मंगलवार, 22 सितंबर 2009

नारमन बोरलाग को याद करते हुए


हरित क्रांति के पिता कहे जाने वाले विश्वप्रसिद्ध कृषि वैज्ञानिक नारमन बोरलाग का गत 12 सितंबर को अमेरिका के टैक्सास शहर के डलास स्थित अपने घर में कैंसर की लंबी बीमारी के बाद देहांत हो गया। टेक्सास विश्वविद्यालय के प्रोफेसर रहे बोरलाग को ‘‘विकासशील देशों में ऊंची पैदावार वाली गेहूं की फ़सलों की नस्लों के विकास तथा कृषि के क्षेत्र में नवोन्मेष द्वारा भूख के खि़लाफ़ संघर्ष में उल्लेखनीय योगदान’’ के लिए 1970 में नोबेल पुरस्कार समिति ने शांति के क्षेत्र में सम्मानित किया गया था - शांति के क्षेत्र में इसलिए कि कृषि के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार नहीं दिये जाते। उस अवसर पर नोबेल शांति पुरस्कार समिति के अध्यक्ष एसी लायने ने कहा था कि ‘ इस दौर के किसी अन्य व्यक्ति की तुलना में बोरलाग ने भूखे लोगों को रोटी उपलब्ध कराने में अधिक सहायता की है, हमने उन्हें यह पुरस्कार इस उम्मीद में दिया है कि रोटी की उपलब्धता अंततः दुनिया में शांति भी ले आयेगी।’’

