रविवार, 6 सितंबर 2009

शांति, समाजवाद और समृद्धि के लिये

( यह लेख मेरी शीघ्र प्रकाश्य पुस्तक ' शोषण के अभयारण्य' का अन्तिम अध्याय है। यहाँ इसे दो खंडों में पोस्ट कर रहा हूँ। प्रस्तुत है पहला हिस्सा )


विकल्प का सवाल हमेशा ही एक मुश्किल और पेचीदा सवाल होता है। किसी भी आर्थिक प्रणाली की आलोचना लेखक की अपनी पक्षधरता से तय होती है। जो प्रणाली एक लेखक के लिये अत्यंत प्रिय होती है वह दूसरे के लिये उतनी ही घृणास्पद हो सकती है। हम जब मुक्त बाज़ार पर आधारित आर्थिक माॅडल का विरोध करते हैं तो इसलिये कि देश की बहुसंख्यक आबादी इसके दुष्परिणाम झेल रही है और उसकी कीमत पर मुट्ठी भर लोग अपनी तिजोरियां भर रहे हैं। देश के भीतर आर्थिक असमानता के आधारों का विकास हो रहा है, सामाजिक जीवन में तनाव तथा हिंसा बढ़ते ही जा रहे हैं और बाज़ार के प्रभाव से राजनैतिक जीवन की शुचिता दिन ब दिन नष्ट होती जा रही है। जिस ‘समानता , भाईचारे और स्वतंत्रता’ के नारे पर पूंजीवाद ने विश्व राजनैतिक पटल पर प्रवेश किया था वह अब ‘ मुनाफ़ा, मुनाफ़ा, मुनाफ़ा’ से प्रतिस्थापित हो गया है। असमानता की बढ़ती खाई, बेरोज़गारी और नाउम्मीदी से ही वह वातावरण निर्मित हुआ है कि देश भर में तमाम हिंसक आंदोलन पैदा हुए हैं। इसके अलावा व्यक्तिगत हिंसा की प्रवृति में भी बढोत्तरी साफ देखी जा सकती है। ज़ाहिर है यह स्थिति हर उस नागरिक को व्यथित करती है जिसकी संवेदनायें अभी जीवित हैं। आज इस लूटखसोट, हिंसा, और असमानता के विकल्प की तलाश का सवाल दरअसल मानवता के भविष्य को बचाने से भी जुड़ा है। मुनाफ़े की हवस ने ही हमारे पर्यावरण को भी तहस- नहस कर दिया है। फ्रांसुआस दोबोन्न ने सही ही कहा है - ‘ दुनिया को बदलना ज़रूरी है ताकि दुनिया बची रहे।’
दरअसल, सोवियत संघ के विघटन के बाद से ही विकल्प के सवाल पर एक सतत संभ्रम और उदासीनता की स्थिति दिखाई दे रही है। जहां मुख्यधारा की सभी राजनैतिक दलों ने नव आर्थिक उदारवाद को कमोबेश स्वीकार कर लिया है वहीं वैकल्पिक राजनीति के पैरोकार कोई ऐसा माॅडल प्रस्तुत करने में सफल नहीं रहे हैं जिससे जनता को आकर्षित किया जा सके। फिर से राजकीय पूंजीवाद के नियंत्रण वाले दौर में लौटने से लेकर बीसवीं सदी की क्रांतियों के तर्ज़ पर ही नये परिवर्तनों की जो बातें की जा रहीं हैं, उनकी नीयत पर भले कोई सवाल न हो पर तार्किकता पर तो सवाल हैं ही।

