<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-6821438566583405249</id><updated>2011-12-31T04:17:13.310-08:00</updated><category term='भूख'/><category term='गरीबी'/><category term='श्रद्धांजलि'/><category term='हिंद स्वराज'/><category term='लमही'/><category term='पहली पोस्ट'/><category term='विकास'/><category term='खुदरा बाज़ार'/><category term='समयांतर'/><category term='अर्थशास्त्री'/><category term='विकल्प का सवाल'/><category term='दोस्त कलम'/><category term='रिपोर्ट'/><category term='नंदीग्राम'/><category term='समीक्षा'/><category term='अर्जुन स्नगुप्ता'/><category term='किताबें'/><category term='दलित उत्पीडन'/><title type='text'>अर्थात</title><subtitle type='html'>विकास के दावों के बीच हक़ीक़त की तलाश</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://economyinmyview.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6821438566583405249/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://economyinmyview.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>अशोक कुमार पाण्डेय</name><uri>https://profiles.google.com/116885901033264770599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh4.googleusercontent.com/-K5s3pyuRhYA/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAADcE/5R8Sp3ae2pk/s512-c/photo.jpg'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>15</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6821438566583405249.post-6722725293167299624</id><published>2010-10-25T21:07:00.000-07:00</published><updated>2010-10-25T21:07:04.600-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अर्जुन स्नगुप्ता'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='श्रद्धांजलि'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अर्थशास्त्री'/><title type='text'>अर्जुन सेनगुप्ता - एक मानवतावादी विचारक का अवसान</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_qroXGFM0DSM/TMZT0AZErmI/AAAAAAAADC0/9VI4LInFNio/s1600/2007081056671601.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="288" src="http://4.bp.blogspot.com/_qroXGFM0DSM/TMZT0AZErmI/AAAAAAAADC0/9VI4LInFNio/s320/2007081056671601.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 14.0pt; mso-bidi-language: HI;"&gt;अर्जुन सेन गुप्ता&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-size: 14.0pt; mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI;"&gt;एक मानवतावादी विचारक का अवसान&lt;/span&gt;&lt;span style="mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI;"&gt;जाने-माने विकास अर्थशास्त्री अर्जुन सेनगुप्ता का पिछले दिनों दिल्ली के अखिल भारतीय आर्युविज्ञान संस्थान में देहान्त हो गया। वह कुछ समय से प्रोटेस्टेंट कैंसर से पीड़ित थे। अपने लंबे और सक्रिय जीवन में उन्हें एक शिक्षाविद, आर्थिक प्रशासक, ब्यूरोक्रेट, संसद सदस्य तथा कूटनीतिज्ञ के रूप में पर्याप्त सम्मान मिला।&lt;/span&gt;&lt;span style="mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI;"&gt;10 जून, 1937 को कलकत्ता के एक उच्चशिक्षित मध्यवर्गीय संयुक्त परिवार में जन्मे श्री सेनगुप्ता वैसे तो शैक्षणिक तथा प्रशासनिक, दोनों क्षेत्रों में उच्च पदों पर रहे लेकिन &lt;/span&gt;&lt;span style="mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI;"&gt;‘&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI;"&gt;असंगठित क्षेत्र के कामगारों पर बने राष्ट्रीय आयोग&lt;/span&gt;&lt;span style="mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI;"&gt;’&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI;"&gt; के अध्यक्ष के रूप में वर्ष 2004 में प्रस्तुत की गयी उनकी रिपोर्ट से उन्हें सबसे ज़्यादा ख्याति मिली। इस रिपोर्ट में एन एस एस की तमाम रिपोर्टों के विस्तृत विश्लेषण द्वारा उन्होंने यह निष्कर्ष दिया था कि देश के लगभग 70 प्रतिशत अर्थात लगभग 8&lt;/span&gt;&lt;span style="mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI;"&gt;3.6 &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI;"&gt;करोड़ लोग आज भी &lt;/span&gt;&lt;span style="mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI;"&gt;20&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI;"&gt; रुपये रोज़ से कम में गुजारा करते हैं। उन्होंने इस रिपोर्ट में यह तर्क दिया था कि बिना इन लोगों की दशा सुधारे केवल लाभों को अधिकतम संभव करना किसी आर्थिक संवृद्धि का लक्ष्य नहीं होना चाहिये। उन्होंने यह भी लक्षित किया था कि गरीबी मिटाने के लिये जो विशाल धनराशि आवंटित की जाती है, उसका बड़ा हिस्सा सबसे ग़रीब लोगों तक पहुंच ही नहीं पाता, इसीलिये उनके सम्यक विकास के लिये विशेष लक्षित कार्यक्रमों और योजनाओं की ज़रूरत है। इस आयोग की अनुशंसा के चलते न केवल 2008 में &lt;/span&gt;&lt;span style="mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI;"&gt;‘&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI;"&gt;असंगठित क्षेत्र सामाजिक सुरक्षा कानून&lt;/span&gt;&lt;span style="mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI;"&gt;’&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI;"&gt; बना, बल्कि बाद में ग़रीबी रेखा को लेकर चली बहस में भी इसकी बेहद अहम भूमिका रही। संसद के भीतर तथा बाहर भूमण्डलीकरण के समर्थकों के विकास के दावे को बेपर्द करने वाला यह आंकड़ा किसी सूत्र वाक्य की तरह प्रचलित हुआ।&lt;span style="mso-spacerun: yes;"&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI;"&gt;मृत्यु के समय वह राज्यसभा के सदस्य थे जहां वह अगस्त 2005 में चुने गये थे। वैसे प्रेसीडेंसी कालेज़, कलकत्ता से परास्नातक और मैसाच्यूट्स इंस्टीट्यूट आफ़ टेक्नालजी से अर्थशास्त्र में पी एच डी करने के बाद उन्होंने थोड़े समय के लिये लंदन स्कूल आफ इकानामिक्स और दिल्ली स्कूल आफ इकानामिक्स में अध्यापन भी किया था। इसके बाद उन्होंने 1981 से 1984 तक पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के विशेष सचिव (आर्थिक सलाहकार) पद पर कार्य किया। वह 1985 से 1990 तक विश्व बैंक के कार्यकारी निदेशक और बैंक के प्रबंध निदेशक के आर्थिक सलाहकार, तथा 1990 से 1993 तक यूरोपीय यूनियन में भारत के राजदूत रहे। इसके बाद वह 1993 से 1998 तक योजना आयोग के सदस्य सचिव रहे। राज्यसभा सदस्य रहते हुए वह संयुक्त राष्ट्र के &lt;/span&gt;&lt;span style="mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI;"&gt;‘&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI;"&gt;विकास के अधिकार&lt;/span&gt;&lt;span style="mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI;"&gt;’&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI;"&gt; पर बने आयोग में भी स्वतंत्र विशेषज्ञ के रूप में सक्रिय थे। वहां उन्होंने गरीबी तथा मानवाधिकार हनन को पूर्णतः राष्ट्रीय अवधारणा की जगह एक वैश्विक समस्या के रूप में निरूपित किया था, और यह निष्कर्ष दिया था कि दुनिया भर के वंचित लोगों की भी दुनिया की संपदा तथा संसाधनों में न्यायसंगत हिस्सेदारी है । &lt;/span&gt;&lt;span style="mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI;"&gt;परंतु यहां हमें यह नहीं भूलना चाहिये कि वह 90 के दशक में शुरु किये गये सुधारों के विरोधी नहीं थे बल्कि उन्होंने 1980 के दशक में सरकारी उद्यमों के आर्थिक सुधार पर बने एक आयोग के अध्यक्ष के रूप में इन सुधारों की पूर्वपीठिका तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। आर्थिक सुधारों के आरंभिक दौर में वह विश्व बैंक के प्रबंध निदेशक के आर्थिक सलाहकार थे। दरअसल, वह नेहरु युग के उन मानवतावादी आर्थिक विचारकों में से थे जिनका मानना था कि एक पूंजीवादी व्यवस्था के भीतर भी सरकारी हस्तक्षेप तथा कल्याणकारी कार्यक्रमों द्वारा वंचित आबादी को यथेष्ट न्याय दिलाया जा सकता है। ऊपर उद्धृत रिपोर्ट में भी उन्होंने स्पष्ट किया है कि वह बाज़ार अर्थव्यवस्था या उदारीकरण के विरोधी नहीं लेकिन वंचित वर्गों को सरकार द्वारा सामाजिक सुरक्षा उपलब्ध करानी ही चाहिये। इसे एक विडंबना ही कहा जायेगा कि नव उदारवाद की जिन नीतियों के निर्माण में उनकी भूमिका रही, उन्हीं के कोख से उपजी भयावह वंचना को रेखांकित करने वाली रिपोर्ट ही अंततः उनके जीवन के सबसे महत्वपूर्ण योगदान के रूप में रेखांकित हुई।