उनकी मृत्यु पर शोक व्यक्त करते हुए जाने-माने कृषि वैज्ञानिक और राज्यसभा सदस्य एम एस स्वामीनाथन ने कहा कि ‘‘1960 के दशक में जब पाॅल और विलियम पैडक ने अपने शोध के बाद स्पष्ट कह दिया था कि भारत को अब दुनिया की कोई ताक़त भूखमरी और अकाल से नहीं बचा सकती थी और पाल एहरिलिच ने अपनी किताब ‘द पापुलेशन बम’ में इसकी पुष्टि कर दी थी तो यह बोरलाग का अथक प्रयास ही था कि हरित क्रांति द्वारा योजनाबद्ध तरीके से उत्पादकता की वृद्धि कर अकाल के उस खतरे को टाला जा सका।’’ भारतीय कृषि को उनके योगदान के महत्व को इस प्रकार से भी समझा जा सकता है कि आमतौर पर बुद्धिजीवियों के मरने- जीने से असंबद्ध रहने वाले राजनीतिक समाज के हर कोने से भी उनकी मृत्यु के बाद काफी प्रतिक्रियायें आईं। राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, कृषि मंत्री, बिहार तथा आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्रियों सहित पक्ष- विपक्ष के तमाम महत्वपूर्ण नेताओं ने इस अवसर पर शोक व्यक्त करते हुए भारत के प्रति उनकी सेवाओं को याद किया।
नार्वेजियन- अमेरिकन समुदाय के बोरलाग का जन्म आयोवा में क्रेस्को के निकट साद में अपने बाबा के कृषि फार्म में हुई थी, जहां अपने जीवन के आरंभिक वर्षों में उन्होंने खेती-बारी और पशुपालन करते हुए बिताये। वहां के हावर्ड काउन्टी के जिस एक कमरे के ग्रामीण स्कूल में उन्होने आठवीं तक की पढ़ाई की थी हव अब नारमन बोरलाग हेरिटेज़ फाउन्डेशन द्वारा संचालित किया जाता है। बाद मंे वह क्रेस्को हाईस्कूल गये और फिर महामंदी के उस दौर में ‘नेशनल यूथ प्रोग्राम’ के तहत चलाये जा रहे प्रशिक्षण कार्यक्रम के तहत उन्हें उच्च शिक्षा के लिए 1933 में मिनेसोटा विश्वविद्यालय में दाखिला मिला। मुख्य प्रवेश परीक्षा में असफल रहने के कारण उन्हें नये-नये खुले जनरल कालेज में प्रवेश मिला जहां पर उनके अच्छे प्रदर्शन के बाद अंततः उन्हें अपने पसंदीदा विषय ‘कृषि वानिकी’ की पढ़ाई करने का मौका मिला। हालांकि स्थितियां अब भी प्रतिकूल थीं और उन्हें अपनी पढ़ाई का ख़र्च उटाने के लिए बार-बार छोटी-मोटी नौकरियां करनी पड़ीं। स्नातक की उपाधि उन्हें 1937 में मिली लेकिन इसके पहले ही वह अमेरिकी वानिकी सेवा में अपनी नौकरी के दौरान देश के कुछ सबसे ग़रीब इलाकों में भूख की भयावहता का अनुभव कर चुके थे। स्नातक के अंतिम वर्षों में प्रसिद्ध कृषि वैज्ञानिक और पादप चिकित्सा के विशेषज्ञ एल्विन चाल्र्स स्टाकमैन के ‘ हमारे खाद्यान्नों को नष्ट करने वाले छोटे घूमंतू कीट ’ विषय पर दिये गये भाषण ने उनकी रुचि की दिशा पादप चिकित्सा की ओर मोड़ दी और कालांतर में अपने परास्नातक तथा शोध के लिए उन्होंने इसे ही आधार बनाया। 1942 में अपना शोध समाप्त करने के बाद उन्होंने ड्यूपोन्ट के डेलवेयर में माइक्रोबायोलाजिस्ट के रूप में काम करना शुरु किया लेकिन द्वितीय विश्वयुद्ध के कारण आगे शोध की उनकी योजना पूरी नहीं हो सकी। विश्वयुद्ध के दौरान अमेरिकी सेना की सहायता के लिए उन्होंने कई छोटे-मोटे प्रयोग किये।
विश्वयुद्ध के बाद अमेरिकी उपराष्ट्रपति हेनरी वालेस ने राकफेलर फाउंडेशन की सहायता से मैक्सिको की कैमाचो सरकार की कृषि क्षेत्र में मदद के लिए एक विशेष विभाग ‘द आॅफिस आफ स्पेशल स्टडीज’ की स्थापना की, जिसे मैक्सिको की सरकार के अधीन काम करना था, परंतु इसका संचालन राकफेलर फाउंडेशन द्वारा ही होना था। इस विभाग में अमेरिका तथा मैक्सिको दोनों के ही वैज्ञानिकों को शामिल होना था और इसका मुख्य उद्देश्य वहां ज़मीनों का सुधार, गेहूं तथा मक्के की पैदावार में बढ़ोत्तरी व कीटनाशकों का विकास था। कैमेचो की इस सहायता के मूल में वहां होने वाले विकास में सहयोग कर अमेरिका के दीर्घकालिक सामरिक तथा आर्थिक हितों को सुनिश्चित करना था। इस विभाग की स्थापना तथा मैक्सिको की कृषि व्यवस्था के ‘सुधार’ के लिए राकफेलर फाउण्डेशन ने स्टाकमैन को चुना। स्टाकमैन ने जे जार्ज़ हरार को इसके प्रोजेक्ट लीडर के रूप में चुना और हरार ने वहां स्थापित सहकारी गेंहू शोध और उत्पादन कार्यक्रम की ज़िम्मेदारी नारमन बोरलाग सौंपी। शुरुआती झिझक के बाद उन्होंने यह जि़म्मेदारी स्वीकार की और यहीं से शुरुआत हुई उनके लंबे सफ़र की कालांतर में जिसका एक पड़ाव भारत भी बना।

मैक्सिको में बोरलाग ने गेंहू की पैदावार बढ़ाने के लिये फसलों की आनुवांशिकता, उत्पादन संवर्धन, कीट विज्ञान, मृदा विज्ञान आदि के क्षेत्र में व्यापक प्रयोग किये। सोलह वर्षों के लंबे प्रयोगों के बाद वह गेंहू की नई उच्च उत्पादकता वाली अर्द्ध-बौनी प्रजातियां विकसित कर पाने में सफल हुए जिसकी एक बड़ी विशेषता उच्च स्तरीय रोग प्रतिरोधकता भी थी। अपने अधिकारियों के विरोध के बावजूद उन्होंने इस प्रयोग को कम पैदावार वाले क्षेत्रों से आगे विस्तारित करते हुए साल में गेंहू की दो फसलें बोने के लिए किसानों को प्रोत्साहित किया। इस प्रयोग ने मैक्सिको में गेंहू की पैदावार में उल्लेखनीय वृद्धि की और आयात पर उसका निर्भरता को कम किया।

