल, महामंदी और समाजवादी ब्लाक के उभरने के साथ-साथ पूंजीवादी जगत में कीन्सीय सिद्धांतों के पूरी तरह अप्रभावी हो जाने चलते फैली निराशा और सैद्धांतिक शून्य के माहौल में सैमुएल्सन के गणितीय सिद्धांतो के जरिये प्रस्तुत माडलों और नवक्लासिकीय सिंथेसिस द्वारा राज्य के देखरेख में पूंजीपतियों द्वारा बाजार के खेल का प्रस्ताव पूंजीवाद के लिये संजीवनी जैसा था। यही वजह थी कि न सिर्फ उन्हें पूंजीवादी जगत द्वारा हाथोंहाथ लिया गया अपितु अमेरिकी व्यवस्था ने भी उन्हें भरपूर मान-सम्मान दिया। वह न केवल अमेरीकी वित्त मंत्रालय के महत्वपूर्ण पदों पर रहे अपितु जान एफ कैनेडी और जानसन के आर्थिक सलाहकार भी रहे। आर्थिक उदारीकरण का नया युग उनके सैद्धांतिक प्रस्ताव के अनुरुप ही था यही कारण है कि भारत में उदारीकरण की शुरुआत होने पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा था कि - चलो अन्ततः भारत ने भी आर्थिक संवृद्धि का रास्ता खोज लिया।

मंगलवार, 22 सितंबर 2009

नारमन बोरलाग को याद करते हुए


हरित क्रांति के पिता कहे जाने वाले विश्वप्रसिद्ध कृषि वैज्ञानिक नारमन बोरलाग का गत 12 सितंबर को अमेरिका के टैक्सास शहर के डलास स्थित अपने घर में कैंसर की लंबी बीमारी के बाद देहांत हो गया। टेक्सास विश्वविद्यालय के प्रोफेसर रहे बोरलाग को ‘‘विकासशील देशों में ऊंची पैदावार वाली गेहूं की फ़सलों की नस्लों के विकास तथा कृषि के क्षेत्र में नवोन्मेष द्वारा भूख के खि़लाफ़ संघर्ष में उल्लेखनीय योगदान’’ के लिए 1970 में नोबेल पुरस्कार समिति ने शांति के क्षेत्र में सम्मानित किया गया था - शांति के क्षेत्र में इसलिए कि कृषि के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार नहीं दिये जाते। उस अवसर पर नोबेल शांति पुरस्कार समिति के अध्यक्ष एसी लायने ने कहा था कि ‘ इस दौर के किसी अन्य व्यक्ति की तुलना में बोरलाग ने भूखे लोगों को रोटी उपलब्ध कराने में अधिक सहायता की है, हमने उन्हें यह पुरस्कार इस उम्मीद में दिया है कि रोटी की उपलब्धता अंततः दुनिया में शांति भी ले आयेगी।’’