&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;span style="mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6821438566583405249-6722725293167299624?l=economyinmyview.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://economyinmyview.blogspot.com/feeds/6722725293167299624/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6821438566583405249&amp;postID=6722725293167299624' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6821438566583405249/posts/default/6722725293167299624'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6821438566583405249/posts/default/6722725293167299624'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://economyinmyview.blogspot.com/2010/10/blog-post.html' title='अर्जुन सेनगुप्ता - एक मानवतावादी विचारक का अवसान'/><author><name>अशोक कुमार पाण्डेय</name><uri>https://profiles.google.com/116885901033264770599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh4.googleusercontent.com/-K5s3pyuRhYA/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAADcE/5R8Sp3ae2pk/s512-c/photo.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_qroXGFM0DSM/TMZT0AZErmI/AAAAAAAADC0/9VI4LInFNio/s72-c/2007081056671601.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6821438566583405249.post-7730782464818682959</id><published>2010-04-23T10:25:00.000-07:00</published><updated>2011-10-20T22:07:49.272-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='रिपोर्ट'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='भूख'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='समयांतर'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='गरीबी'/><title type='text'>भूमण्डलीय गांव में भूख का सवाल</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;strong&gt;एक आर्थिक सर्वसत्ता वाद गोलियों से नहीं वरन अकालों से हत्या करता है।&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;em&gt;मिशेल चोसडुवस्की , ग्लोबलाईजेशन आफ़ पावर्टी में&lt;/em&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;आज़ादी के बाद तमाम असफलताओं के बीच जिस एक सफलता को लेकर आश्वस्त हुआ जा सकता था वह यह थी कि भारत में अकाल पर लगभग पूरी तरह नियंत्रण पा लिया गया। अपनी स्पष्ट पूंजीवादी प्रवृति तथा क्षेत्रीय और फ़सली पूर्वाग्रहों के बावज़ूद हरित क्रांति के देश को खाद्यान्नों के मामले में आत्मनिर्भर बनाने के महत्वपूर्ण योगदान को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। इस प्रक्रिया में जहां एक तरफ़ खाद्यान्न उपलब्धता बढ़ी वहीं दूसरी तरफ़ सर्वसुलभ लोक वितरण प्रणाली (पी डी एस) के चलते लोगों को पूरे साल अपने गावों और कस्बों के क़रीब अनाज़ और दूसरी ज़रूरी चीज़ें उचित मूल्य पर उपलब्ध होने से देश के बड़े हिस्से में भूखमरी पर काबू पाया गया। कुछ आज़ादी की लड़ाई के हैंगओवर और कुछ देश के भीतर तथा बाहर पूंजीवाद विरोधी शक्तियों की प्रभावी उपस्थिति के कारण गांव, कृषि और गरीब सरकारों के एज़ेण्डे पर चाहे.अनचाहे हमेशा उपस्थित रहे। राजकीय पूंजीवाद के पब्लिक सेक्टर माडल के तहत कृषि लागतों तथा उत्पादों पर विभिन्न संरक्षण तथा सब्सीडियां उपलब्ध कराई गयीं। हालांकि यहां यह ज़िक्र करना भी बेहद ज़रूरी है कि इनमें से अधिकांश से लाभान्वित होने वाले बड़े किसान ही रहे, भूमि सुधारों को लागू न किये जाने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था में विषमता के आधारों में लगातार विस्तार हुआ और देश की व्यापक कृषि आबादी, &lt;strong&gt;जिनमें बड़ा हिस्सा भूमिहीन मज़दूरों के रूप में काम करने वाले दलितों और आदिवासियों का था, निरंतर सीमांत पर ही रही, शहर केन्द्रित औद्योगिक विकास के कारण गावों से बड़ी मात्रा में शहर आये लोगों के चलते हुई जनसंख्या वृद्धि के बरअक्स सुविधाओं में विस्तार न होने के कारण वहां झुग्गी-झोपड़ियों के रूप में ‘मानवता के जीवित नरकों’ में लाखों लोग न्यूनतम सुविधाओं के बिना रहने को मज़बूर हुए और ‘भूखमरी की रेखा’ के रूप में परिभाषित ग़रीबी रेखा के बावज़ूद जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा इस रेखा के नीचे ही रहा&lt;/strong&gt; (दूसरे शब्दों में एक बड़ी आबादी दो जून के भोजन से भी वंचित रही।)&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;लेकिन नब्बे के दशक में ‘संरचनात्मक संयोजन’ वाली उदारीकरण के नाम से लागू नव साम्राज्यवादी नीतियों के लागू होने के बाद यह परिदृश्य भी पूरी तरह से बदल गया और इस वंचित तबके की चिन्तायें नीति निर्माताओं के एज़ेण्डे से पूरी तरह बाहर हो गयीं। इन नीतियों के तहत इस सिद्धांत को स्वीकार कर लिया गया कि सारे आर्थिक निर्णय बाज़ार की ताक़तों के भरोसे ही लिये जाने चाहिये। परिणाम यह हुआ कि समाज के वंचित तबके को दी जाने वाली सुविधायें एक-एक करके छीन ली गयीं और कार्यरूप में पहले से ही अनुपस्थित ‘समानता’ का विचार सिद्धांत रूप में भी तिरोहित कर दिया गया। &lt;strong&gt;इनके परिणाम भी फौरन ही दिखाई देने लगे। 1991 में इन नीतियों के लागू होने के तुरत बाद रसायनिक खाद की क़ीमतों में 40 फ़ीसदी की वृद्धि हो गयी, जुलाई 1991 में गेहूं और धान की क़ीमतों में 50 प्रतिशत की वृद्धि हुई, रोज़गारों में गिरावट आई, संगठित क्षेत्र की मज़दूरी की दर में कमी आई और भूख से होने वाली मौतों में वृद्धि हो गयी। (देखें चोसुडेवस्की की पूर्वोद्धृत पुस्तक का भारत संबधी अध्याय) &lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;वैसे यह परिघटना केवल भारत तक ही सीमित नहीं थी। दुनिया में जहां.जहां ये नीतियां लागू की गयीं ऐसे ही परिणाम सामने आये। 1990 के पूर्व खाद्यान्नों के मामले में आत्मनिर्भर रवांडा में इन नीतियों के लागू होने के बाद अकाल का शिकार हुआ। इथोपिया, सोमालिया, कीनिया और अन्य सब सहारा देशों में सरंचनात्मक समायोजन (सैप) की इन नीतियों के चलते अकाल और अराजकता के अंतहीन दौर की शुरुआत हुई, लैटिन अमेरिकी देशों में रोज़गारों और वास्तविक मज़दूरी दर में भारी गिरावट आई, वियतनाम की अर्थव्यवस्था तबाह हो गयी और अकाल जैसे हालात पैदा हुए, ब्राजील की ग्रामीण अर्थव्यवस्था तहस-नहस हो गयी, पेरु में तो इन नीतियों की घोषणा के एक दिन में ईंधनों की क़ीमत 2,968 प्रतिशत और रोटी की क़ीमत 1150 प्रतिशत बढ़ गई और औसत वेतन में भारी गिरावट हुई जिसके फलस्वरूप कुपोषण, भुखमरी और बाल मृत्यु दर के आंकड़ों में भयावह इज़ाफ़ा हुआ, बांगलादेश, बोलीविया, पूर्व सोवियत संघ के तमाम संघटकों, पाकिस्तान और बांग्लादेश सहित कोई भी देश इन भयावह परिणामों से सुरक्षित नहीं रह सका। (देखें वही)&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;भारत में भी इनका प्रभाव पूर्व में उद्धृत आंकड़ो तक ही सीमित नहीं रहा। कृषि अर्थव्यवस्था पर इसके दुष्प्रभावों की सबसे भयावह परिणिति लाखों किसानों की आत्महत्या के रूप में हुई जिससे आज सब परिचित हैं। 