शुक्रवार, 27 नवंबर 2009

नरसिंहपुर जिले के गाडरवारा तहसील में दलित समुदाय के साथ दबंग सवर्ण/गैर दलित जातियों द्वारा किए जा रहे अत्याचार और उत्पीड़न के मामलों की फैक्ट फाइंडिंग



जिला - नरसिंहपुर (मध्य प्रदेष)तहसील - गाडरवाराप्रभावित क्षेत्र - गाडरवारा के आस-पास के गाॅवों के दलित (अहिरवार समुदाय)फैक्ट फाइंडिंग टीम द्वारा भ्रमण किए गए गाॅव -नान्देर, मड़गुला, देवरी और टेकापारदिनांक - 07 और 09 नवम्बर 2009नागरिक अधिकार मंच और युवा संवाद मध्य प्रदेश द्वारा जारी


फैक्ट फाइंडिंग टीम सदस्य : जय भीम, मूलचंद अहिरवार, जावेद, स्कंद शुक्ला, मनोज, ,सत्यम, शिव कुमार, निशांत कौशिक


जिले का परिचय


नरसिंहपुर जिला मध्यप्रदेश के जबलपुर संभाग के अंर्तगत आता है। नरसिंहपुर मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल व जबलपुर के बीच में स्थित है। नरसिंहपुर का आर्थिक क्रियाकलाप मुख्यतः गन्ने व दाल की खेती है। नरसिंहपुर में राजपूत , लोधी, पटेल, किरार व अहिरवार समुदाय की आबादी ज्यादा है। गाडरवारा नरसिंहपुर की प्रमुख तहसील है। गाडरवारा नरसिंहपुर की प्रमुख तहसील गाडरवारा की आबादी 70 से 80 हजार जिसमंे अहिरवार समाज के लगभग 38 से 40 हजार लोग है। गाडरवारा की 80 से 85 फीसदी आबादी खेती के कार्यों में संलग्न है। इसमें खेतिहर मजदूर और भूमिहीन किसानों की तादाद ज्यादा है। इन खेतिहर मजदूरों में अधिकंाष आबादी दलित समुदाय की है। जिसमें सबसें ज्यादा अहिरवार (चमार) जाति के लोग है। संविधान के अनुसार यह जाति अनुसूचित जाति में षामिल है। पूरे भारत में अनुसूचित जाति की जनसंख्या में एवं हिन्दी क्षेत्र में चमार जाति (जो कि अपमानसूचक संबोधन है) की संख्या सबसे ज्यादा है। भारत में यह 700 से ज्यादा उपनाम से चिन्हित की जाती है। गाडरवारा के आस-पास के लगभग सभी गांव में अहिरवार समुदाय के लोग निवास करते हैं। उनकी यहां के सामाजिक-आर्थिक क्रियाकलापों में उपयोगी भूमिका है। अहिरवार समुदाय का सामुहिक निर्णय और मौजूदा उत्पीड़न की शुरूआतअहिरवार समाज महापरिषद द्वारा गाडरवारा तहसील में पिछले एक वर्ष से समुदाय द्वारा मृत मवेषी न उठाने के लिए आम सहमति बनाई जा रही थी जिसके तहत गांवों में अहिरवार समुदाय के लोगों द्वारा इस घृणित कार्य को बंद किया जाए और सवर्णों द्वारा मवेषी उठाने के कारण सदियों से चली आ रही छुआछूत व भेदभाव को कम किया जा सके। तत्पष्चात कई गावों में अहिरवार समुदाय के लोगों ने इस वर्ष के जुलाई-अगस्त के महीने से ही मृत मवेषी उठाना बंद कर दिया है। अहिरवार समुदाय की महापरिषद द्वारा मध्य प्रदेष स्तर पर अक्टूबर 2009 में तय किया गया कि अब समुदाय द्वारा मृत मवेशी नहीं उठाए जाएगें।उत्पीड़न का सामाजिक इतिहासभारत के सामाजिक इतिहास में यह बात स्पष्ट है कि हमारी सामाजिक संरचना में एक प्रकार की श्रेणीबद्धता ने समाज में, भेदभाव और छुआछूत जैसी अन्यायमूलक संरचनाओं को प्रतिस्थापित किया है। जिसे समाज की अन्य संरचनाओं द्वारा पोषित और बनाए रखा गया है। आजाद देश में संविधान में सामाजिक न्याय की पुरजोर वकालत के बावजूद सामाजिक असमानता हमारी समाजिक प्रणाली की प्रमुख विषेषता है। जिसमें ऊॅच-नीच के भेदभाव के आधार पर लोगों की गरिमा, आत्म सम्मान और मानवाधिकार अवरूद्ध होते रहे हंै। गाडरवारा के दलित समुदाय के साथ उत्पीड़न और शोषण की जड़े भी इनमें ही निहित हैं। अहिरवार समुदाय के पूर्वजों पर पूर्वकाल से ही सामाजिक कार्य विभाजन के दौरान मृत मवेशी उठाने का भार इस समुदाय पर डाला गया था और षताब्दियों से इन्हीं के द्वारा इस तरह का अमानवीय कार्य संपन्न किया जाता रहा है। पर आश्चर्य यह है कि इस काम को लेकर समाज द्वारा नीच व अपमानजनक कार्य का नजरिया भी बराबर विकसित किया गया है। जो कि अहिरवार जाति विषेष से छुआछूत व उत्पीड़न का ठोस आधार पहले भी रहा है और अब भी बना हुआ है। हांलाकि नये संवैधानिक कानून अनुसूचित जाति- जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम - 1989 के तहत मरे हुए जानवर उठाना एक घृणित काम है और इस काम के लिए किसी को बाध्य नहीं किया जा सकता है। पर गाडरवारा के गाॅवों की सच्चाई ठीक इसके विपरीत है। फैक्ट फाइंडिंग टीम द्वारा क्षेत्र में निरीक्षण की विस्तारित रिपोर्ट गाडरवारा क्षेत्र में दलितों द्वारा उनके साथ हो रहे उत्पीड़न के विरोध व प्र्शासन को लगातार शिकायतों व दोषियों के खिलाफ कार्यवाही की मांग किए जाने के बावजूद प्रशासन का रवैया उदासीन एवं ढीला रहा है। जबकि 5 से 7 गाॅवों से दलितों द्वारा उनके साथ मारपीट और उत्पीड़न की लगातार षिकायतें दर्ज कराई जाती रही हैं।आज के हालात यह है कि इन गाॅवों में गैर दलित (सवर्ण) जातियों के लोगों द्वारा सामुहिक अत्याचार कम नहीं हुए बल्कि और गहरे हो गये है। ऐसे में आव्श्यकता महसूस की गयी कि एक स्वतं़त्र फैक्ट फाइंडिग टीम के माध्यम से घटनाओं को गहराई से देखा और जाॅचा जाए।गाडरवारा के 4 गाॅवों में स्वतंत्र फैक्ट फाइंडिग के दौरान चार अलग-अलग गाॅवों में टीम के सामनें जो तथ्य सामने आये उसकी विस्तृत रिपोर्ट यहां दी जा रही है।