उनकी मृत्यु पर शोक व्यक्त करते हुए जाने-माने कृषि वैज्ञानिक और राज्यसभा सदस्य एम एस स्वामीनाथन ने कहा कि ‘‘1960 के दशक में जब पाॅल और विलियम पैडक ने अपने शोध के बाद स्पष्ट कह दिया था कि भारत को अब दुनिया की कोई ताक़त भूखमरी और अकाल से नहीं बचा सकती थी और पाल एहरिलिच ने अपनी किताब ‘द पापुलेशन बम’ में इसकी पुष्टि कर दी थी तो यह बोरलाग का अथक प्रयास ही था कि हरित क्रांति द्वारा योजनाबद्ध तरीके से उत्पादकता की वृद्धि कर अकाल के उस खतरे को टाला जा सका।’’ भारतीय कृषि को उनके योगदान के महत्व को इस प्रकार से भी समझा जा सकता है कि आमतौर पर बुद्धिजीवियों के मरने- जीने से असंबद्ध रहने वाले राजनीतिक समाज के हर कोने से भी उनकी मृत्यु के बाद काफी प्रतिक्रियायें आईं। राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, कृषि मंत्री, बिहार तथा आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्रियों सहित पक्ष- विपक्ष के तमाम महत्वपूर्ण नेताओं ने इस अवसर पर शोक व्यक्त करते हुए भारत के प्रति उनकी सेवाओं को याद किया।
नार्वेजियन- अमेरिकन समुदाय के बोरलाग का जन्म आयोवा में क्रेस्को के निकट साद में अपने बाबा के कृषि फार्म में हुई थी, जहां अपने जीवन के आरंभिक वर्षों में उन्होंने खेती-बारी और पशुपालन करते हुए बिताये। वहां के हावर्ड काउन्टी के जिस एक कमरे के ग्रामीण स्कूल में उन्होने आठवीं तक की पढ़ाई की थी हव अब नारमन बोरलाग हेरिटेज़ फाउन्डेशन द्वारा संचालित किया जाता है। बाद मंे वह क्रेस्को हाईस्कूल गये और फिर महामंदी के उस दौर में ‘नेशनल यूथ प्रोग्राम’ के तहत चलाये जा रहे प्रशिक्षण कार्यक्रम के तहत उन्हें उच्च शिक्षा के लिए 1933 में मिनेसोटा विश्वविद्यालय में दाखिला मिला। मुख्य प्रवेश परीक्षा में असफल रहने के कारण उन्हें नये-नये खुले जनरल कालेज में प्रवेश मिला जहां पर उनके अच्छे प्रदर्शन के बाद अंततः उन्हें अपने पसंदीदा विषय ‘कृषि वानिकी’ की पढ़ाई करने का मौका मिला। हालांकि स्थितियां अब भी प्रतिकूल थीं और उन्हें अपनी पढ़ाई का ख़र्च उटाने के लिए बार-बार छोटी-मोटी नौकरियां करनी पड़ीं। स्नातक की उपाधि उन्हें 1937 में मिली लेकिन इसके पहले ही वह अमेरिकी वानिकी सेवा में अपनी नौकरी के दौरान देश के कुछ सबसे ग़रीब इलाकों में भूख की भयावहता का अनुभव कर चुके थे। स्नातक के अंतिम वर्षों में प्रसिद्ध कृषि वैज्ञानिक और पादप चिकित्सा के विशेषज्ञ एल्विन चाल्र्स स्टाकमैन के ‘ हमारे खाद्यान्नों को नष्ट करने वाले छोटे घूमंतू कीट ’ विषय पर दिये गये भाषण ने उनकी रुचि की दिशा पादप चिकित्सा की ओर मोड़ दी और कालांतर में अपने परास्नातक तथा शोध के लिए उन्होंने इसे ही आधार बनाया। 1942 में अपना शोध समाप्त करने के बाद उन्होंने ड्यूपोन्ट के डेलवेयर में माइक्रोबायोलाजिस्ट के रूप में काम करना शुरु किया लेकिन द्वितीय विश्वयुद्ध के कारण आगे शोध की उनकी योजना पूरी नहीं हो सकी। विश्वयुद्ध के दौरान अमेरिकी सेना की सहायता के लिए उन्होंने कई छोटे-मोटे प्रयोग किये।
विश्वयुद्ध के बाद अमेरिकी उपराष्ट्रपति हेनरी वालेस ने राकफेलर फाउंडेशन की सहायता से मैक्सिको की कैमाचो सरकार की कृषि क्षेत्र में मदद के लिए एक विशेष विभाग ‘द आॅफिस आफ स्पेशल स्टडीज’ की स्थापना की, जिसे मैक्सिको की सरकार के अधीन काम करना था, परंतु इसका संचालन राकफेलर फाउंडेशन द्वारा ही होना था। इस विभाग में अमेरिका तथा मैक्सिको दोनों के ही वैज्ञानिकों को शामिल होना था और इसका मुख्य उद्देश्य वहां ज़मीनों का सुधार, गेहूं तथा मक्के की पैदावार में बढ़ोत्तरी व कीटनाशकों का विकास था। कैमेचो की इस सहायता के मूल में वहां होने वाले विकास में सहयोग कर अमेरिका के दीर्घकालिक सामरिक तथा आर्थिक हितों को सुनिश्चित करना था। इस विभाग की स्थापना तथा मैक्सिको की कृषि व्यवस्था के ‘सुधार’ के लिए राकफेलर फाउण्डेशन ने स्टाकमैन को चुना। स्टाकमैन ने जे जार्ज़ हरार को इसके प्रोजेक्ट लीडर के रूप में चुना और हरार ने वहां स्थापित सहकारी गेंहू शोध और उत्पादन कार्यक्रम की ज़िम्मेदारी नारमन बोरलाग सौंपी। शुरुआती झिझक के बाद उन्होंने यह जि़म्मेदारी स्वीकार की और यहीं से शुरुआत हुई उनके लंबे सफ़र की कालांतर में जिसका एक पड़ाव भारत भी बना।