1991 के बाद देश के भीतर खाद्यान्न उपलब्धता लगातार घटती चली गई। एनएसएस के आंकड़ो के अनुसार 1991 में प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन 510 ग्राम अनाज़ उपलब्ध था जो 2004 आते आते केवल 463 ग्राम रह गया। आज वर्तमान विश्व औसत 309 किलोग्राम की तुलना में भारत में प्रति व्यक्ति प्रतिवर्ष खाद्यान्न उपलब्धता है मात्र 155 किलोग्राम। इसका स्वाभाविक परिणाम भुख से मरने वाले तथा कुपोषित लोगों की संख्या में भारी वृद्धि के रूप में हमारे सामने आया है। &lt;strong&gt;संयुक्त राष्ट्र की आर्थिक एवं सामाजिक समिति की 20 मार्च 2006 को प्रस्तुत रिपोर्ट&amp;nbsp; में भोजन के अधिकार संबंधी विशेष अधिकारी ज्यां ज़ेगलर ने लिखा है कि पिछले वर्षों में खाद्यान्न उत्पादन की विकास दर जनसंख्या की विकास दर से तेज़ रही है, इसलिये राष्ट्रीय स्तर पर भारत एक अरब से अधिक की अपनी जनसंख्या को भोजन उपलब्ध कराने में सक्षम है। फिर भी इन प्रभावशाली उपलब्धियों के बावज़ूद भारत पारिवारिक स्तर पर खाद्यान्न सुरक्षा उपलब्ध कराने में असफल रहा है। कुपोषण तथा गरीबी का स्तर बहुत ऊंचा है और इस बात के पर्याप्त संकेत हैं कि 1990 के उत्तरार्ध में ग़रीबी और खाद्यान्न असुरक्षा में काफ़ी वृद्धि हुई है।&lt;/strong&gt; ( पेज़ 5) &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;इस रिपोर्ट के अनुसार हर साल देश में बीस लाख बच्चे गंभीर कुपोषण और इलाज़ की जा सकने वाली बीमारियों की वज़ह से मर जाते हैं ( यानि इलाज़ की समुचित व्यवस्था न होने से)। बच्चों की संख्या के आधे से अधिक बच्चे गंभीर कुपोषण के शिकार हैं, कुल 47 प्रतिशत का वज़न औसत से कम है और 46 प्रतिशत की लंबाई। यह आंकड़ा दुनिया में सबसे ज़्यादा ऊंचे स्तर का है, ज़्यादातर सब सहारा देशों से भी बुरा। दुनिया के कुल कम वज़न वाले बच्चों में 42 प्रतिशत भारत में है। तीस प्रतिशत बच्चे पैदा होते समय ही कम वज़न के होते हैं जिसका अर्थ है कि उनकी मातायें भी कुपोषित होती हैं। बचपन के आरंभिक दौर में ही बच्चे कुपोषण का शिकार हो जाते हैं और बालिकाओं में यह प्रवृति अपेक्षाकृत ज़्यादा है जो समाज में औरतों के साथ होने वाले भेदभाव का स्पष्ट परिचायक है। रिपोर्ट के अनुसार अस्सी प्रतिशत लड़कियांए कन्या शिशु और औरतें कुपोषण का शिकार हैं।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;इस रिपोर्ट के अनुसार बीस करोड़ से अधिक महिलायें, बच्चे और पुरुष दो जून की न्यूनतम आवश्यक भोजन आवश्यकतायें भी पूरी नहीं कर पाते। अपनी आय का सत्तर प्रतिशत भोजन पर ख़र्च करने के बावज़ूद इन्हें भारत सरकार द्वारा आवश्यक निर्धारित 1700 कैलोरी उर्ज़ा भी नहीं जुट पाती, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित 2100 कैलोरी की तो बात ही क्या है। देश में औसत कैलोरी उपभोग भी घटा है लेकिन यह जहां नई आर्थिक नीतियों के बाद उच्च आय वर्ग तथा मध्यम वर्ग की खाद्य आदतों में परिवर्तन का परिचायक है वहीं गरीब जनता की बढ़ती हुई बदहाली का। ग्रामीण क्षेत्रों में पिछले एक दशक में जहां अनाज़ों का उपभोग 2 14 प्रतिशत घट गया उनका कुल कैलोरी उपभोग 1 53 प्रतिशत कम हो गया, जिसका अर्थ है कि वे वास्तव में अलग-अलग तरह की चीज़ें खाने की जगह कम अनाज़ खा रहे हैं। ख़ासतौर पर यह इस तथ्य की रौशनी में और साफ़ हो जाता है कि नब्बे के दशक में खाद्यान्नों की कीमतों में वास्तविक मज़दूरी दर की तुलना में तीव्र वृद्धि हुई है ( वही पेज़ 6)&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;strong&gt;यह रिपोर्ट इस तथ्य की ओर भी पर्याप्त संकेत करती है कि गरीबी के आंकड़े में जिस कमी का दावा सरकार कर रही है वह दरअसल आंकड़ों की कलाबाजी है। साथ ही नई आर्थिक नीतियों के फलस्वरूप देश के भीतर आर्थिक असमानता की खाई भी और ज़्यादा गहरी हुई है।&lt;/strong&gt; गावों के भीतर इन नीतियों के लागू होने के बाद ज़मीन की मिल्कियत लगातार कुछ हाथों में सिमटती गई है जिससे भूमिहीन श्रमिकों की संख्या में बढ़ोत्तरी हुई है। देश के भीतर आज ग्रामीण आबादी का 47 प्रतिशत ऐसे ही श्रमिकों का है। शहरी क्षेत्रों में भी श्रम नियमों में ढील के फलस्वरूप भारी संख्या में लोग बेरोज़गार हुए हैं और सुरक्षित रोज़गारों में कमी आई है। अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में चाय की क़ीमतों में आई कमी के चलते साठ हज़ार से अधिक मज़दूर बेरोज़गार हुए हैं और लाखों अन्य की वास्तविक मज़दूरी में कमी होने से उनके परिवारों में भुखमरी जैसी स्थित पैदा हुई है। ऐक्शन एड के एक अध्ययन के मुताबिक मार्च 2002 से फ़रवरी 2003 के बीच केवल चार बागानों में ही 240 मज़दूरों की भूख की वज़ह से मौत हो गई।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;इसके पहले 2000.2001 के आंकड़ों के आधार पर अंतर्राष्ट्रीय खाद्य नीति एवम शोध संस्थान द्वारा प्रस्तुत ग्लोबल हंगर इंडेक्स ने भी भारत में भुखमरी की समस्या में लगातार हो रही वृद्धि का खुलासा किया था। इस रिपोर्ट के अनुसार वैश्विक परिदृश्य पर नायक की तरह उभरने के दावों के बीच भारत इस रिर्पोर्ट में शामिल सबसे बदतर स्थिति वाले 88 देशों में 66वें क्रम पर है। यहाँ 2 करोड़ से भी अधिक भूखे तथा कुपोषित लोग रहते हैं और इस तरह यह दुनिया की सबसे बड़ी कुपोषित आबादी का घर है। विकसित पश्चिमी देशों और चीन को तो छोड़िये हमारा क्रम मंगोलिया, म्यानमार, श्रीलंका, कीनिया, सूडान और पाकिस्तान के भी बाद आता है। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;स्पष्ट है कि भूमण्डलीकरण के बाद के दौर में तमाम दावों और विकास दर में उछाल के बावज़ूद जीवन की न्यूनतम ज़रूरतों से समाज का एक बड़ा तबका महरूम होता जा रहा है। रिसाव का वह सिद्धांत पूरी तरह से विफल होता दिख रहा है जो ऊपरी संस्तर पर समृद्धि आने के चलते इसके अपने आप निचले संस्तरों तक पहुंचने को स्वयंसिद्ध मान रहा था। बराबरी या सामाजिक न्याय जैसी बातें तो ख़ैर इसके एज़ेण्डे में थी हीं नहीं।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि गरीब तबके के बीच खाद्यान्न उपलब्धता में यह कमी राष्ट्रीय स्तर पर अनाज़ की कमी की वज़ह से नहीं है। ज्यां जेगलर का पूर्व में दिया गया उद्धरण इस ओर स्पष्ट संकेत करता है। पहले भी आकलैण्ड स्थित ‘खाद्य एवं विकास नीति संस्थान’ के कार्यकारी निदेशक एरिक हाल्ट गिमनेज द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट ‘विश्व खाद्य संकट : इसके पीछे क्या है में यह साफ़ तौर पर कहा गया था कि लोग भूखे हैं और यह प्राकृतिक नहीं है’। खाद्य संकट की भयावहता का जिक्र करते हुए वह बताते हैं कि 1974 में विकासशील देशों में 5 करोड़ लोग भूखे थे और उस वर्ष आयोजित विश्व खाद्य सम्मेलन ने अगले दस सालों में दुनिया से भूख को पूरी तरह से समाप्त करने का प्रस्ताव पास किया था लेकिन 1996, 2006 और 2008 में यह लगातार बढकर क्रमशः 8.3 करोड, 8.5 करोड़ और 8.62 करोड़ हो गई। यही नहीं, अब तक विकासशील और पिछड़ी अर्थव्यवस्थाओं में ही सिमटी यह बीमारी अमेरिका में भी पहुंच गई है। 2008 में वहाँ भूख के शिकार लोगों की संख्या 35 लाख (12 प्रतिशत) तक पहुंच गयी जबकि इस वर्ष सरकारी ख़जाने से पोषण कार्यक्रमों के लिए कुल बज़ट 60 लाख डालर दिया गया! ऐसे में एशिया और अफ्रीका के हालात कोई भी समझ सकता है।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;गिमनेज इसके कारणों की सटीक तलाश करते हुए बताते हैं कि पहली बात तो यह कि इसका जनसंख्या वृद्धि से कोई लेना-देना नहीं है। पिछले वर्षों में हमेशा यह तर्क दिया जाता रहा कि जनसंख्या बढने की तेज़ रफ़्तार के चलते खाद्यान्नों का उत्पादन पिछड़ जाता है लेकिन विगत चार वर्षों में जहाँ जनसंख्या की वार्षिक वृद्धि दर 1.14 प्रतिशत रही वहीं अनाज का उत्पादन 2 फीसदी सालाना की दर से बढ़ा। वर्ल्ड हंगर प्रोग्राम के कार्यकारी निदेशक जोसेट शीरन कहते हैं कि ‘‘ पहले से ज्यादा लोग अब भूखे हैं। अनाज भरा पड़ा है लेकिन लोग खरीद नहीं पा रहे हैं।’’