1961-62 में बौने गेंहू की प्रजाति को अमेरिका के कृषि मंत्रालय ने अपनी प्रयोगशालाओं में भेजा। उसी दौरान भारत में सबसे पहले पूसा स्थित भारतीय कृषि शोध संस्थान में इस गेंहू की कुछ किस्मों को प्रायोगिक तौर पर उगाया गया। इसके बाद एम.एस स्वामीनाथन के प्रयासों से कृषि मंत्रालय ने राकफेलर फाउण्डेशन के माध्यम सेे बोरलाग को भारत आने का निमंत्रण दिया। मार्च 1963 में वह डा. राबर्ट ग्लेन एण्डरसन के साथ पहली बार भारत आये। अक्टूबर 1963 में 100 किलो उन्नत गेहूं की फसलों के साथ उन्होंने दिल्ली, लुधियाना, कानपुर, पन्तनगर, पुणे और इन्दौर में अपने प्रयोग शुरु किये। 1962 के युद्धकालीन दौर में भारत अकाल जैसी परिस्थितियों से गुजर रहा था और अमेरीका से भारी आयात के बावजूद यहां अनाज की भारी किल्लत थी। बावजूद इसके इन प्रयोगों के पूंजी आधारित होने और सांस्कृतिक अवस्थितियों से मेल न खाने के कारण शुरु में बोरलाग को सरकार का समर्थन नहीं मिला। लेकिन 1965 आते -आते स्थितियां इतनी गंभीर हो गयीं कि सभी आपत्तियों को दरकिनार करते हुए भारत सरकार ने बोरलाग को अपने प्रयोगों को व्यापक पैमाने पर विस्तारित करने की अनुमति दे दी। इस दौर में एन्डर्सन और स्वामीनाथन के साथ मिलकर बोरलाग ने अर्धबौनी प्रजाति के गेहूं के बीजों का व्यापक पैमाने पर भारतीय कृषि में प्रयोग शुरु किया।शुरुआती परेशानियों के बावजूद इन बीजों ने उम्मीद से बेहतर परिणाम दिये।एल आर 64 और सोनोरा 64 के बीजों की उत्पादकता इतनी उच्च स्तर की रही की जल्दी ही ये भारतीय किसानों के लिये परिचित शब्द बन गये।
इन बीजों की मांग का आलम यह था कि 1966 में भारत ने 1800 टन बीजों का आयात किया। इन बीजों और उन्नत तकनीक के प्रयोग से भारत तथा दक्षिण एशिया के कई देशों में गेहूं की पैदावार में अभूतपूर्व वृद्धि हुई। जहां पाकिस्तान 1962 तक खाद्यान्नों के क्षेत्र में पूरी तरह से आत्मनिर्भर हो चुका था वहीं भारत में गेहूं का उत्पादन 1965 के 12।2 मिलियन टन से बढकर 1970 में 20.1 मिलियन टन हो गया और 1974 में हम अपनी गेहूं की जरूरतें खुद पूरी करने लगे थे। इसी सफलता से उत्साहित होकर यू एस एजेन्सी फार इन्टरनेशनल डेवेलपमेण्ट के विलियम गौड ने इस परिघटना को 1968 में हरित क्रांति का नाम दिया - हालांकि बोरलाग कभी इस शब्दावली से सहमत नहीं हुए।