गांव- देवरी
देवरी गाॅव में अहिरवार समुदाय की हालत गंम्भीर है। यहां सवर्णों /गैर दलित जाति के लोग दलितों को प्रताड़ित करने के क्रुरतम तरीके अपना रहे हैं। मृत मवेशी न उठाने के निर्णय के बाद सवर्ण जाति के लोगांे ने अहिरवार समाज की सार्वजनिक नाकेबंदी कर दी साथ ही गांव में सरकारी मार्ग क्र। 128 की अस्पष्टता के कारण अहिरवार समुदाय के लोंगों का घर से निकलना बंद हो गया है। पूरा समुदाय अपने ही गांव में कैद कर दिया गया है।


फैक्ट फाइनडिंग टीम के सामने निम्न तथ्य निकल कर आए-


1-दैनिक क्रियाकलाप के लिए आवश्यक चीजों पर प्रतिबंध


1- गांव में किराना की एकमात्र दुकान से सामान लेने पर मनाही।


2- मोहल्ले के सार्वजनिक नल से पानी न भरने देना।


3- बसों पर यात्रा करने पर रोक।


4- सब्जी वाले ,अनाज वाले धोबी, नाई ,अखबार वाले आदि को दलित बस्ती में जाने से रोक।


5- आटा चक्की से अनाज पिसाने पर रोक।


6- सामुदायिक ग्राम पंचायत भवन पर प्रवेश पर रोक।


2- बच्चों और महिलाओं पर अत्याचार,


देवरी गांव के सवर्ण जाति के बब्लू, जगदीश और पप्पू ने अहिरवार समुदाय की 9 वर्षीय बच्ची देवकी के सिर पर वार कर उसको घायल कर दिया। वहीं विमला बाई को गैर दलित देवेन्द्र किरार ने धमकी देते हुए कहा कि अगर तुम लोग ने हमारे खेतो ंमें पैर रखा तो तुमको नंगा करके पूरे गांव में घुमाएगें। गांव की प्राथमिक स्कूल में पढ़ रहे छात्र योगेश अहिरवार ने बताया कि हमें मध्यान्ह भोजन अलग प्लेट में दिया जाता है और अपनी प्लेट भी खुद धोने के लिए कहा जाता है।


3-जान से मारने की धमकी और हथियार बंद घेराव


हरि सिंह अहिरवार और ओंकार अहिरवार ने फैक्ट फाइनडिंग टीम को बताया कि अर्जुन गुर्जर, नेपाल गुर्जर, व घनश्याम गुर्जर (गैर दलित) हमें लगातार जान से मारने की धमकी दे रहे हंै। वो कहतंे हैं कि तुम लोग ही सबसे ज्यादा शिकायत करते हो।इसके आलावा अक्टूबर के महीने में गांव के सरपंच के माध्यम से झगड़े के निपटारे के लिए बुुलाई गयी बैठक में अहिरवार समुदाय के पहुंचने पर करीब 100 से ज्यादा हथियार बद्ध गैर दलित जाति के लोगों ने उन्हें घेर लिया। अहिरवार समाज के लोग बड़ी मुष्किल से वहां से जान बचाकर निकाले।