&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;strong&gt;इसलिए अगर प्रति व्यक्ति खाद्यान्न उपलब्धता में कमी आई है तो फिर कारण अन्य हैं। कारण हैं – जनविरोधी नीतियां, गैरबराबरी आधारित व्यापार संबंध और विकास की गलत अवधारणा। गिमनेज का मानना है कि वर्तमान खाद्यान्न संकट के लिए बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ जिम्मेदार हैं।&lt;/strong&gt; कृषि में उनके बढ़ते हस्तक्षेप से किसान तबाह हो रहे हैं। ब्रेटनवुड्स समझौते से प्राप्त अकूत ताक़त से इन्होंने कृषि उत्पादों से लेकर खाद, बीज, कीटाणुनाशकों और उत्पादन तकनीकों तक पर कब्ज़ा कर लिया है और इसका प्रयोग कर अपार लाभ कमाया है। बाज़ार से कृषि को जोड़ने का कोई लाभ कम से कम एषिया और अफ्रीका के ग़रीब किसानो को तो नहीं ही मिला है। इसका दूसरा पक्ष है अनाजों की क़ीमतों में भारी वृद्धि। मार्च 2008 में विश्व बाज़ार में गेंहू का दाम पिछले साल की तुलना में 130 फ़ीसदी, सोया का 87 फ़ीसदी चावल का 74 फ़ीसदी और मक्के का 31 फ़ीसदी बढ़ गया। पिछले तीन वर्षों में अनाजों के विश्व मूल्य सूचकांक मंे 83 फ़ीसदी की बढ़ोत्तरी हुई जबकि पिछले तीन महीनों में यह वृद्धि 45 फ़ीसदी की हुई जिससे यह सूचकांक 1845 में अपने निर्माण से अब तक के सबसे ऊँचे स्तर पर पहुंच गया। इसका सीधा परिणाम आम आदमी की क्रय शक्ति के सतत संकुचन रूप में सामने आ रहा है। लोग अनाज के रूप में अपनी सबसे प्राथमिक ज़रूरत को पूरा करने में भी असमर्थ हैं नतीजा भूख से पीड़ित और कुपोषित लोगों की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;strong&gt;भूख के इसी सवाल को लेकर और भोजन को संवैधानिक अधिकार घोषित करने की मांग को लेकर अप्रैल 2001 में पीपुल्स यूनियन फ़ार सिविल लिबर्टी की राजस्थान इकाई ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की।&lt;/strong&gt; याचिका की मूल प्रस्थापना यह थी कि भोजन का अधिकार भारतीय संविधान के आर्टिकल 21 के अंतर्गत आने वाले मूलभूत अधिकार जीवन के अधिकार में ही सन्निहित है। इसके पहले भी 1978 में मेनका गांधी बनाम भारत सरकार तथा 1990 में शान्तिस्टार बिल्डर्स बनाम नारायण खीमालाल टोटामे के मुकदमे में उच्च न्यायालय भोजन के अधिकार को आर्टिकल 21 के तहत मान चुका है। इसके अलावा आर्टिकल 39 ए ( सभी लोगों को जीवन पालने के संदर्भ में पर्याप्त साधन उपलब्ध कराने से संबद्ध), आर्टिकल 47 ( सरकार के प्राथमिक कार्य के रूप में आवश्यक पोषण , जीवन स्तर एवं जन स्वास्थ्य सुधार को चिन्हित करने से संबद्ध तथा आर्टिकल 32(1) ( मूल अधिकारों की उपेक्षा पर उच्च न्यायालय में सीधे अपील करने के अधिकार) के सहारे न्यायालय में भोजन के अधिकार को सुनिश्चित कराने के लिये चली इस क़ानूनी लड़ाई में कई महत्वपूर्ण फ़ैसले सामने आये। (इस याचिका का महत्व इस रूप में भी बहुत बढ़ जाता है कि 2001-2002 के दौरान भारत में जहां एक तरफ़ खाद्यान्न का रिकार्ड उत्पादन हुआ वहीं सूखा प्रभावित इलाक़ों में अकाल जैसी भयावह स्थितियां पैदा हो गयीं। ग़रीब तथा सूखा पीड़ित लोगों को अनाज़ पहुंचाने की जगह अनाज़ के अतिरिक्त स्टाक को बेहद सस्ते दरों पर अमेरिका सहित तमाम देशों को बेच दिया गया और वहां इस अनाज़ का उपयोग जानवरों को खिलाने के लिये किया गया। बाद में इस पूरे मामले में हुए घोटाले का भी पर्दाफ़ाश हुआ जिसके अनुसार अनाज़ की एक बड़ी मात्रा फ़र्ज़ी निर्यात बिलों के ज़रिये काले बाज़ार तक पहुंची। इस मामले की जांच अब तक ज़ारी है।) इस याचिका में राज्य द्वारा भूख राहत उपलब्ध कराने में विफलता को दो विशिष्ट आधारों पर प्रस्तुत किया गया, पहला, लोक वितरण प्रणाली घोर अनदेखी और दूसरा सूखा राहत योजनाओं की अपर्याप्तता। न्यायालय से अपील की गयी कि वह सरकार को फौरन सूखा पीड़ित गांवों में पर्याप्त रोज़गार उपलब्ध कराने, कार्य करने में अक्षम लोगों को सहायता प्रदान करने, लोक वितरण प्रणाली के तहत अनाज़ का क़ोटा बढ़ाने तथा सभी लोगों को सब्सीडाइज़ दरों पर अनाज़ उपलब्ध कराने हेतु निर्देशित करे।. &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;न्यायालयों के अनुकूल रुख तथा देश भर के मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की सक्रियता के फलस्वरूप कालांतर में ऐसी याचिकाओं में काफ़ी वृद्धि हुई तथा इनके तहत तमाम मांगे सामने आईं। न्यायालय ने अपने 44 से अधिक अंतरिम आदेशों में सरकार को भोजन तथा राहत के लिये बनाये गये तमाम कार्यक्रमों के संबध में अनेक महत्वपूर्ण निर्देश दिये। भूख से होने वाली मौतों तथा इन कार्यक्रमों की असफलता के लिये सरकारों तथा अधिकारियों को सीधे ज़िम्मेदार बनाया गया तथा इन अंतरिम आदेशों के अनुपालन तथा क्रियान्वयन को सुनिश्चित करने के लिये विशेष गैरसरकारी आयुक्त नियुक्त किये गये। वर्तमान में योजना आयोग के पूर्व सचिव डा एन सी सक्सेना इसके आयुक्त हैं और उनकी सहायता के लिये पूर्व आई ए एस और सामाजिक कार्यकर्ता हर्ष मंदर और डा सी पी सुजय की नियुक्ति की गयी है। इन अंतरिम आदेशों में से पहला 28 नवंबर 2001 को ज़ारी किया गया जो आठ खाद्यान्न राहत योजनाओं पर केन्द्रित था, लोक वितरण प्रणाली, अन्त्योदय अन्न योजना, मध्यान्ह भोजन योजना, एकीकृत बाल विकास योजना, अन्नपूर्णा योजना, राष्ट्रीय वृद्धावस्था पेंशन योजना, राष्ट्रीय मातृत्व लाभ योजना और राष्ट्रीय परिवार लाभ योजना। इस अंतरिम योजना द्वारा इन आठ योजनाओं के अंतर्गत मिलने वाले लाभों को अधिकार में परिवर्तित कर दिया गया। अर्थात अब इनके द्वारा मिलने वाली सहायता में कमी या अनदेखी के खिलाफ़ ज़रूरत पड़ने पर न्यायालय में जाया जा सकता था। मध्यान्ह भोजन के संदर्भ में खाद्यान्न देने की जगह पका हुआ खाना देने के निर्देश दिये गये। इसके अलावा लोक वितरण प्रणाली को दुरुस्त बनाये जाने के संबंध में भी कई आदेश दिये गये और ग्राम सभा सहित संबद्ध एजेंसियों तथा अधिकारियों को ज़िम्मेदार बनाया गया।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;( न्यायालय के अंतरिम आदेशों तथा अन्य विवरणों पर विस्तार से जानने के लिये देखें राईट टू फ़ूड की वेबसाईट WWW.RIGHTTOFOODINDIA.ORG)&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;देश के भीतर इन्हीं दबावों और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ज़ारी तमाम रिपोर्टों के कारण हो रही छीछालेदर से बचने के लिये पिछले चुनाव से पहले कांग्रेस नीत यू पी ए ने भोजन के अधिकार को अपने घोषणापत्र में शामिल करते हुए भोजन का अधिकार कानून बनाये जाने का वायदा किया था। वैसे इस बार निर्बाध सत्ता में आने के बाद ऐसे कई क़ानून बनाये गये हैं जो ऊपर से देखने में तो क्रांतिकारी लगते हैं परंतु उनका थोड़ा गहरा अध्ययन सरकार की मंशा को साफ़ कर देता है। उदारीकरण की गति को तीव्रतम संभव स्तर पर ले जाने को कटिबद्ध इस सरकार के लिये ऐसे अधिकार बस जनता के बीच फैलती जा रही बदहाली के बरक्स चेहरा छुपाने और लीपापोती के माध्यम हैं। &lt;strong&gt;शिक्षा के अधिकार के बाद हाल में ही जब प्रस्तावित राष्ट्रीय खाद्यान्न सुरक्षा विधेयक की ड्राफ़्ट कापी सामने आई तो यह और स्पष्ट हो गया।