रविवार, 16 अगस्त 2009

रोशन कंगूरों की स्याह बुनियाद


विकास क्या है और इसके वास्तविक पैमाने कौन से होने चाहिए इसे लेकर एक सनातन बहस चलती ही रही है। लेकिन समाजवादी रूस के पतन के बाद जैसे-जैसे दुनिया भर में नवउदारवादी नीतियों का वर्चस्व स्थापित होता गया है विकास का अर्थ आर्थिक वृद्धि तक सीमित होता गया है। एक आम समझ यह बनी है कि अगर पूँजी की उत्पादकता लगातार बढ़ रही है और उद्योगपतियों की समृद्धि का स्तर सतत् ऊँचा उठ रहा है तो अर्थव्यवस्था का विकास हो रहा है। रहा सवाल आम लोगों और ग़रीब बहुसंख्या का तो उन्हें ‘टपक बूंद (ट्रिकल डाऊन) सिद्धांत’ के भरोसे छोड़ दिया जाता है जिसके अंर्तगत यह मान्यता दी जाती है कि दीर्घकाल में समृद्धि की कुछ बूंदे रिस-रिस कर निचले संस्तरों तक भी पहुंचेंगी। समानता का विचार तो ख़ैर यहाँ सिरे से ही गायब होता है लेकिन समृद्धि के आधारों के क्रमिक विस्तार के इस दीर्घकाल की अवधि होती कितनी है यह भी किसी को पता नहीं होता। इस सिद्धांत की अर्थषास्त्रीय व्याख्या तो एक अलग मसला है लेकिन अगर इसे अनुभव के आधार पर कसें तो भी इसमें तमाम झोल दिखाई देते हैं। विगत दो दशकों से चल रही नवउदारवादी नीतियों के फलस्वरूप उद्योगपतियों की आर्थिक समृद्धि के महासागर की बूंदे उस सबसे निचले संस्तर तक नहीं पहुंची हैं बल्कि वंचित जन का जीवनस्तर कई माामलों में तो और भी बदतर हुआ है।


अभी हाल ही में विश्व बाज़ार के बेताज बाद्शाह अमेरिका में ही स्थित दो अलग-अलग संस्थानों की रिर्पोटें सच के इस बदशक्ल चेहरे को बेपर्दा करती हैं। यहाँ यह स्पष्ट कर देना भी ज़रूरी है कि इसमें दुनिया भर के बाज़ारों में जारी मंदी का क़िस्सा शामिल नहीं है ; इन दोनो रिर्पोटों का अध्ययन काल इस परिघटना के सतह पर आने से पहले का है।


इनमें पहली रिपोर्ट आॅकलैण्ड स्थित ‘खाद्य एवं विकास नीति संस्थान’ के कार्यकारी निदेषक एरिक हाॅल्ट गिमनेज द्वारा प्रस्तुत ‘विश्व खाद्य संकटः इसके पीछे क्या है और इस बारे में हम क्या कर सकते हैं’ विश्व भर में व्याप्त खाद्य संकट के कारणों तथा इसके हल के लिए आवश्यक नीतिगत प्रयासों की पड़ताल करती है तो ‘अंर्तराष्ट्रीय खाद्य नीति एवं शोध संस्थान द्वारा प्रस्तुत दूसरी रिर्पोर्ट दुनिया भर के देषों के लिए बनाए गये ‘भूमण्डलीय भूख सूचकांक’ के जरिये भूख और कुपोषण की भयावह तस्वीर पेष करती है।


गिमनेज अपनी रिपोर्ट के पहला अध्याय ‘एक ख़ामोश सूनामी’ का आरंभ करते हैं एक बेहद अर्थवान टिप्पणी से: ‘’लोग भूखे हैं और यह प्राकृतिक नहीं है’। खाद्य संकट की भयावहता का जिक्र करते हुए वह बताते हैं कि 1974 में विकासशील देषों में 5 करोड़ लोग भूखे थे और उस वर्ष आयोजित विश्व खाद्य सम्मेलन ने अगले दस सालों में दुनिया से भूख को पूरी तरह से समाप्त करने का प्रस्ताव पास किया था लेकिन 1996, 2006 और 2008 में यह लगातार बढकर क्रमश 8।3 करोड, 8.5 करोड़ और 8.62 करोड़ हो गई। यही नहीं, अब तक विकासशील और पिछड़ी अर्थव्यवस्थाओं में ही सिमटी यह बीमारी अमेरिका में भी पहुंच गई है। 2008 में वहाँ भूख के शिकार लोगों की संख्या 35 लाख (12 प्रतिशत) तक पहुंच गयी जबकि इस वर्ष सरकारी ख़जाने से पोषण कार्यक्रमों के लिए कुल बज़ट 60 लाख डालर दिया गया! ऐसे में एशिया और अफ्रीका के हालात कोई भी समझ सकता है ( इस पर विस्तार से चर्चा आगे अंर्तराष्ट्रीय खाद्य नीति एवं शोध संस्थान द्वारा प्रस्तुत दूसरी रिर्पोर्ट के संदर्भ में की जायेगी )।