मैक्सिको में बोरलाग ने गेंहू की पैदावार बढ़ाने के लिये फसलों की आनुवांशिकता, उत्पादन संवर्धन, कीट विज्ञान, मृदा विज्ञान आदि के क्षेत्र में व्यापक प्रयोग किये। सोलह वर्षों के लंबे प्रयोगों के बाद वह गेंहू की नई उच्च उत्पादकता वाली अर्द्ध-बौनी प्रजातियां विकसित कर पाने में सफल हुए जिसकी एक बड़ी विशेषता उच्च स्तरीय रोग प्रतिरोधकता भी थी। अपने अधिकारियों के विरोध के बावजूद उन्होंने इस प्रयोग को कम पैदावार वाले क्षेत्रों से आगे विस्तारित करते हुए साल में गेंहू की दो फसलें बोने के लिए किसानों को प्रोत्साहित किया। इस प्रयोग ने मैक्सिको में गेंहू की पैदावार में उल्लेखनीय वृद्धि की और आयात पर उसका निर्भरता को कम किया।

1961-62 में बौने गेंहू की प्रजाति को अमेरिका के कृषि मंत्रालय ने अपनी प्रयोगशालाओं में भेजा। उसी दौरान भारत में सबसे पहले पूसा स्थित भारतीय कृषि शोध संस्थान में इस गेंहू की कुछ किस्मों को प्रायोगिक तौर पर उगाया गया। इसके बाद एम.एस स्वामीनाथन के प्रयासों से कृषि मंत्रालय ने राकफेलर फाउण्डेशन के माध्यम सेे बोरलाग को भारत आने का निमंत्रण दिया। मार्च 1963 में वह डा. राबर्ट ग्लेन एण्डरसन के साथ पहली बार भारत आये। अक्टूबर 1963 में 100 किलो उन्नत गेहूं की फसलों के साथ उन्होंने दिल्ली, लुधियाना, कानपुर, पन्तनगर, पुणे और इन्दौर में अपने प्रयोग शुरु किये। 1962 के युद्धकालीन दौर में भारत अकाल जैसी परिस्थितियों से गुजर रहा था और अमेरीका से भारी आयात के बावजूद यहां अनाज की भारी किल्लत थी। बावजूद इसके इन प्रयोगों के पूंजी आधारित होने और सांस्कृतिक अवस्थितियों से मेल न खाने के कारण शुरु में बोरलाग को सरकार का समर्थन नहीं मिला। लेकिन 1965 आते -आते स्थितियां इतनी गंभीर हो गयीं कि सभी आपत्तियों को दरकिनार करते हुए भारत सरकार ने बोरलाग को अपने प्रयोगों को व्यापक पैमाने पर विस्तारित करने की अनुमति दे दी। इस दौर में एन्डर्सन और स्वामीनाथन के साथ मिलकर बोरलाग ने अर्धबौनी प्रजाति के गेहूं के बीजों का व्यापक पैमाने पर भारतीय कृषि में प्रयोग शुरु किया।शुरुआती परेशानियों के बावजूद इन बीजों ने उम्मीद से बेहतर परिणाम दिये।एल आर 64 और सोनोरा 64 के बीजों की उत्पादकता इतनी उच्च स्तर की रही की जल्दी ही ये भारतीय किसानों के लिये परिचित शब्द बन गये।
इन बीजों की मांग का आलम यह था कि 1966 में भारत ने 1800 टन बीजों का आयात किया। इन बीजों और उन्नत तकनीक के प्रयोग से भारत तथा दक्षिण एशिया के कई देशों में गेहूं की पैदावार में अभूतपूर्व वृद्धि हुई। जहां पाकिस्तान 1962 तक खाद्यान्नों के क्षेत्र में पूरी तरह से आत्मनिर्भर हो चुका था वहीं भारत में गेहूं का उत्पादन 1965 के 12।2 मिलियन टन से बढकर 1970 में 20.1 मिलियन टन हो गया और 1974 में हम अपनी गेहूं की जरूरतें खुद पूरी करने लगे थे। इसी सफलता से उत्साहित होकर यू एस एजेन्सी फार इन्टरनेशनल डेवेलपमेण्ट के विलियम गौड ने इस परिघटना को 1968 में हरित क्रांति का नाम दिया - हालांकि बोरलाग कभी इस शब्दावली से सहमत नहीं हुए।