&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;यह प्रस्तावित बिल खाद्यान्न सुरक्षा उपलब्ध कराने की जगह पहले से उपलब्ध सुविधाओं में ही कटौती करने वाला है। &lt;strong&gt;भोजन का अधिकार आंदोलन से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता ज्यां द्रेज़ के अनुसार जहां तक भुखमरी समाप्त करने का सवाल है यह प्रस्तावित बिल बिल्कुल अप्रभावी है। यह वर्तमान खाद्य उपलब्धता में कुछ नहीं जोड़ता। गरीबी रेखा के नीचे रहने वालों का आवंटन उस स्तर से भी नीचा हो गया है जिसके लिये न्यायालय ने आदेश दिये थे और बाकियों के लिये यह कोई गारंटी नहीं देता। यह प्रस्तावित बिल अवश्य फिर से बनाया जाना चा&lt;/strong&gt;हिये। ( देखें फ्रंटलाईन, 23 अप्रैल,2010, पेज़ 11)&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;इस बिल की सबसे पहली समस्या है कि यह खाद्यान्न सुरक्षा को केवल ग़रीबी रेखा से नीचे वाली आबादी के लिये सीमित करता है। इसकी प्रस्तावना के पहले हिस्से में कहा गया है कि, यह एक ऐसा क़ानून जो भारत की समस्त जनता को खाद्यान्न सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिये क़ानूनी ढांचा उपलब्ध करायेगा जिससे उनकी सक्रिय तथा स्वस्थ जीवनशैली को प्रोत्साहित किया जा सके और वे राष्ट्रनिर्माण में उत्पादक भूमिका निभा सकें।‘ अब इस हिस्से में बात चाहे जितनी अच्छी लगती हो लेकिन खाद्यान्न सुरक्षा जैसी किसी चीज़ को समुचित रूप से परिभाषित न किये जाने और राष्ट्र निर्माण जैसी अमूर्त शब्दावली को रोज़गार सहित किसी भी मूर्त परिभाषा से न जोड़े जाने के कारण इसका कोई सम्यक अर्थ नहीं निकलता, यही नहीं ‘ समस्त नागरिकों’ को खाद्यान्न सुरक्षा उपलब्ध कराये जाने की बात भी अगली ही लाईन में मुगालता साबित होती है जब यह कहा जाता है कि’ यह क़ानून समाज के गरीब, असुरक्षित और भेद्य वर्ग लोक वितरण प्रणाली में सुधार द्वारा प्रति व्यक्ति प्रतिमाह खाद्यान्न की एक न्यूनतम मात्रा उपलब्ध करायेगा। साफ़ है कि इस परिभाषा में वे करोड़ों लोग छूट जायेंगे जो सरकारी ग़रीबी रेखा से ऊपर हैं। अब इन लोगों को खाद्यान्न सुरक्षा का कानूनी कवच खाद्यान्न उपलब्ध कराये बिना कैसे मिलेगा यह कोई भी समझ सकता है। यहां एक झोल यह भी है कि इस प्रस्तावित बिल के अनुसार राज्य सरकारें सिर्फ़ उन लोगों को राहत प्रदान कर सकेंगी जो केन्द्र सरकार द्वारा अति ग़रीब के रूप में चिन्हित हैं। इस प्रकार केरल और तमिलनाडु जैसे राज्य जहां लोकवितरण प्रणाली का सार्वत्रीकरण किया जा चुका है पहले से दी जा रही राहत को वापस लेने पर मज़बूर होंगे। यहां यह बता देना समीचीन होगा कि सक्सेना समिति द्वारा परिभाषित गरीबी रेखा को स्वीकार न किये जाने के पीछे एक तर्क यह था कि इस परिभाषा से ग़रीबों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि हो जायेगी और इतने लोगों को सस्ते क़ीमत पर खाद्यान्न उपलब्ध करा पाना संभव नहीं होगा। इन अति गरीब परिवारों के लिये भी मात्र 25 किलो अनाज़ उपलब्ध कराने की बात है जबकि अब तक उन्हें अंत्योदय योजना के तहत 35 किलो अनाज़ मिल रहा था।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;यही नहीं, इस योजना से अतिवाद, नक्सलवाद तथा आतंकवाद पीड़ित इलाकों को अलग रखा गया है और युद्ध, आर्थिक आपातकाल जैसे समयों में स्थगित करने का प्रस्ताव है। इसका मतलब यह हुआ कि अगर मंदी जैसी कोई आर्थिक समस्या आई या फिर युद्ध छिड़ा तो उसके पहले शिकार ग़रीब होंगे जिनसे सस्ते अनाज़ की यह सीमित राहत भी छिन जायेगी साथ ही सबसे गरीब आदिवासी जो नक्सल पीड़ित इलाक़ों में रहते हैं उन तक भी इस योजना का लाभ नहीं पहुंचेगा।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;दरअसल, लोकवितरण प्रणाली का सार्वत्रीकरण इस पूरे आंदोलन में एक अत्यंत महत्वपूर्ण मांग रही है। आर्थिक सुधारों के बाद सर्वसुलभ लोक वितरण प्रणाली के बाद जबसे इसे लक्षित ( टारगेटेड) बना दिया गया तभी से इसकी भारी अनदेखी हुई है और एक व्यवस्था के रूप में यह बिल्कुल नाकारा साबित हुई है। भोजन के अधिकार आंदोलन से जुड़े लोगों का तर्क है कि इसे फिर से सभी के लिये सुलभ बनाया जाना चाहिये। ऐसा करने से एक तरफ़ उन लोगों को भी राहत मिलेगी जो गरीबी रेखा कार्ड से किंचित कारणों से महरूम हैं और दूसरी तरफ़ अनाज़ की बढ़ती क़ीमतों पर काबू भी पाया जा सकेगा। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;कुल मिलाकर इस कानून का सारा ज़ोर बस लक्षित लोक वितरण प्रणाली के तहत चिन्हित परिवारों को न्यूनतम मदद उपलब्ध करा कर सारी ज़िम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेना है। इस बात को बिल्कुल नज़रअंदाज़ कर दिया गया है कि तथाकथित एपीएल आबादी का भी एक बड़ा हिस्सा कुपोषण और भुखमरी का शिकार है। यही वज़ह है कि इस आंदोलन से जुड़े लोगों ने इस प्रस्तावित क़ानून का तीखा विरोध दर्ज़ कराया जिसके बाद सत्ताधारी दल के भीतर भी इसको लेकर असंतोष स्पष्ट दिखाई दिया। अब यह कहा जा रहा है कि इन कमियों को दूर करके संशोधित ड्राफ़्ट पेश किया जायेगा।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;दरअसल, अगर ये सारी आपत्तियां दूर भी कर दी जायें तो भी यह ध्यान में रखा जाना चाहिये कि भोजन के अधिकार में सारी कवायद अनाज़ को दुकानों में उपलब्ध करा देने भर पर है। अगर ऐसा संभव हो भी जाता है तो भी गांवों तथा शहरों में रोज़गारों में लगातार आती कमी, अनाज़ों तथा जीवनावश्यक वस्तुओं की क़ीमतों में अभूतपूर्व कृषि के कार्पोरेटीकरण तथा सरकारी अनदेखी से लगातार अलाभकारी होते जाने और नव साम्राज्यवादी नीतियों के चलते धन और आय के सीमित हाथों में सतत संकेन्द्रण के कारण लोगों की क्रयशक्ति में लगातार कमी आई है। शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी सुविधाओं के निजीकरण ने इन मदों में आम आदमी को अपने बज़ट का बड़ा हिस्सा ख़र्च करने पर मज़बूर किया है। अपनी इस घटती हुई तथा अनिश्चित क्रय शक्ति के चलते आम आदमी अपने तथा अपने बच्चों के लिये आवश्यक पोषण में कटौती करने पर मज़बूर हुआ है। आय में वृद्धि के नियमित प्रयासों के बिना न्यायालय या संविधान द्वारा दिये गये कोई भी अधिकार अंततः काग़ज़ी घोषणा बनकर ही रह जायेगें। नव साम्राज्यवादी शासन व्यवस्था के तहत यह संभव ही नहीं है कि धन और आय के समान वितरण हेतु कोई सार्थक कदम उठाया जा सके क्योंकि असमानता और अतिरेकों का सीमित हाथों में संकेन्द्रण इसकी परिचालक शक्ति है। बहुराष्ट्रीय पूंजी सस्ते श्रम और संसाधनों की तलाश में पूरी दुनिया में घूमती है। अतिरेक के इसी अंध लालसा का परिणाम है विकासशील कहलाने वाली तमाम व्यवस्थाओं में श्रमिकों की तबाही और ज़मीनों तथा प्राकृतिक संसाधनों की भयावह लूट के चलते अभूतपूर्व विस्थापन। मंदियों की नियमित पुनरावृत्ति तथा हिंसक प्रतिरोधों के बावज़ूद मुनाफ़े की इस अदम्य लालसा में कोई कमी नहीं आई है। सेज़ ही नहीं आईपीएल जैसे भ्रष्ट तथा अश्लील कृत्यों में हमने सत्ता वर्ग तथा पूंजीपतियों की जो नाभिनालबद्धता देखी है उसके बरक्स ऐसे किसी क्रांतिकारी परिवर्तन की उम्मीद करना बस दिवास्वप्न ही होगा। अगर इस परिस्थिति को बदलकर इन नीतियों का वैकल्पिक माडल प्रस्तुत कर कोई जनता के बड़े समूह को इस वंचना तथा शोषण से मुक्ति दिला सकता है तो वे हैं वैज्ञानिक समाजवाद की पक्षधर जनता की ताक़तें। अपने बिखराव, टूटफूट तथा संभ्रम से बाहर निकलकर इन्हें आज यह ऐतिहासिक ज़िम्मेदारी निभानी ही होगी। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6821438566583405249-7730782464818682959?l=economyinmyview.