गिमनेज इसके कारणों की सटीक तलाश करते हैं। पहली बात तो यह कि इसका जनसंख्या वृद्धि से कोई लेना-देना नहीं है। पिछले वर्षों में हमेशा यह तर्क दिया जाता रहा कि जनसंख्या बढने की तेज़ ऱतार के चलते खाद्यान्नों का उत्पादन पिछड़ जाता है लेकिन विगत चार वर्षों में जहाँ जनसंख्या की वार्षिक वृद्धि दर 1.14 प्रतिशत रही वहीं अनाज का उत्पादन 2 फीसदी सालाना की दर से बढ़ा। वल्र्ड हंगर प्रोग्राम के कार्यकारी निदेषक जोसेट शीरन कहते हैं कि ‘‘ पहले से ज्यादा लोग अब भूखे हैं। अनाज भरा पड़ा है लेकिन लोग खरीद नहीं पा रहे हैं।’’


इसलिए अगर प्रति व्यक्ति खाद्यान्न उपलब्धता में कमी आई है तो फिर कारण अन्य हैं। कारण हैं - जनविरोधी नीतियां, गैरबराबरी आधारित व्यापार संबंध और विकास की गलत अवधारणा। गिमनेज का मानना है कि वर्तमान खाद्यान्न संकट के लिए बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ निम्मेदार हैं। कृषि में उनके बढ़ते हस्तक्षेप से किसान तबाह हो रहे हैं। ब्रेटनवुड्स समझौते से प्राप्त अकूत ताक़त से इन्होंने कृषि उत्पादों से लेकर खाद, बीज, कीटाणुनाषकों और उत्पादन तकनीकों तक पर कब्ज़ा कर लिया है और इसका प्रयोग कर अपार लाभ कमाया है। बाज़ार से कृषि को जोड़ने का कोई लाभ कम से कम एषिया और अफ्रीका के ग़रीब किसानो को तो नहीं ही मिला है। इसका दूसरा पक्ष है अनाजों की क़ीमतों में भारी वृद्धि। मार्च 2008 में विष्व बाज़ार में गेंहू का दाम पिछले साल की तुलना में 130 फ़ीसदी, सोया का 87 फ़ीसदी चावल का 74 फ़ीसदी और मक्के का 31 फ़ीसदी बढ़ गया। पिछले तीन वर्षों में अनाजों के विष्व मूल्य सूचकांक मंे 83 फ़ीसदी की बढ़ोत्तरी हुई जबकि पिछले तीन महीनों में यह वृद्धि 45 फ़ीसदी की हुई जिससे यह सूचकांक 1845 में अपने निर्माण से अब तक के सबसे ऊँचे स्तर पर पहुंच गया। इसका सीधा परिणाम आम आदमी की क्रय षक्ति के सतत संकुचन रूप में सामने आ रहा है। लोग अनाज के रूप में अपनी सबसे प्राथमिक ज़रूरत को पूरा करने में भी असमर्थ हैं नतीजा भूख से पीड़ित और कुपोषित लोगों की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि। इसी तथ्य का प्रतिबिंबन अंर्तराष्ट्रीय खाद्य नीति एवं शोध संस्थान द्वारा प्रस्तुत रिर्पोर्ट में होता है।


इस रिर्पोर्ट में वर्ष 2001-2006 के आँकड़ों के आधार पर विभिन्न देषों को कुपोषण तथा भूखमरी के आधार पर क्रमवार व्यवस्थित किया गया है। इसके लिए एक ‘भूमण्डलीय भूख सूचकांक’ बनाया गया है और 1990 के आधार वर्ष पर विभिन्न देषों को शून्य से सौ तक के पैमाने पर रखा गया है और सबसे ख़राब स्थिति वाले 88 देषों को चिन्हित किया गया है। इस सूचकांक के निर्धारण लिए तीन आधार लिए गए हैं- पहला, कुपोषण की षिकार जनसंख्या का अनुपात, दूसरा पाँच साल से कम उम्र के कुपोषित बच्चों का अनुपात और तीसरा इसी उम्र के बच्चों की मृत्यु दर। इस अध्ययन में अन्य देशों के साथ-साथ भारत के संदर्भ में भी अनेक महत्वपूर्ण निष्कर्ष सामने आये हैं जिनसे इस अवधि में दुनिया भर में बढ़ती हुई असमानताओं और पूंजी के सतत संकेन्द्रण के चलते निचले संस्तरों की बढ़ती जा रही बदहाली के स्पष्ट प्रमाण मिलते हैं।


इस अवधि में विश्व की कुल मिलाकर स्थिति सुधरी है। 1990 के 15।2 से बढ़कर दुनिया के लिए इस सूचकांक का स्तर 2008 में 18.7 हो गया है। लेकिन इसका वितरण बेहद असमान रहा है। सबसे बुरी स्थिति सब-सहारा देषों तथा दक्षिणी एषिया के देषों की है जहाँ इस सूचकांक का मूल्य क्रमषः 23.3 तथा 23.0 है। कांगो, इरीट्रिया, बरण्डी, नाईजर, सियेरा लियेन, लिबेरिया, इथियोपिया जैसे देषों में हालात पहले से भी बद्तर हो गये हैं जबकि कुवैत, पेरू, सीरिया, तुर्की, मैक्सिको और क्यूबा में स्थिति में सबसे ज्यादा सुधार हुआ है।