फिर भी चाहे इसे हरित क्रांति कहें या न कहें लेकिन साठ और सत्तर के दशक की उस परिघटना ने भारतीय कृषि के परिदृश्य को पूरी तरह बदल दिया। एक तरफ उत्पादकता में अभूतपूर्व वृद्धि हुई तो दूसरी तरफ भूमि सुधार, बंजर जमीनों को कृषि योग्य बनाने की योजनायें आदि पूरी तरह बिसरा दी गयीं। जाने-माने कृषि वैज्ञानिक पाल वैगनर के एक अध्ययन के मुताबिक उच्च उत्पादकता वाले इन बीजों पर अत्यधिक निर्भरता के कारण भारत में लगभग 100 मिलियन एकड बंजर जमीनों को कृषि योग्य बनाये जाने की प्रक्रिया शुरु ही नहीं की जा सकी। कृषि की यह परियोजना अपने मूल में बडे़ किसानों और खास फसलों के पक्ष में थी। जमीनों को इन नयी प्रजातियों के योग्य बनाने के लिये तथा इन फसलों को कीटों से बचाने के लिये भारी मात्रा में उर्वरकों और कीटनाशकों की जरूरत पड़ी, जिसके चलते छोटे और सीमांत किसानों के लगातार कृषि मजदूरों में संक्रमण की प्रक्रिया तेज हुई। यही नहीं, इन उन्नत बीजों के प्रयोग से फसलों की विविधता नष्ट हुई। वर्षोंं से बोयी जाने वाली तमाम फसलें परिदृश्य से बाहर हो गयीं और कालांतर में उर्वरकों के नियमित प्रयोग से जमीनें इन फसलों के लिये अयोग्य हो गयीं। खाद और कीटनाशकों पर अत्यधिक निर्भरता का प्रभाव पंजाब और मध्य प्रदेश सहित कई जगहों पर पारंपरिक रूप से उपजाऊ रही जमीनों की उर्वरकता के नष्ट होने के रूप में भी सामने आया है।