4-दलित और ग्रामीण जनता के लिए चल रही योजनाओं को ठप्प करना


केन्द्र व राज्य सरकार के सहयोग से चल योजनाओं जिनमें नरेगा, निराश्रित पेंशन योजना, इंदिरा आवास योजना, मजदूर सुरक्षा योजना और भूमिहीन किसानों को जमीन वितरण जैसी अनेक योजनाओं में अहिरवार समुदाय के हितग्राहीओं को साफ तौर पर वंचित कर दिया गया है। वंषीलाल अहिरवार, प्रकाश, विनोद और विषाल अहिरवार, मलखाम अहिरवार सहित अन्य लोगांे के नरेगा के जाॅब कार्ड सरपंच ने अपने पास रख लिए हैं। 70 वर्षीय हरकिषन सिंह अहिरवार की पेंशन का भुगतान चार महीने से नहीं किया गया है। इसके साथ ही वंशीलाल, करोड़ी प्रसाद समेत 12 लोगों को इंदिरा आवास के अन्र्तगत निर्धारित रकम अदा नहीं की जा रही है।


5-भूखों मरने की कगार परभूमिहीन अहिरवार


किसानों द्वारा सवर्णों के खेतों पर बटाईदारी बन्दोबस्त(ऐसी व्यवस्था जिसमें भूमि का मालिक कृषि के लिए एक बटाईदार रखता है। फसल उगाने से लेकर काटने तक की जिम्मेदारी और खर्चे बटाईदार करता है पर उपज पर उसका हिस्सा फसल के आधार पर 1/4 से लेकर 1/10 तक मालिक द्वारा तय किया जाता है।) के आधार पर जून माह में जो फसल बोयी गयी थी उसके तैयार होने पर दबंग जाति के लोगों ने फसल पर हिस्सा देने से मना कर कर दिया और जबरन हार्वेस्टर के जरिए फसल काट ली। पिछले साल से सूखे की मार झेल रहे अहिरवार समुदाय के लोगों को अब खाने के लिए भी मोहताज होना पड़ रहा है अगर हालात यही रहे तो गांव का लम्बी भूखमरी का षिकार होना तय है।आर्थिक प्रतिबंध- देवरी गांव में अहिरवार समुदाय के लगभग समस्त परिवार भूमिहीन है। वे सवर्णों के खेतों में बटाई व मजदूरी कर गुजारा करतें है। मवेषी न उठाने के निर्णय के बाद अहिरवार समुदाय पर घोषित तौर पर आर्थिक प्रतिबंध लगा दिया है। गांव वालों ने फैक्ट फाइनडिंग टीम को बताया कि इस बार गांव में किसी भी अहिरवार समाज के व्यक्ति को उसका हिस्सा नहीं दिया गया है। कई अन्य लोगों को मजदूरी भी नहीं दी गयी। गांव के लोगों ने फैक्ट फाइनडिंग टीम को बटाई में हिस्सा न मिलने के बारे में विस्तार से बताया उनमें से कुछ के नाम नीचे दीये जा रहें हैं जिनकी फसल या तो काटा ली गयी है या खेत में घुसने नहीं दिया जा रहा है।


देवरी गांव में उपज में हिस्सा न मिलने वालों की सूची-
क्रÛ बटाईदार/अहिरवार समुदाय भू-स्वामी/गैर दलित समुदाय बोयी गयी फसल का क्षेत्र फसल


1 वंशीलाल अहिरवार पुरूषोत्तम अग्रवाल 5 एकड़ सोयाबीन व धान


2 वंशीलाल अहिरवार देवी सिंह पटेल 3 एकड़ धान


3 विशाल अहिरवार धन सिंह कड़कौल


4 एकड़ सोयाबीन और धान4 पुरूषोत्तम अहिरवार रामकुमार थापर 2 एकड़ धान


5 पुरूषोत्तम अहिरवार अमान पटेल 2 एकड़ धान


6 अजब सिंह अहिरवार एकम सिंह गुर्जर 6 एकड़ सोयाबीन एवं धान


7 प्रकाश अहिरवार चन्दर गुर्जर 2 एकड़ धान


8 गोपाल अहिरवार झुम्मक गुर्जर 3 एकड़ धान


9 पंचम अहिरवार इन्द्रपाल गुर्जर 5 एकड़ सोयाबीन, गन्ना, धान


10 पोटाई अहिरवार पोटाई करात 10 एकड़ सोयाबीन व धान


11 नेपाल अहिरवार नेपाल गुर्जर 9 एकड़ धान


12 मलखाम अहिरवार मदन पटेल 3 एकड़ धान
6-मृत मवेशी अहिरवार समुदाय की बस्ती में डालना