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://economyinmyview.blogspot.com/feeds/7730782464818682959/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6821438566583405249&amp;postID=7730782464818682959' title='5 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6821438566583405249/posts/default/7730782464818682959'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6821438566583405249/posts/default/7730782464818682959'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://economyinmyview.blogspot.com/2010/04/blog-post.html' title='भूमण्डलीय गांव में भूख का सवाल'/><author><name>अशोक कुमार पाण्डेय</name><uri>https://profiles.google.com/116885901033264770599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh4.googleusercontent.com/-K5s3pyuRhYA/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAADcE/5R8Sp3ae2pk/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6821438566583405249.post-5697484600234699708</id><published>2010-03-07T01:42:00.000-08:00</published><updated>2011-11-08T08:07:34.882-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='लमही'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='गरीबी'/><title type='text'>भूमण्डलीय ग्राम से बहिष्कृत शहरी ग़रीब</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_qroXGFM0DSM/S5N1lQUTMTI/AAAAAAAACw0/K5VLvS0sV9o/s1600-h/small229.jpg"&gt;&lt;img alt="" border="0" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5445825657316782386" src="http://2.bp.blogspot.com/_qroXGFM0DSM/S5N1lQUTMTI/AAAAAAAACw0/K5VLvS0sV9o/s400/small229.jpg" style="cursor: hand; height: 126px; width: 172px;" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;ग़रीबी की बहस हमारे देश में बहुत पुरानी है।&lt;/strong&gt; औपनिवेशिक ग़ुलामी से मुक्ति के बाद से ही हमारे विकास की तमाम योजनाओं में ग़रीबी हटाने और देश के भीतर व्याप्त सामाजार्थिक विषमता को दूर करने की बातें की जाती रहीं। लोकतांत्रिक प्रणाली और शायद गांधी के ग्राम स्वराज से प्रभावित तत्कालीन कांग्रेसी और समाजवादी राजनेताओं और बुद्धिजीवियों ने गांवो के विकास और वहां की व्यापक ग़रीब आबादी की समस्याओं को केन्द्र में लाने के महती प्रयास किये। उदाहरण के लिये समाजवादी आंदोलन के एक प्रमुख नेता चौधरी चरण सिंह ने अपनी किताब – &lt;strong&gt;‘भारत के आर्थिक दुःस्वप्न – कारण और निवारण &lt;/strong&gt;’ में गावों के विकास और वहां रह रही ग़रीब बहुसंख्या के विकास में असफल रहने का आरोप लगाते हुए तत्कालीन कांग्रेस सरकार की कड़ी आलोचना करते हुए विकल्प के रूप में ग्रामीण अर्थव्यवस्था के समग्र विकास के लिये लघु तथा कुटीर उद्योगों के विकास तथा सहकारिता के विस्तार का प्रस्ताव किया था। वहीं वामपंथी आंदोलन भी ग़रीबों के प्रति अपनी स्पष्ट पक्षधरता के बावज़ूद मुख्यतः संगठित क्षेत्र के कामगारों तक ही सीमित रहा। &lt;strong&gt;गांव तथा उसकी समस्यायें हिन्दी साहित्य की प्रगतिशील धारा पर भी हावी रहीं और एक दौर तो ऐसा आया था कि लेखक के लिये अपनी जनपक्षधरता साबित करने के लिये ग्रामीण परिवेश पर लिखना आवश्यक माना जाता था, और यह एक हद तक अब भी है।&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;भारत की विशाल ग्रामीण जनसंख्या तथा कृषि पर इसकी निर्भरता को देखते हुए यह स्वाभाविक भी था। लंबे औपनिवेशिक शासन के दौर में जिस तरह पारम्परिक अर्थव्यवस्था को नष्ट कर दिया था और पूरी दुनिया में हुए शहरीकरण के विपरीत भारत में नगरों से गावों की तरफ़ हुए पलायन ने स्थिति को बद से बद्तर बना दिया था। एक तरफ़ कृषि पर जनसंख्या का दबाव बढ़ा था तो दूसरी तरफ़ इस क्षेत्र की उत्पादकता भी काफ़ी कम थी। इसके साथ भू-वितरण में भयावह असमानता और गावों में पुरोगामी सामाजिक संरचनाओं की उपस्थिति ने गावों को, ख़ासतौर पर, वहां रहने वाली गरीब दलित-पिछड़ी आबादी के लिये नर्क में तब्दील कर दिया था। इसीलिये आज़ादी के बाद जब नेहरुवादी मिश्रित अर्थव्यवस्था के दौर में औद्योगीकरण आरंभ हुआ तो बड़ी संख्या में गावों से शहरों की तरफ़ माईग्रेशन हुआ। नये विकसित हो रहे शहरों में गावों की तलछट पर रह रहे ये लोग बेहतर रोज़गार, समानतापूर्ण व्यवहार और प्रगति के सपनों के साथ आये। महानगरों में व्यापक स्तर पर हो रहे निर्माण कार्यों और नई-नई फ़ैक्ट्रियों के लिये श्रमिकों की यह फ़ौज़ एक आवश्यकता भी थी। अपने बेहद सस्ते श्रम से इस विस्थापित सर्वहारा आबादी ने नये भारत के विकास में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और अब भी निभा रहे हैं। लेकिन विकास की सारी चमक-दमक के बावज़ूद यह तबका अपने बसाये शहरों में भी रहा अजनबी की ही तरह। जीवन की मूलभूत आवश्यकतायें अब भी उसके लिये एक सपना ही रहीं। शहरों की नई-नई बस्तियों में इनके लिये जगह नहीं थी। मज़दूरी के बेहद निचले स्तर और अक्सर आय की अनिश्चितता के कारण यह तबका, और ख़ास तौर पर इस आबादी का वह हिस्सा जो दैनिक वेतनभोगी में तब्दील हुआ या जिसने रिक्शा खींचने, सब्ज़ी बेचने, ठेले-खोमचे लगाने जैसे काम अपनाये, शहर में भी उतना ही बेगाना रहा जितना वह गांव में था, बल्कि शहरों की विशिष्ट संरचना के कारण अक्सर उससे भी ज़्यादा। इसे रहने की जगह मिली शहरों के बाहरी और निचले भागों में बसी झोपड़पट्टियों में और बिज़ली, साफ़ पानी, सैनिटेशन जैसी सुविधायें कभी इन तक पहुंची ही नहीं। शहर के संभ्रांत वर्ग के लिये यह ख़ूबसूरती पर लगे धब्बे की तरह अवांछनीय रहा तो राजनैतिक दलों के लिये एक वोटबैंक के रूप में अपनी अनुपयोगिता के कारण महत्वहीन। वैसे यह नियति तो मंत्र की तरह जाप किये गये ‘ भारत गावों में बसता है’ के बावज़ूद गावों की भी रही ही। &lt;strong&gt;यहां यह भी स्पष्ट कर देना आवश्यक होगा कि शहरी और ग्रामीण ग़रीबी आपस में विरोधाभासी या प्रतियोगी नहीं अपितु पूरी तरह से एक दूसरे के पूरक हैं। कृषि अर्थव्यवस्था के निरंतर बदहाल होते जाने के कारण हीं लोग गांव से शहरों की ओर रोज़गार की तलाश में आने पर मज़बूर होते हैं और शहरी ग़रीबों की संख्या बढ़ती चली जाती है।&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;पिछले दिनों संयुक्त राष्ट्र संघ विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) के सहयोग से भारत सरकार के भवन निर्माण तथा शहरी विकास मंत्रालय द्वारा ज़ारी पहली ‘शहरी ग़रीबी रिपोर्ट’ में प्रस्तुत आंकड़े तथा तथ्य स्थिति की भयावहता ही बयान नहीं करते अपितु इस संदर्भ में फैले तमाम दुष्प्रचारों की कलई भी उतारते हैं।&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि &lt;strong&gt;भारत में जिस जनसंख्या वृद्धि को सबसे बड़ी समस्या के रूप में निरूपित किया जाता है शहरों में वह दूसरे एशियाई देशों से कम है।&lt;/strong&gt; इसके अनुसार पिछले दिनों भारत की संवृद्धि दर एशिया की कुछ सबसे तेज़ विकसित हो रही अर्थव्यवस्थाओं के समकक्ष 8 फ़ीसदी रही लेकिन यहां शहरीकरण की वृद्धि दर 28 फ़ीसदी रही जो एशिया की औसत शहरीकरण वृद्धि दर से कम रही। लेकिन इसके बावज़ूद यहां गरीबों का अनुपात 25 फीसदी है। रिपोर्ट का यह भी मानना है कि पिछले दो दशकों में ग्रामीण और शहरी ग़रीबी के बीच का अंतर कम हुआ है। साथ ही संवृद्धि दर के तेज़ होने का असर शहरी ग़रीबी के कम होने के रूप में नहीं हुआ है। जिसके चलते शहरों में झुग्गी-झोपड़ी में रहने वालों की संख्या बढ़ी है। 2001 की जनगणना के अनुसार भारत के शहरों में झुग्गी-झोपड़ी में रहने वालों की संख्या 42 करोड़ छह लाख है जो कि लगभग स्पेन की कुल जनसंख्या के बराबर है। यही नहीं झुग्गी-झोपड़ी में रहने वालों की संख्या में वृद्धि के बावज़ूद झुग्गी-झोपड़ियों की संख्या में वृद्धि न होने के कारण इनका स्तर और भी बद्तर हुआ है। इन जगहों पर सुविधाओं का भयावह अभाव है। ऐसी लगभग 55 फीसदी बस्तियों में शौचालयों की कोई व्यवस्था नहीं है और ये पानी, बिज़ली, जैसी चीज़ों से भी महरूम हैं। इसके अलावा इसी जनगणना के अनुसार अब भी शहरों में सात लाख अठहत्तर लोगों के पास अपनी कहने को कोई छत नहीं है और ये फुटपाथों , रेल की पटरियों के किनारे, खुले मैदानों तथा सड़कों के इर्द-गिर्द रात बिताने को मज़बूर हैं। इनके लिये रैन बसेरों का इंतज़ाम कितना नाकाफ़ी है यह देखने के लिये दिल्ली का उदाहरण काफ़ी होगा &lt;strong&gt;जहां लगभग एक लाख निराश्रितों के लिये बस 2937 लोगों की क्षमता वाले 14 रैन बसेरे हैं यानि सिर्फ़ तीन फीसदी लोगों के लिये शेष या तो खुले आसमान के नीचे सोते हैं या फिर निजी ठेकेदारों के रहमोकरम &lt;/strong&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;strong&gt;पर&lt;/strong&gt;।