अलबत्ता इन तकनीकों से अमेरीका की बीज, खाद और कीटनाशक बनाने वाली सिजेंटा और मोसेंटों जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को अंधाधुंध लाभ हुआ। भारत जैसे बडे विकासशील देशों में इनके लिये एक नियमित बाजार का निर्माण हुआ। यही वजह थी की बोरलाग न केवल दक्षिण एशियाई देशों अपितु अमेरीकी सत्ता वर्ग के भी अत्यंत प्रिय रहे और उन्हें समय-समय पर तमाम पुरस्कारों से नवाजा गया। इन्हीं कंपनियों के दबाव में कृषि के पूंजीवादीकरण का जो एजेण्डा लागू हुआ उसकी तार्किक परिणिति भारत में किसानों की आय में भयावह असमानता, पारंपरिक कृषि उत्पादनों के क्षरण और व्यापक पैमाने पर आत्महत्या जैसी परिघटनाओं में हुई। इन नीतियों से मिले तात्कालिक लाभ भी दीर्घजीवी साबित नहीं हुए और 2005 आते-आते एक बार फिर देश में खाद्यान्न संकट की पदचापें सुनायी देने लगीं।
खाद और कीटनाशकों पर अत्यधिक निर्भरता का प्रभाव पंजाब और मध्य प्रदेश सहित कई जगहों पर पारंपरिक रूप से उपजाऊ रही जमीनों की उर्वरकता के नष्ट होने के रूप में भी सामने आया है। हरित क्रांति के रोल माडल रहे पंजाब पर केन्द्रित अपनी किताब ‘‘ वायलेंस आफ ग्रीन रेवोल्यूशन’’ में वंदना शिवा ने पंजाब में इसके प्रभावों का विस्तृत अध्ययन किया है। उनका मानना है कि ‘‘तुरंत उच्च उत्पादकता लेने के चक्कर में जिस तरह वैकल्पिक कृषि विकास माडलों की अनदेखी की गयी उसने पंजाब की कृषि अर्थव्यवस्था को दीर्घकाल में नष्ट कर दिया। आज वहां जमीने बंजर हो रही हैं, जैव विविधता नष्ट हो गयी है, भू पट्टी का क्षरण हो रहा है, जमीनों में पोषक तत्वों की मात्रा घट गयी है, भारी मात्रा में छोटे किसानों का पलायन हुआ है, गांवों में गरीबी बढ़़ी है और साथ ही तनाव और हिंसा।

इस पूरी परिघटना का अगर किसी को फायदा हुआ है तो बस उर्वरक तथा कीटनाशक उद्योग,बडी पेट्रोकेमिकल कंपनियों,कृषि संबंधित औजारों के उत्पादकों, बड़े पुलों के निर्माताओं और बडे भूस्वामियों को। हरित क्रांति का जादू बस नये रोगों और कीटनाशकों के पैदा करने तक सिमट कर रह गया है।’’

पूर्व मे उद्धृत नोबल शांति पुरस्कार समिति के प्रशस्ति पत्र में जिस ‘‘भूख के विनाश और उससे पैदा होने वाली शांति’’ की बात की गयी थी उसे तो आॅकलैण्ड स्थित ‘खाद्य एवं विकास नीति संस्थान’ के कार्यकारी निदेषक एरिक हाॅल्ट गिमनेज द्वारा प्रस्तुत हालिया रिपोर्ट ‘विष्व खाद्य संकटः इसके पीछे क्या है और तो ‘अंर्तराष्ट्रीय खाद्य नीति एवं षोध संस्थान द्वारा प्रस्तुत दूसरी रिर्पोर्ट दुनिया भर के देषों के लिए बनाए गये ‘भूमण्डलीय भूख सूचकांक’ द्वारा पेश आंकड़े ही खारिज कर देते हैं जिनके अनुसार 1974 में विकासषील देषों में 5 करोड़ लोग भूखे थे और दुनिया से भूख मिटाने के सारे दावों के बावज़ूद 1996, 2006 और 2008 में यह लगातार बढकर क्रमषः 8।3 करोड, 8.5 करोड़ और 8.62 करोड़ हो गई।

साफ है कि अपने सारे नवोन्मेष और सदिच्छाओं के बावजूद बोरलाग मूलतः और अंततः आम जन नहीं पूंजीवादी जगत के ही सहायक बने। एक पूंजीवादी व्यवस्था में सारे नवोन्मेषों की यह तार्किक परिणिति ही है। इन सबके बावजूद वह एक ऐसे मानवतावादी वैज्ञानिक के रूप में हमेशा याद किये जायेंगे जिसने अनेक विकासशील तथा गरीब देशों को साठ और सत्तर के दशक में अकाल के संकट से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।