गुर्जर (सवर्ण) द्वारा मलखाम सिंह अहिरवार के घर के सामने मृत मवेशी जबर्दस्ती डाला गया। वहीं विशाल अहिरवार के घर के सामने पोखरे में निरंतर मवेशी डाले जा रहें है।दंबग जाति के लोगों ने सामुदायिक भवन के पास भी मृत पशु डाल दिया। जाहिर है कि इससे गांव के दूसरे सार्वजनिक काम प्रभावित हुए।नरेगा के तहत काम के अधिकार से बेदखलनरेगा के काम पर मृत मवेशी न उठाने के निर्णय का व्यापक असर पड़ा है। नरेगा के माध्यम से चल रहे कामों से अहिरवार समुदाय के लोगों को वंचित कर दिया गया है। उनके कार्यो को दूसरे अन्य लोगों करवाया जा रहा है।प्रषासन की तरफ से कार्यवाहीदेवरी गांव के लोगों ने लगातार दो बार अनुविभागीय दंडाधिकारी गाडरवाला को नामजद शिकायत पत्र दिया बावजूद इसके एस।डी.एम द्वारा सांत्वना देकर मामले को आज तक टाला जाता रहा है।



गांव- टेकापार
टेकापार गांव की स्थिति भी दूसरे गांव से जुदा नहीं है। यहां पर भी दलित अहिरवार समुदाय को सवर्ण/गैर दलित जाति के लोगों द्वारा सामुहिक बहिष्कार और अत्याचार का सामना करना पड़ रहा है। टेकापार में आधे से ज्यादा आबादी दलित समुदाय की है। यहां पर अहिरवार समाज के लोगों में से केवल 13 लोगों के पास ही कुल 3 एकड़ जमीन है बाकि सब खेतिहर मजदूर हैं। अतः सवर्ण भूस्वामियों पर स्थायी रूप से निर्भर हैं।अक्टूबर के दूसरे सप्ताह में सवर्ण जाति के लोगों द्वारा अहिरवार समाज के कुछ लोगों को बुलाया गया और पूछा गया की तुम लोग मरे हुए जानवर उठाओगे कि नहीं? अहिरवार समुदाय के व्यक्तियों द्वारा अपने समाज के निर्णय से उन्हें अवगत करा दिया गया। अगले दिन सवर्ण जाति की तरफ से फरमान जारी हुआ कि अगर अहिरवार समुदाय के लोग सवर्णो के खेत से निकलतें हैं तो उन्हें 1000 रू. का जुर्माना देना होगा।यह क्रम यहीं नहीं रूका बल्कि इसके बाद दैनिक उपयोग की सामग्री की दुकान, सार्वजनिक नल , आटा चक्की एवं अन्य सार्वजनिक जगहों के इस्तेमाल करने पर पाबंदी थोप दी गयी। घर निर्माण के लिए आवष्यक मिट्टी जो सार्वजनिक स्थलों से ली जाती थी, पर जबर्दस्त रोक लगा दी गयी है। नेतराम अहिरवार बतातें हैं कि मिट्टी खुदाई का काम सामुहिक रूप से होता आया है पर अब वो मिट्टी लेने पर हमें धमकाते हैंै।साहेब सिंह अहिरवार ने टीम को बताया कि मैं सवर्ण के खेत में बटाईदार हूं पर अभी तक बटाई का हिस्सा मुझे नहीं मिला है।स्वराज सुरिया (सवर्ण) ने अमान अहिरवार को गांव की सार्वजनिक कांक्रीट सड़क से भी आने-जाने से रोका और प्रतिरोध करने पर जान से मारने की धमकी भी दी। वहीं नेतराम अहिरवार जब अपने खेती के उपकरणों की मरम्मत कराने गांव के लोहार जीवन विष्वकर्मा के पास गए तो उसने कहा कि अहिरवार समुदाय का कोई भी काम करने की मनाही है। वहीं मोहनलाल अहिरवार को मजदूर सुरक्षा योजना के माध्यम से प्रसूति के लिए मिलने वाला पैसा नहीं दिया जा रहा है। उपज में हिस्सा देने की उत्पीड़नकारी शर्तआगे चलकर गांव में हिंसक वारदात की आशंका और दबंग जातियों के दबाव के कारण 70 वर्षीय फुल्लू अहिरवार को मृत मवेषी उठाना स्वीकार करना पड़ा। तब जाकर सवर्णों के खेतों में उनका और अन्य कुछ अहिरवार समुदाय के लोगों को बटाईदारी में मामूली हिस्सा मिला।समुदाय को अंत्योदय योजना का कार्ड नहीं गांव के ग़रीबों के लिए वितरित किए जाने वाले अंत्योदय के कार्ड में भारी घपला किया गया है। नियमतः यह कार्ड गांव के खेतिहर मजदूर व गरीब दलित के लिए है पर संपन्न सवर्णों के नाम पर कार्ड आवंटित है। और बहुसंख्यक अहिरवार समुदाय इससे बाहर है।नरेगा में काम नहीं100 दिन के रोजगार पाने के संवैधानिक अधिकार पर यहां दबंगई कायम हैं। दलित अहिरवार समाज के लोगों को 100 दिन क्या 10 से 15 का कामे भी मुश्किल से दिया गया है।प्रशासन की प्रतिक्रियाटेकापार के लोगों को दबंग जाति के लोगों ने भयभीत करके रखा हुआ है। उनका कहना है कि अगर शिकायत हुई तो तुम लोगों की हालात खराब कर देगें बावजूद इसके टेकापार के अहिरवार समुदाय के लोगों ने अपने खिलाफ को रही ज्यादितियों को लेकर अनुविभागीय दंडाधिकारी गाडरवाला को 8 अक्टूबर 09 को ज्ञापन दिया पर तब से लेकर अब तक स्थिति जस की तस है।
गाॅव - नान्देर