फिर भी चाहे इसे हरित क्रांति कहें या न कहें लेकिन साठ और सत्तर के दशक की उस परिघटना ने भारतीय कृषि के परिदृश्य को पूरी तरह बदल दिया। एक तरफ उत्पादकता में अभूतपूर्व वृद्धि हुई तो दूसरी तरफ भूमि सुधार, बंजर जमीनों को कृषि योग्य बनाने की योजनायें आदि पूरी तरह बिसरा दी गयीं। जाने-माने कृषि वैज्ञानिक पाल वैगनर के एक अध्ययन के मुताबिक उच्च उत्पादकता वाले इन बीजों पर अत्यधिक निर्भरता के कारण भारत में लगभग 100 मिलियन एकड बंजर जमीनों को कृषि योग्य बनाये जाने की प्रक्रिया शुरु ही नहीं की जा सकी। कृषि की यह परियोजना अपने मूल में बडे़ किसानों और खास फसलों के पक्ष में थी। जमीनों को इन नयी प्रजातियों के योग्य बनाने के लिये तथा इन फसलों को कीटों से बचाने के लिये भारी मात्रा में उर्वरकों और कीटनाशकों की जरूरत पड़ी, जिसके चलते छोटे और सीमांत किसानों के लगातार कृषि मजदूरों में संक्रमण की प्रक्रिया तेज हुई। यही नहीं, इन उन्नत बीजों के प्रयोग से फसलों की विविधता नष्ट हुई। वर्षोंं से बोयी जाने वाली तमाम फसलें परिदृश्य से बाहर हो गयीं और कालांतर में उर्वरकों के नियमित प्रयोग से जमीनें इन फसलों के लिये अयोग्य हो गयीं। खाद और कीटनाशकों पर अत्यधिक निर्भरता का प्रभाव पंजाब और मध्य प्रदेश सहित कई जगहों पर पारंपरिक रूप से उपजाऊ रही जमीनों की उर्वरकता के नष्ट होने के रूप में भी सामने आया है।

अलबत्ता इन तकनीकों से अमेरीका की बीज, खाद और कीटनाशक बनाने वाली सिजेंटा और मोसेंटों जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को अंधाधुंध लाभ हुआ। भारत जैसे बडे विकासशील देशों में इनके लिये एक नियमित बाजार का निर्माण हुआ। यही वजह थी की बोरलाग न केवल दक्षिण एशियाई देशों अपितु अमेरीकी सत्ता वर्ग के भी अत्यंत प्रिय रहे और उन्हें समय-समय पर तमाम पुरस्कारों से नवाजा गया। इन्हीं कंपनियों के दबाव में कृषि के पूंजीवादीकरण का जो एजेण्डा लागू हुआ उसकी तार्किक परिणिति भारत में किसानों की आय में भयावह असमानता, पारंपरिक कृषि उत्पादनों के क्षरण और व्यापक पैमाने पर आत्महत्या जैसी परिघटनाओं में हुई। इन नीतियों से मिले तात्कालिक लाभ भी दीर्घजीवी साबित नहीं हुए और 2005 आते-आते एक बार फिर देश में खाद्यान्न संकट की पदचापें सुनायी देने लगीं।
खाद और कीटनाशकों पर अत्यधिक निर्भरता का प्रभाव पंजाब और मध्य प्रदेश सहित कई जगहों पर पारंपरिक रूप से उपजाऊ रही जमीनों की उर्वरकता के नष्ट होने के रूप में भी सामने आया है। हरित क्रांति के रोल माडल रहे पंजाब पर केन्द्रित अपनी किताब ‘‘ वायलेंस आफ ग्रीन रेवोल्यूशन’’ में वंदना शिवा ने पंजाब में इसके प्रभावों का विस्तृत अध्ययन किया है। उनका मानना है कि ‘‘तुरंत उच्च उत्पादकता लेने के चक्कर में जिस तरह वैकल्पिक कृषि विकास माडलों की अनदेखी की गयी उसने पंजाब की कृषि अर्थव्यवस्था को दीर्घकाल में नष्ट कर दिया। आज वहां जमीने बंजर हो रही हैं, जैव विविधता नष्ट हो गयी है, भू पट्टी का क्षरण हो रहा है, जमीनों में पोषक तत्वों की मात्रा घट गयी है, भारी मात्रा में छोटे किसानों का पलायन हुआ है, गांवों में गरीबी बढ़़ी है और साथ ही तनाव और हिंसा।

इस पूरी परिघटना का अगर किसी को फायदा हुआ है तो बस उर्वरक तथा कीटनाशक उद्योग,बडी पेट्रोकेमिकल कंपनियों,कृषि संबंधित औजारों के उत्पादकों, बड़े पुलों के निर्माताओं और बडे भूस्वामियों को। हरित क्रांति का जादू बस नये रोगों और कीटनाशकों के पैदा करने तक सिमट कर रह गया है।’’