नई आर्थिक नीतियों के बिल्कुल आरंभिक दौर से ही लोहियावादी समाजवादी तथा वामपंथी दलों ने पब्लिक सेक्टर के समर्थन को ही नव उदारवाद के विरोध का पर्याय बना दिया। जैसे- जैसे सरकार ने पहले घाटे वाले और फिर दूसरे पब्लिक सेक्टर संस्थानों का विनिवेश करना शुरू किया वैसे- वैसे ही इन दलों ने उन्हें जस का तस बचाये रखने के लिये प्रयास तेज़ किये। इन दलों से संबद्ध यूनियनों ने तमाम छोटे - बडे आंदोलन भी किये। देखा जाये तो यह स्वाभाविक भी था और उचित भी। लेकिन इस अंधविरोध से जो समस्यायें पैदा हुईं वे भी कम गंभीर नहीं थीं। पहला तो यह कि ज़्यादातर पब्लिक सेक्टर संस्थान जिस तरह घाटे में चल रहे थे और साथ ही भ्रष्टाचार तथा अकुशलता का पर्याय बन चुके थे, उन्हें और चला पाना संभव ही नहीं था। सेवायें प्रदान करने वाली संस्थायें, जैसे राज्यों के विद्युत बोर्ड आदि इस क़दर अलोकप्रिय हो चुके थे कि अब जनता इससे ऊब चुकी थी। ऐसे में उसे निजीकरण ही बेहतर विकल्प लगा। कारण यह कि उसे बस पुराने और नये में ही चुनना था। चूंकि ये दल और इनकी यूनियनें कोई और संभव विकल्प प्रस्तुत करने की जगह बस उन्हें ही पुनर्जीवित करने के प्रयास में लगी रहीं, उन्हें जनता का कोई समर्थन हासिल नहीं हो सका। इसके अलावा इस क़वायद ने यह ग़लत समझ स्थापित की कि पब्लिक सेक्टर का वह माॅडल अपने आप में ‘समाजवादी’ माडल था, जबकि स्पष्ट तौर पर वह राज्य पूंजीवाद का माॅडल था। बदलते समय के साथ पूंजीवाद ने स्वयं को अद्यतन करते हुए उस अलोकप्रिय तथा अलाभकारी माॅडल की जगह नया माॅडल प्रस्तुत किया, मीडिया के माध्यम से उसे स्थापित किया और उसे लागू करने में सफल रहा जबकि वामपंथी तथा समाजवादी ताक़तों द्वारा खु़द को प्रगतिशील कहने के बावजूद नये समय में कोई नया विकल्प प्रस्तुत करने की जगह पूंजीवाद द्वारा कचरे में डाल दिये गये माॅडल को समाजवादी माॅडल के रूप में प्रस्तुत किया गया। इसने स्वाभाविक तौर पर लोगों को यह कहने का मौका दिया कि अब समाजवाद गुज़रे जमाने की बात हो गया है।
गैर संसदीय वाम ने भी कोई सार्थक विकल्प सुझाने की जगह अपना सारा ध्यान संसदीय वाम की कठोरतम संभव आलोचना, जंगलों के भीतर तथा बाहर जनसंघर्ष के नाम पर हिंसक आंदोलनों तथा एकदम जड़सूत्रवादी रवैया अपनाते हुए ‘ क्रांति के साथ ही सब समस्या हल होगी’ जैसी बातें कीं। इस तरह के माहौल में किसी व्यापक तथा जनपक्षधर वैकल्पिक आंदोलन के अभाव में पूंजीपति वर्ग अपनी मनमानी करने में सफल रहा। छुट्पुट विरोधों के चलते थोड़ी देर- सबेर हुई, थोड़ी लेन- देन पर अंततः वैश्वीकरण का अश्वमेध लगभग निर्बाध चलता रहा। हद तो यह है कि कई दशकों से वाम शासित पश्चिम बंगाल में भी जब पब्लिक सेक्टर इकाईयों की अकुशलता तथा घाटा चरम सीमा पर पहुंच गये तो इसके प्रतिस्थापन और ‘विकास’ के लिये उन्हें भी निजी पूंजी के अलावा कोई और रास्ता नहीं सूझा। ऐसे में वाम के इस धड़े के पास नव उदारवाद की आलोचना का नैतिक अधिकार रह ही कहां गया?

1 टिप्पणी:

रंगनाथ सिंह ने कहा…

aapka blog blogrole par lagaya hai...bus nam badal diya hai...pathako ki sahuliyat ke liye