नान्देर गाॅव के दलित समुदाय के लोगों ने टीम को बताया कि अहिरवार समाज द्वारा राज्य स्तर पर मृत मवेषी न उठाने के सामुहिक निर्णय बाद हमने तय किया कि अब से गांव में मृत मवेशी उठाने का कार्य अहिरवार समाज द्वारा नहीं किया जायेगा। अहिरवार समुदाय द्वारा अपने इस निर्णय से गाॅव के सभी लोगों को अवगत भी करा दिया गया। परन्तु गाॅव में सवर्णों को यह नगावार गुजरा। 10 अक्टूबर 2009 को एक बैलगाड़ी में मरा हुआ पशु लाकर दलित बस्ती के बीचोे बीच रमेष सिंह अहिरवार के घर के सामने फेंक दिया गया। मुकेश उपाध्याय(सवर्ण) ने कुछ आदमियों के माध्यम से जानवार के ऊपर हल्की से मिट्टी डालवा दी। इस पर रमेश सिंह अहिरवार ने उन्हें ऐसा ना करने का आग्रह किया। जिस पर मुकेष ने धमकी देते हुए कहा कि अगर मेरे मरे हुए पशु को हाथ भी लगाया तो, कुल्हाड़ी से हाथ काट डालूंगा। रमेश अहिरवार ने टीम को बताया कि अगले दिन प्रहलाद यादव ने भी उसी जगह एक मरे हुए बछ़डे को डाल दिया। दरअसल दलित बस्ती मेें यह जगह सवर्णों द्वारा जानबूझ कर चुनी गई ताकि अहिरवार समुदाय को सबक सिखाया जा सके यानि यह समुदाय के मनोबल को तोड़ने और दादागिरी का मिलाजुला प्रर्दषन था।इस स्थान पर मृत मवेशी डालने के गंभीर परिणाम तय थे। 70 वर्षीय बिरया बाई (जो पास के झोपड़े में रहती है) को मृत मवेषी की सड़ान्ध ने सांस की गंभीर बीमारी की ओर धकेला। उसे गाडरवारा अस्पताल ले जाना पड़ा। वहीं आयुधी बाई (65 वर्ष) जो कि रमेष अहिरवार की मां है कि तबीयत भी इसी वजह से खराब हुई। जाहिर है यह कृत्य गाॅव में महामारी फैलाने के लिए काफी था।सवर्णों ( गैर दलित) जाति के लोगों ने अहिरवार समुदाय पर दबाव बनाने के अगले चरण में गाॅव में अहिरवार समाज के लिए नाकेबंदी कर दी गई। जिसके मायने है- गाॅव में सवर्णो व गैर दलित के खेतों व अन्य किसी तरह की सम्पति को दलित समुदाय का कोई व्यक्ति उपयोग तो क्या छू भी नही सकता है। साथ ही गाॅव के आने जाने की सड़कों ,मेड़ों व घरेलू निस्तारण को प्रतिबंधित कर दिया गया है। पोहप सिंह अहिरवार ने टीम को बताया कि हमारे साथ गाली गलौज, मारपीट व सार्वजनिक जगहों जिनमें नल, स्कूल, पंचायत व आटाचक्की जैसी जगहों में सवर्णो द्वारा सामाजिक बहिष्कार किया जा रहा है। लालजी सिंह कहते है कि मंै स्कूल में सहायक अध्यापक हूॅ पर वो मुझे भी मरा हुआ पशु उठाने को मजबूर करते है। और अगर किसी से अपनी बात कहो तो धमकाते हैं और कहते हंै कि तुम बहुत जाॅच करा रहे हो अभी तुम्हारा बुरा हाल करते हंै।75 वर्षीय नन्हू ने बताया कि धोबी हो या नाई वर्षांे से हमारे समुदाय के साथ भेदभाव करते आ रहे है, इस तरह के कार्य या तो हम खुद करतें है या गाॅव से बाहर जाना पड़ता है।दबंग जातियों के अत्याचारों की एक और बानगी है पोहप सिंह अहिरवार। उन्होंने एक गैर दलित तकत सिंह गुर्जर से 50हजार बयाना देकर ढेड़ एकड़ की जमीन खरीदी थी। पर अब विनौद राजौरिया जमीन की रजिस्ट्री देने से मना कर रहा है। मृत मवेषी न उठाने के सामुहिक निर्णय बाद दलित बस्तियों में दलित उत्थान के लिए चलाये जा रहे कार्यक्रम जिनमें नरेगा, निराश्रित पेंशन योजना, इंदिरा आवास योजना, मजदूर सुरक्षा योजना आदि यहाॅ पूरी तरह से बन्द कर दिये गए हैं। राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारन्टी एक्ट राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारन्टी एक्ट के तहत जाॅब कार्ड तो सभी के बनाए गए हैं पर बहुत कम लोगों को ही काम मिला है। इस घटना के बाद अहिरवार समुदाय के लोगों को गांव में नरेगा का काम देना बंद कर दिया गया है। प्रषासन की प्रतिक्रिया-गाॅव में लोगों ने उस गंभीर समस्या व दलित समुदाय पर हो रहे अत्याचारों के खिलाफ एस.डी.एम. गाडरवारा को ज्ञापन दिया और मांग की कि हम पर अत्याचार बन्द हो और इस समस्या का स्थायी निराकरण किया जाए प्र्शासन की तरफ से तहसीलदार ने आकर ग्राम पंचायत सरपंच विनोद तिवारी (सवर्ण) को केवल समझाइश दी कि किसी को भी मृत मवेषी उठाने पर बाध्य न किया जाए और मृत मवेशी डालने की जगह तय की जाये। पर सरपंच द्वारा उल्टे समुदाय को किसी एक व्यक्ति को इस काम के लिए नियुक्त करने का निर्देष जारी किया गया। पर जगह तय करने की प्रक्रिया अभी तक नही की गई। तब से लेकर अब तक प्रशासन द्वारा किसी तरह की ठोस कार्यवाही नहीं की गयी है। जबकि समुदाय के साथ उसके बाद अत्याचार और बढ़े है।