पूर्व मे उद्धृत नोबल शांति पुरस्कार समिति के प्रशस्ति पत्र में जिस ‘‘भूख के विनाश और उससे पैदा होने वाली शांति’’ की बात की गयी थी उसे तो आॅकलैण्ड स्थित ‘खाद्य एवं विकास नीति संस्थान’ के कार्यकारी निदेषक एरिक हाॅल्ट गिमनेज द्वारा प्रस्तुत हालिया रिपोर्ट ‘विष्व खाद्य संकटः इसके पीछे क्या है और तो ‘अंर्तराष्ट्रीय खाद्य नीति एवं षोध संस्थान द्वारा प्रस्तुत दूसरी रिर्पोर्ट दुनिया भर के देषों के लिए बनाए गये ‘भूमण्डलीय भूख सूचकांक’ द्वारा पेश आंकड़े ही खारिज कर देते हैं जिनके अनुसार 1974 में विकासषील देषों में 5 करोड़ लोग भूखे थे और दुनिया से भूख मिटाने के सारे दावों के बावज़ूद 1996, 2006 और 2008 में यह लगातार बढकर क्रमषः 8।3 करोड, 8.5 करोड़ और 8.62 करोड़ हो गई।

साफ है कि अपने सारे नवोन्मेष और सदिच्छाओं के बावजूद बोरलाग मूलतः और अंततः आम जन नहीं पूंजीवादी जगत के ही सहायक बने। एक पूंजीवादी व्यवस्था में सारे नवोन्मेषों की यह तार्किक परिणिति ही है। इन सबके बावजूद वह एक ऐसे मानवतावादी वैज्ञानिक के रूप में हमेशा याद किये जायेंगे जिसने अनेक विकासशील तथा गरीब देशों को साठ और सत्तर के दशक में अकाल के संकट से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

7 टिप्‍पणियां:

रंगनाथ सिंह ने कहा…

bahut thos lekh hai. borlag ke sang nyay karta huva lekh hai....unke svet aur shyam ko dhyan me rakh kar likhna achha laga...

SUNIL DOGRA जालि‍म ने कहा…

लिखते रहिये पढने वाले बेताब हैं

स्वप्नदर्शी ने कहा…

I had couple of opportunities to hear Norman. He did what he could do best as a scientist. However, the implications of his scientific achievements, specially in developing countries, were limited due to the bad agrarian policy in India and rest of the south east Asia, on which he had no control. This was not his fault. It is the fault in the policy making and fault of our parliamentarians and problem of implementation of policies. Also the gap that exist between scientists.

Arvind Mishra ने कहा…

बोरलाग पर एक सम्पूर्ण और संतुलित लेख -आभार !

विजयशंकर चतुर्वेदी ने कहा…

आपने बड़ी मेहनत और ईमानदारी से यह लेख तैयार किया है. इसके लिए आप बधाई के पात्र हैं. इसे अखबारों के माध्यम से अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाइये.

मीनू खरे ने कहा…

अच्छा लेख, जानकारी से भरपूर.

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

बहुत कारगर जानकारी इस आलेख में है। बोरलाग की कृषि उत्पादन में क्रांतिकारी उपलब्धियाँ हों या फिर किसी भी तकनीक का विकास पूंजीवादी व्यवस्था उसे पूंजी का गुलाम बना लेता है। इस व्यवस्था के रहते कभी यह संभव नहीं कि तकनीकों का लाभ आम जनता तक पहुँच पाए। तकनीक के विस्तार से मानव श्रम को प्रतिव्यक्ति कम होना चाहिए। लेकिन होता यह है कि श्रम कम होने के स्थान पर बेरोजगारी फैलाती नजर आती है क्यों कि उस पर पूंजी अपना आधिपत्य जमा लेती है। वह क्रांति ही जो तकनीकों का लाभ जनता तक पहुँचाने वाली व्यवस्था लाएगी बोरलाग और अन्य वैज्ञानिकों के लिए सच्ची और असली श्रद्धांजलि होगी।