&lt;/span&gt; रिपोर्ट में एक अध्ययन का भी ज़िक्र है जिसके अनुसार महानगरों के निराश्रित मर्द, औरत और बच्चे अक्सर पुलिस के दुर्व्यवहार के शिकार होते हैं। रईसजादों द्वारा इनको कुचले जाने के किस्से तो आये दिन अख़बारों में आते ही रहते हैं।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;दरअसल, जैसा कि पूर्व में उद्धृत रिपोर्ट से स्पष्ट है, नई आर्थिक नीतियों के लागू होने के बाद से यह समस्या और गंभीर हुई है। श्रम क़ानूनों में ढील, सरकारी संस्थानों का निजीकरण और कल्याणकारी सरकारी ख़र्चों की कमी ने इस बदहाली को नये आयाम दे दिये हैं। रिसाव के जिस सिद्धांत के तहत माना गया था कि उच्च संवृद्धि दर से अपनेआप व्यापक ग़रीब आबादी का जीवन स्तर सुधरेगा, वह पिछले बीस सालों में कहीं लागू होता नहीं दिखता। इस प्रक्रिया में अगर कुछ बढ़ा है तो वह है आर्थिक वैषम्य। ऐसे में इस रिपोर्ट में मूलभूत सुविधाओं के आवंटन में बराबरी, छोटे तथा मध्य आकार के कस्बों को विशेष सहायता, विकेंद्रीकरण हेतु संविधान में सुधार, गरीब लोगों तथा झुग्गी-झोपड़ियों के लिये सब्सीडियों का विस्तार, सैनिटेशन तथा पेयजल उपलब्ध कराने के प्रयास जैसे जो उपाय सुझाये गये हैं उनके लागू हो पाने की उम्मीद शायद ही किसी को हो।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6821438566583405249-5697484600234699708?l=economyinmyview.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://economyinmyview.blogspot.com/feeds/5697484600234699708/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6821438566583405249&amp;postID=5697484600234699708' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6821438566583405249/posts/default/5697484600234699708'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6821438566583405249/posts/default/5697484600234699708'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://economyinmyview.blogspot.com/2010/03/blog-post.html' title='भूमण्डलीय ग्राम से बहिष्कृत शहरी ग़रीब'/><author><name>अशोक कुमार पाण्डेय</name><uri>https://profiles.google.com/116885901033264770599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh4.googleusercontent.com/-K5s3pyuRhYA/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAADcE/5R8Sp3ae2pk/s512-c/photo.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_qroXGFM0DSM/S5N1lQUTMTI/AAAAAAAACw0/K5VLvS0sV9o/s72-c/small229.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6821438566583405249.post-6941347925369227427</id><published>2010-02-20T10:27:00.000-08:00</published><updated>2010-02-20T11:15:11.663-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='दोस्त कलम'/><title type='text'>किसका विकास- कैसा विकास?</title><content type='html'>&lt;p align="center"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_qroXGFM0DSM/S4AwtWyr6UI/AAAAAAAACuk/YdjOKqoxY28/s1600-h/girish+jii.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5440401905633978690" style="WIDTH: 124px; CURSOR: hand; HEIGHT: 261px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_qroXGFM0DSM/S4AwtWyr6UI/AAAAAAAACuk/YdjOKqoxY28/s400/girish+jii.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span class=""&gt;(जाने-माने अर्थशास्त्री गिरीश&lt;/span&gt; मिश्र जी का यह आलेख अभी&lt;/span&gt;&lt;a href="http://hashiya.blogspot.com/2010/02/blog-post_20.html"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt; हाशिया &lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;पर पढ़ा … मुझे बेहद उपयोगी लगा तो यहां भी लगा &lt;span class=""&gt;दिया )&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;पिछले कई हफ्तो से &lt;strong&gt;यह धुआंधार प्रचार चल रहा है कि भारतीय अर्थव्यवस्था विश्वव्यापी अति मंदी के भंवर से लगभग बाहर आ गई&lt;/strong&gt; है। उसकी संवृध्दि रफ्तार पकड़ने लगी है और वह दिन दूर नहीं जब वह दो अंकों में हो जाएगी तथा भारत विश्व की एक महाशक्ति बन जाएगा। साथ ही यह रेखांकित करने की कोशिश हो रही है कि भारत महाशक्ति बनने का लक्ष्य वर्षों पहले प्राप्त कर लेता यदि नेहरूवादी चिंतन और दृष्टिकोण आडे़ नहीं आए होते। नेहरू-इंदिरा युग में भारतीय अर्थव्यवस्था 3।5 प्रतिवर्ष की ''हिन्दू'' संवृध्दि दर के भंवर से बाहर नहीं आ सकी थी। दावा किया जाता है कि 1991 में नरसिंह राव के सत्तारूढ़ होते ही नेहरूवादी चक्रव्यूह टूटा और अर्थव्यवस्था उससे निकलकर आर्थिक सुधारों की सडक़ पर सरपट दौडने लगी। आर्थिक संवृध्दि दर दोगुनी से भी अधिक हो गई। &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;यह उक्ति सर्वविदित है कि आमतौर से &lt;strong&gt;जो दिखता है वह कोई जरूरी नही है कि वास्तविकता के करीब है। &lt;/strong&gt;अमित भादुडी़ ने अपनी प्रकाशित पुस्तक (द फेंस यू वेअर अफ्रेड टू सी, पेंगुइन, 2009) में तथ्यों के आधार पर बतलाया है कि भारतीय अर्थ व्यवस्था प्रत्यक्षत: भले ही सेहतमंद लगे वस्तुत: वह एक गंभीर बीमारी से ग्रस्त है जो कैंसर की तरह देश की अर्थव्यवस्था और राज्य व्यवस्था पर हावी होने लगी है। वस्तुत: हम इतिहास के उन छलावे भरे गलियारों में से एक से होकर गुजर रहे हैं, जहां हम भ्रांति के शिकार है कि किसी भी कीमत पर हम संवृध्दि की उच्च दर प्राप्त कर लें तो हम देश और उसकी जनता को विकास से मार्ग पर ले जाएंगे। यह धारणा घर कर गई है कि संवृध्दि और विकास एक दूसरे से पर्याय है। यह दावा किया जा रहा है कि यदि येन- केन- प्रकोरण कुछ लंबे समय तक आर्थिक संवृध्दि की रफ्तार बनाई रखी गई तो आर्थिक विकास स्वत: प्राप्त हो जाएगा यानी वांछित आर्थिक सामाजिक सांस्कृतिक और राजनीतिक बदलाव आ जाएगा। दूसरे शब्दों में विकास संवृध्दि का उप उत्पाद (बाई प्रोडक्ट) है। कहना न होगा कि उपरोक्त धारण तर्क एवं आर्थिक इतिहास से मिलने वाले तथ्यों एवं अनुभवों के विपरीत है। फिर भी देशी- विदेशी निहित स्वार्थ इसका ढिंढोरा पीट रहे हैं। प्रो। भादुडी़ के अनुसार इस प्रकार की भ्रामक धारणाओं के पीछे बडे़ क़ारोबारी हैं, जो पैसों के बल पर तथाकथित विशेषज्ञों को उन्हें सृजित करने लिए प्रेरित करते और मीडिया के जरिए मोहक शब्दों और तर्कों से सुसज्जित कर फैलाते है। इस क्रम में बडे़ क़ारोबारियों एवं राजनेताओं के बीच परस्पर गंठबंधन हो जाता है। यह अनायास नहीं है कि 2004 और 2009 के लोकसभा चुनावों के बीच करोड़पति उम्मीदवारों की संख्या 128 में बढ़कर 300 हो गई। उपर्युक्त भ्रामक धारण को प्रचारित करने में शिक्षित मध्यम वर्ग की भारी भूमिका होती है। आए दिन पत्र पत्रिकाओं एवं इलेक्ट्रोनिक मीडिया में वे उनके समर्थन में दलीले देते दिखते हैं। &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;नेहरू के जमाने में सर्वोपरि महत्व देश की एकता और अखंडता को दिया जाता था। आर्थिक संवृध्दि के परिणामस्वरूप लोगों की वास्तविक आय में बढो़तरी के साथ-साथ दलितों, पिछडे़ वर्गों, आदिवासियों तथा अन्य शोषित- पीडि़त व्यक्तियों पर विशेष ध्यान दिया जाए जिससे उन्हें रोजगार के पर्याप्त अवसर मिलें और शिक्षा एवं स्वास्थ्य संबंधी सुविधाएं प्राप्त हों। इसलिए आरक्षण पर जोर दिया गया। साथ ही पिछडे़ क्षेत्रों के आर्थिक विकास को तरजीह देने पर बल दिया गया। नेहरू का ख्याल था कि यदि समाज में व्याप्त असमानता को मिटाने तथा क्षेत्रीय असंतुलन को खत्म करने की ओर आर्थिक नीतियों की उन्मुख रखा जाय तो देश में एकता मजबूत तथा अलगाव वादी भावनाएं दूर होंगी। सभी नागरिक एवं क्षेत्रों का परस्पर जुडा़व बढेग़ा। स्पष्ट है कि राज्य की मजबूत सक्रिय भूमिका के बिना यह असंभव था। इसीलिए राजकीय क्षेत्र अर्थव्यवस्था में पनपा जो अधिकतम मुनाफे के लक्ष्य से ऊपर उठ कर काम करने लगा। बरौनी में तेल शोधक कारखाना और भिलाई में इस्पात कारखाना पिछडे़ इलाकों के विकास को सर्वोपरि रखकर लगाए गए।