ग्राम मड़गुला
अहिरवार समाज द्वारा मृत मवेषी न उठाने के सामुहिक निर्णय के बाद सवर्णों द्वारा अहिरवार समुदाय का सामाजिक बहिष्कार और गहरा गया है। यहाॅ पर दलित बस्ती गांव से बाहर मुख्य सड़क के किनारे स्थित है। सवर्णों ने अहिरवार समाज के लोगों पर गांव और खेतों में प्रवेष पर प्रतिबंध लगा दिया है। यहां पर अधिकांष जमीन सवर्ण जाति के लोगों के हिस्से में है। गांव में सार्वजनिक शौचालय और रास्ता नहीं है। इसलिए मड़गुला गाॅव में दलित अहिरवार समुदाय को शौच जाने तक पर प्रतिबंध है। जाहिर है कि अहिरवार समाज के लोगों को इस कारण मुख्य सड़क के किनारे ही शौच के लिए जाना पड़ता है। इस गाॅव में भी सवर्ण दबंग जातियों के अत्याचार ने अहिरवार समुदाय को गाॅव से पलायन व आत्महत्या के लिए मजबूर कर दिया है। 1-मजदूरी के दाम को कम करना31 जुलाई 2009 को गांव के कोटवार के माध्यम से आदेश दिया गया कि अहिरवार समुदाय के जो लोग सवर्णों के यहाॅ बटाईदारी करते है उन्हें वही मजदूरी माननी होगी, जो हम (सवर्ण) तय करेगंे वरना अहिरवार समुदाय को गाॅव छोड़ना होगा। वहीं दूसरी ओर अन्य कामों की मजदूरी दरें जो 70-80रु थी, को सीधे आधा कर दिया गया है, जो कि दलित परिवारों के पालन-पोषण के लिए बिलकुल अपर्याप्त और गैर कानूनी है।2-दैनिक जीवन के लिए आवष्यक चीजों पर प्रतिबंधसवर्णों द्वारा गांव के दलित अहिरवार समुदाय के लिए सार्वजनिक नल, किराना की दुकान से सामान खरीदने, आटा चक्की से अनाज पिसाने, आदि पर जबर्दस्ती रोक लगा दी गई है। 3-महिलाओं के साथ बदसलूकी और धमकीगांव में सार्वजनिक शौचालय और रास्ता नहीं होने के कारण मड़गुला गाॅव में दलित अहिरवार समुदाय को शौच जाने तक पर प्रतिबंध है। जाहिर है कि अहिरवार समाज की महिलाएं को इस कारण मुख्य सड़क के किनारे ही शौच के लिए जाना पड़ता है। अनंत अहिरवार ने बताया कि पुरुषों के न मिलने पर सवर्ण जाति के लोग दलित समुदाय की औरतों, बहू-बेटियों के साथ बदसलूकी पर उतर आए है। प्रतिरोध करने पर कहते है कि अगर हमारी बात नही मानी तो एक-एक को पेड़ पर फांसी पर लटका दिया जाएगा।अत्याचारों के खिलाफ षिकायत-गैर दलित जातियों के व्यवहारों से तंग आकर लोगों ने दिलीप राजपूत, नरवर राजपूत, राजकुमार, नरेश, इंदर, गुटपाल और 5 अन्य के खिलाफ षिकायत की जिसके बाद साईखेड़ा थानाध्यक्ष द्वारा गाॅव में आकर यह समझाईष दी गई कि आप लोग झगड़ा न करें। निष्कर्ष और मांगें-मध्य प्रदेश दलित उत्पीड़न में हमेषा से उॅचे पायदान पर रहा है। प्रदेष में सामाजिक उत्पीड़न की जड़ें आजादी के 60 वर्षों के बाद भी गहरी है। सदियों से भारत में मृत मवेषी और चमडा़ छिलने जैसे अमानवीय कृत्य दलित समुदाय से कराये जातें रहें है। लोकतांत्रिक भारत के संविधान में सामाजिक न्याय की पुरजोर वकालत के बावजूद आज भी यह अमानवीय व गैरसंवैधानिक कार्य दलित समुदाय से जबरन कराया जा रहा है। विडम्बना यह है कि इस वर्ष दलित उत्पीड़न कानून के बीस वर्ष भी पूरे हो रहे हैं।फैक्ट फाइंडिंग टीम ने मध्य प्रदेष के गाडरवारा तहसील के चार गांवोें में सैकड़ों अहिरवार समुदाय के लोगों से बातचीत करने पर पाया कि अहिरवार समाज (दलित ) द्वारा राज्य स्तर पर मृत मवेषी उठाने जैसे अमानवीय व गैरसंवैधानिक काम न करने के सामुहिक निर्णय के जबाब में सवर्ण जातियों के लिए यह कैसे नाक का विषय बन गया है। सवर्ण दलितों पर सामाजिक, आर्थिक प्रतिबंध लगा कर उनको निर्णय बदलने के लिए लगातार मजबूर कर रहे हैं। सवर्ण चाहतें है कि दलित अपने आत्मसम्मान की लड़ाई बंद कर दें। दलित सवर्णों के मृत पषु उठाकर उनकी सामाजिक-सांस्कृतिक गुलामी करतें रहें।फैक्ट फाइंडिंग टीम ने गाडरवारा क्षेत्र में मौजूद हालतों के निरीक्षण में निम्न बातें सामने आयीं-ऽ अहिरवार समुदाय के द्वारा आत्मसम्मान के लिए गया यह निर्णय दरअसल सवर्णों की जातिगत श्रेष्ठता के लिए चुनौती जैसा बन गया इलाके में सवर्ण/गैर दलित अपने सामाजिक और आर्थिक रौब दिखाकर अहिरवार समुदाय पर लगातार दबाव बना रहें है।ऽ