भारत के संदर्भ में इस अध्ययन के नतीजे चैंकाने वाले हैं। वैष्विक परिदृष्य पर नायक की तरह उभरने के दावों के बीच भारत इस रिर्पोर्ट में शामिल सबसे बदतर स्थिति वाले 88 देषों में 66वें क्रम पर है। यहाँ 2 करोड़ से भी अधिक भूखे तथा कुपोषित लोग रहते हैं और इस तरह यह दुनिया की सबसे बड़ी कुपोषित आबादी का घर है। विकसित पष्चिमी देषों और चीन कोे तो छोड़िये हमारा क्रम मंगोलिया, म्यानमार, श्रीलंका, कीनिया, सूडान और पाकिस्तान के भी बाद आता है। देष के प्रमुख 17 प्रदेषों, जिनमें लगभग 95 फ़ीसदी जनसंख्या निवास करती है, के विषद अध्ययन के दौरान प्राप्त राज्यवार आँकड़े तो और भी चैंकाने वाले हैं। इनमें से कोई भी प्रदेष ऐसा नहीं जिसे सामान्य या फिर निम्न स्तर पर भूख तथा कुपोषण प्रभावित कहा जा सके। जहाँ सबसे बेहतर प्रदर्शन पंजाब का है वहीं मध्यप्रद्श की स्थिति सबसे बुरी है।


राज्यवार स्थिति का थोड़ा और विष्लेषण करें तो यह अध्ययन राज्योें को तीन श्रेणियों में बांटता है। पंजाब, असम, केरल और आंध्र प्रदेष क्रमश पहले तीन स्थानों पर हैं और इन्हें गंभीर रूप से प्रभावित क्षेत्रों में रखा गया हैजिनके लिए सूचकांक 20 से नीचे पाया गया। दूसरी श्रेणी में सूचकांक 20 और 29।9 के बीच हरियाणा, राजस्थान, पष्चिम बंगाल, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेष, महाराष्ट्र, कर्नाटक, उड़ीसा, गुजरात, छत्तीसगढ़, बिहार, और झारखण्ड को भयावह स्थिति वाले क्षेत्रों के रूप में चिन्हित किया गया है और अत्यंत ख़तरनाक रूप से प्रभावित क्षेत्र के रूप में मध्यप्रदेष को जहाँ सूचकांक 30.9 पाया गया। दूसरे शब्दों मे कहें तो जहाँ पंजाब की स्थिति 33 अन्य विकासशील देशों के जैसी ही है वहीं बिहार और झारखण्ड के हालात जिम्बाबवे और हैती से भी बदतर हैं और मध्यप्रदेश की हालत इथियोपिया और चाड के बीच की!


इस स्थिति के मूल में वही सारे मसाईल हैं जिनका जिक्र गिमनेज़ ने अपनी रिर्पोर्ट में किया है। विकास के नवउदारवादी माॅडल से बहिष्कृत लोगों की जिंदगी दिन ब दिन बदतर होती गई है। कृषि को बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हाथों में सौंपने के तमाम विनाषकारी परिणामों ने अनाज़ को आदमी से दूर कर दिया है। चंद्रयान भेजने और विकास के नित नये कंगूरे सजाने की होड़ में बुनियाद की स्याहियों को नज़रअंदाज किया जा रहा है। इस मुक्त बाज़ार में जहाँ मुद्रा को पर लग गये हैं वहीं श्रम की जं़ज़ीरें और मज़बूत हुई हंै फलस्वरूप न तो रोज़गार बढ़ रहे हैं न ही वास्तविक श्रम मूल्य। और अगर इसमें विष्वव्यापी मंदी के असर को भी जोड़ दें तो एक बेहद ख़ौफनाक पसेमंज़र दिखाई देता है जिसमें उस ‘जादूई बूंद’ के इंतजार में टकटकी लगाये दम तोड़ते लोगों की लंबी कतारें हैं।


पुनश्च - अभी हाल में संघ ने हिंदू सम्मान की रक्षा के लिए चार बच्चे पैदा करने की सलाह दी है। मौलाना लोग भी ऐसी सलाहें बाँटते ही रहते हैं। सुदर्शन जी और उनके मौलाना भाई जानते हैं कि ये भूखे-नंगे-बीमार लोग सबसे ज्यादा उन्हीं के काम आते हैं खा़सकर तब, जब दुनिया को बदलने का दावा करने वाले पस्तहिम्मती का षिकार हों। वैसे जानते तो यह हम भी हैं।

3 टिप्‍पणियां:

Pawan Meraj ने कहा…

swagat hai...

बेनामी ने कहा…

ese blogon ki bahut jarurat hai ... swagat hai
pawan meraj

अर्शिया अली ने कहा…

Gambheer vivechan hai.
( Treasurer-S. T. )