मृत मवेषी उठाना एक खास जाति का ही काम है की सांस्कृतिक-सामाजिक मान्यता को कायम रखने की जिद इस उत्पीड़न की जड़ हैअव दलितों के संवैधानिक मुल्यों की हिफाजत के बदले प्रषासन सवर्णों के यथास्थिति बनाए रखने के कवायद मंे मौन सहभागी बना हुआ है। फैक्ट फाइंडिंग टीम द्वारा गाडरवारा क्षेत्र में मौजूद हालतों के निरीक्षण के दौरान जो बातें सामने आयीं हैं। उस आधार अहिरवार समाज व सामाजिक न्याय के लिए निम्न कार्यों को तत्काल किए जाने की आवष्यकता है-1- शासन द्वारा गाडरवारा तहसील में घट रही घटनाओं की स्वतंत्र व निष्पक्ष न्यायिक जाॅच कराई जाए।2- जिन लोगों द्वारा मृत मवेषी उठाने को मजबूर किया जा रहा है उन पर उचित कार्यवाही की जाए।3- फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट व शासन के पास जो नामजद शिकायत आयीं है उनमें उल्लेखित लोगों पर तत्काल कारवाई का जाए।4- अहिरवार समाज में व्याप्त भय से निजात दिलाने के लिए प्रशासन द्वारा कड़े कदम उठाए जाएं।5-सरकार द्वारा चलाए जा रहे कल्याणकारी कार्यक्रमों में जिनसे अहिरवार समाज को वंचित कर दिया गया है। उन पर समुदाय के लोगों की भागीदारी को पुर्नस्थापित किया जाए।6-अहिरवार समाज के जिन बटाईदारों को उपज में हिस्सा नहीं मिला हैै उनको उनका हिस्सा और मुआवजा दिलाया जाए।7-इस घटनाक्रम के बाद सवर्णों द्वारा गरीबी रेखा से अहिरवार समुदाय लोगों कटे हुए नाम को फिर से जोड़ा जाए।8-इस समस्या के स्थायी हल के स्थायी उपाय किए जाएं।
नागरिक अधिकार मंच और युवा संवाद मध्य प्रदेष द्वारा जारीसंपर्क- जयभीम नागरिक अधिकार मंचमकान नं. 900 दुर्गानगर पानी के टंकी के पास, दो नं. स्टाॅफ भोपालमोबाईल नं. 09301363498
मूलचंदनागरिक अधिकार मंचमोबाईल नं. 09303052704जावेदयुवा संवाद भोपालमोबाईल नं. 09424401459
मनोजयुवा संवाद भोपालमोबाईल नं. 09754762958

10 टिप्‍पणियां:

अफ़लातून ने कहा…

क्या भारत का संविधान वहाँ लागू नहीं होता ? आज से करीब १५-२० साल पहले गाडरवाड़ा से सटे होशंगाबाद जिले के बनखेड़ी ब्लॉक में भी यही स्थिति थी। समता संगठन और किसान मजदूर संगठन -बनखेड़ी के लोगों ने जब इस पर आन्दोलन शुरु किया था तब गाडरवाड़ा के sfi के साथी भी समर्थन में आते थे।
शिवराज सिंह तब युवा रजनीति में थे और उन्हें भी इस आन्दोलन की जानकारी थी। अब वे बतायें क्या गाडरवाड़ा देश के बाहर है ? देश का संविधान वहां लागू हो इसके लिए जिम्मेदार शिवराज हैं ?

vijay gaur/विजय गौड़ ने कहा…

निश्चित ही यह एक महत्वपूर्ण रिपोर्ट है। महत्वपूर्ण इन अर्थों में भी कि सामाजिक संरचना को वो ताना बाना जो सामांती सरोकारों में बुना हुआ है किस कदर पुलिस फ़ौज और शासन प्रशासन के गठजोड़ में अपने अत्याचारों को जारी रखे है, स्पष्ट दिखाई दे रहा है।
संविधान और कानून का डण्डा यदि कहीं दिखाई देता है तो उसे प्रभू वर्ग (शासक वर्ग) के पाले की हिफ़ाजत करते हुए ही देखा जा सकता है।

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

मैं ने राजस्थान से सटे मध्यप्रदेश के जिलों में देखा है कि वहाँ सामंती व्यवस्था अब भी बहुत मजबूत है। यही एक कारण है कि वहां दलित आज भी पुराने हालत में रहने को मजबूर है। इस का प्रभाव दक्षिण पूर्व के राजस्थान के मध्यप्रदेश से लगे जिलों बाराँ, झालावाड़ मे भी देखा जाता है। वस्तुतः जब तक सामंती संबंध नही टूटेंगे और दलित आर्थिक रूप से सक्षम न होंगे। यह दमन चलता रहेगा। मध्यप्रदेश में अब तक रही सरकारों ने इस ओर कोई काम नहीं किया। इन क्षेत्रों में औद्योगिक विकास भी नाम मात्र का है। रोजगार की स्थिति दयनीय है। जब तक दलितों को बड़ी संख्या में औद्योगिक संस्थानों में काम मिलने की स्थिति नहीं बनती सामंती संबंध टूटना असंभव है। उस के लिए इन क्षेत्रों में औद्योगिक विकास जरूरी है।

रंगनाथ सिंह ने कहा…

ये है इक्कसवीं सदी का भारत.....

भारत भूषण तिवारी ने कहा…

बेहद शर्मनाक है. मेरे लिए और भी ज़्यादा क्योंकि गाडरवारा मेरा पैतृक गाँव है.

शरद कोकास ने कहा…

यह स्थिति इसलिये है कि सामंतवाद के संस्कार पीढ़ी दर पीढ-ई हस्तांतरित हो रहे है । गाँवो मे यह स्थिति अभी भी नही आई है कि पढ़ा लिखा व्यक्ति इनका विरोध करे इसलिये कि विरोध के लिये उसे जिस कानून का सहारा चाहिये वह तो सवर्णो के ही हाथ मे है । यह किताबे बाते है और जब इन तथाकतित दलितौद्धारको के मुखौटे नोचो तो इनकी असलियत सामने आती है । इनका जवाब जनतंत्र मे वोट से भी नही दिया जा सकता क्योंकि इन्हे चुनाव जीतने के हथकंडे आते है ।क्रांति की कही कोई सम्भावना नज़र नही आती और अन्य कोई रास्ता नही है ।शायद भविष्य मे उस तरह दलितों की स्थिति मज़बूत हो जैसी की आज महाराष्ट्र मे है लेकिन उसके लिये आम्बेडकर जैसा लीडर चाहिये ।

neera ने कहा…

ना चुप रहते बनता है और ना कुछ कहते .... और कितनी सदी लगेंगी इस सबको बदलने में ?

rahul ने कहा…

mai yah kaam kar sakta hun kyonki mera janm ek dalit brahiman pariwar me hua hai

Ek ziddi dhun ने कहा…

दिल्ली में इस घटना के विरोध में धरने में गया था. आज पता चला है कि कुछ कार्रवाई हुई है.

samrat ने कहा…

जब तक अहिरवार समाज खुद को सक्तिशाली व निर्भीक नहीं बनायेगा तब तक लात खायेगा एक लात के बदले चार लात लगाने की हिम्मत जब तक नहीं पैदा करेंगे तब तक अत्याचार होते रहेंगे ,और मेरा मानना हैं की सभ्य समाज में चमार शब्द ही कलंक हैं हम अपने आने वाले पीढ़ी को क्या देना चाहते हैं ये सोचना ये आपको खुद तय करना होगा।