नरसिंह राव सरकार के जमाने से जो आर्थिक सुधार कार्यक्रम चालू किए गए हैं, उनके तहत राज्य की आर्थिक भूमिका सिकुड़ती जा रही है। नेहरू-इंदिरा काल में 3।5 प्रतिशत प्रतिवर्ष की तथा कथित हिन्दु दर के बावजूद रोजगार के अवसर दो प्रतिशत वार्षिक दर से बढ़े मगर &lt;strong&gt;1990 के दशक के बाद आर्थिक संवृध्दि यानी (सकल राष्ट्रीय आय) की बढोतरी भले ही 7 प्रतिशत या उस से भी कम प्रति वर्ष बढे़ हैं। रोजगार के अवसर मिलने से आदमी का अपने पैरों पर खडा़ होने के साथ उसका राष्ट्र एवं समाज से जुडा़व बढ़ता है। वह यह महसूस करता है कि वह अपनी क्षमता और कौशल का इस्तेमाल राष्ट्र के हित में तथा उसके निर्माण के लिए कर रहा है। जब उसे रोजगार नहीं प्राप्त होता तब हीन भाव उस पर हावी होने लगता है। &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नेहरू- इंदिरा काल में नियमित रोजगार के अवसर पैदा करने पर जोर था। परिणामस्वरूप संगठित क्षेत्र का विस्तार हो रहा था। मगर अब नजरिया बदल गया है। संगठित क्षेत्र में रोजगार के अवसर बढा़ने के बदले कम करने पर जोर है। कहना न होगा कि असंगठित क्षेत्र से ठेके पर या दैनिक मजदूरी देकर काम कराने में पूंजीपति फायदे में रहते हैं। मजदूरी की दर और काम के घंटों और स्थितियों के मामले में उनकी चलती है। श्रम कानून और श्रम विभाग आडे़ नहीं आते। किसी भी प्रकार के सवैतनिक अवकाश का प्रश्न ही नहीं उठता। यूनिफॉर्म तथा आवास की व्यवस्था नहीं करनी पडती। नेहरू के जमाने में घरेलू बाजार को ध्यान में रखकर ''क्या, कैसे और किनके लिए'' जैसे उत्पादन से जुडे प्रश्नों के उत्तर तलाशे जाते थे। आज स्थिति बदल गई है। अब उन्हीं वस्तुओं के उन्हीं प्रौद्योगिकियों से उन्हीं लोगों के लिए उत्पादन पर जोर है जिससे हमारा माल विदेशी बाजार में बिके। देश की अपनी जनता गौण हो गई है। हमारे अपने देशी बाजार के लिए जो वस्तुएं और सेवाएं उत्पन्न की जाती हैं उनको क्रयशक्ति सम्पन्न लोगों की ओर उन्मुख किया जाता है। यह अकारण नहीं है कि आम जन के लिए उपर्युक्त कपड़ों, जूतों आदि पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता। चूंकि हमारा उत्पादन मुख्यतया विदेशी बाजार तथा देशी सम्भ्रांत लोगों पर विशेष ध्यान रखता है इसलिए श्रम उत्पादकता बढा़ने और मजदूरी संबंधी लागत कम करने पर जोर दिया जाता है। दलीलें दी जाती हैं कि भूमंडलीकरण के वर्त्तमान युग में विदेशी प्रतिद्वंद्विता में इसके बिना ठहर पाना असंभव है। यही कारण है कि श्रमिकों को जब मन आए तब हटाने तथा उन्हें अनुशासित करने के नाम पर श्रम कानूनों में मालिकों के मनोनुकूल परिवर्तन करने की मांग तथा कथित विश्व प्रतिष्ठित अर्थशास्त्रियों एवं विशेषज्ञों द्वारा लगातार उठाई जा रही है। याद होगा कि सेज की स्थापना करते समय श्रम कानूनों और श्रम संगठनों को उसकी सीमा रेखा से बाहर रखने की बात की गई थी क्योंकि तभी उनमें निवेश होगा और उनके मालों की उत्पादन लगात कम होगी तथा वे विश्व बाजार में टिक पाएंगे।चूंकि हमारे यहां संवृध्दि का सम्मोहन लगातार बढ़ता जा रहा है इसलिए विदेशी निवेश के साथ ही सेवाओं के क्षेत्र और उसके बाद विनिर्माण के क्षेत्र पर जोर है। &lt;strong&gt;कृषि क्षेत्र जहां हमारी दो तिहाई जनसंख्या लगी है, काफी उपेक्षित होती जा रही है। राजकीय कृषि निवेश में अपेक्षित वृध्दि नहीं हो रही है। सकल घरेलू उत्पादन में कृषि क्षेत्र का सापेक्ष हिस्सा निरंतर घटता जा रहा है। परिणाम स्वरूप कृषि क्षेत्र में लगे लोगों की प्रति व्यक्ति वास्तविक औसत आय नही बढ़ रही है। गांवों से शहरों की और लागतार पयालन हो रहा है। परिणामस्वरूप शहरों में मलिन बस्तियों का प्रसार होता जा रहा है।&lt;/strong&gt; समाज में आय और संपदा की दृष्टि से विषमता बढ़ रही है। एक ओर जहां फोर्ब्स पत्रिकाद्वारा प्रकाशित विश्व के बडे़ धनवानों की सूची में भारतीय की संख्या तेजी से बढ़ती जा रही है, वहीं बीस रूपये या उससे कम की दैनिक आय पर गुजारा करने वालों की तदाद में भी तेजी से बढ़ोतरी हो रही है। हर जगह धनी-गरीब के बीच अंतर में वृध्दि हो रही है। आर्थिक विषमता में वृध्दि और धनाढ्यों द्वारा अपने वैभव के प्रदर्शन के कारण अपराध विभिन्न रूपों में प्रकट हो रहा है। अपहरण की संख्या में खासी वृध्दि हुई है। आए दिन शराब पीकर यातायात के नियमों की धज्जी उडा़ पटरियों पर चलने या सोने वालों की जान जाना आम बात है। पांच लाख रूपए की गाडी़ वाले पांच कौडी़ के आदमी की भला क्यों परवाह करें? ऐसा नहीं है कि धनाढ्य सुखी हैं। उनके मुहल्लों में बाडे़ लग रहे हैं। चौकीदार खडे़ कर वे हर समय अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित है। साफ है कि आर्थिक संवृध्दि से सबसे अधिक लाभान्वित होने वाले भी चिन्ता रहित सुखी जीवन व्यतीत नहीं कर पा रहे। फिर मधुमेह और ह्दय रोग में तेजी से बढोतरी आरामतलबी का परिणाम है। &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;समाज में आर्थिक विषम की बढोतरी का परिणाम माओवादी आंदोलन के विस्तार में तथा क्षेत्रीय असंतुलन में इजाफा का प्रकटीकरण तेलंगाना, विदर्भ गोरखालैंड आदि से जुडे़ अलगावादी आंदोलन में हो रहा है। पिछडे़ राज्यों से जीविका की खोज में आने वालों के प्रति महाराष्ट्र, असम, पंजाब आदि में जो भावनाएं देखी जा रही हैं, वे देश की अखंडता के लिए ठीक नहीं है।नई आर्थिक नीतियां नवउदारवादी चिंतन पर आधारित हैं जिनका वर्तमान गढ़ शिकागो है। अगले पखवाडे़ हम देखेंगे कि उनकी रूपरेखा क्या है और वह नेहरूवादी दृष्टिकोण को क्यों अपदस्थ कर रहा है।&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;समाप्त&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt; &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;**शीर्षक मैने परिवर्तित किया है&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6821438566583405249-6941347925369227427?l=economyinmyview.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://economyinmyview.blogspot.com/feeds/6941347925369227427/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6821438566583405249&amp;postID=6941347925369227427' title='5 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6821438566583405249/posts/default/6941347925369227427'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6821438566583405249/posts/default/6941347925369227427'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://economyinmyview.blogspot.com/2010/02/blog-post_20.html' title='किसका विकास- कैसा विकास?'/><author><name>अशोक कुमार पाण्डेय</name><uri>https://profiles.google.com/116885901033264770599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh4.googleusercontent.com/-K5s3pyuRhYA/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAADcE/5R8Sp3ae2pk/s512-c/photo.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_qroXGFM0DSM/S4AwtWyr6UI/AAAAAAAACuk/YdjOKqoxY28/s72-c/girish+jii.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6821438566583405249.post-8849506532859002309</id><published>2010-02-04T02:12:00.000-08:00</published><updated>2010-02-04T02:27:10.180-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='किताबें'/><title type='text'>क्या आप पुस्तक मेले जा रहे हैं?</title><content type='html'>&lt;p align="center"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_qroXGFM0DSM/S2qffa7VToI/AAAAAAAACtI/CdaFcCZeXVU/s1600-h/book+fair+048.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5434331262528867970" style="WIDTH: 400px; CURSOR: hand; HEIGHT: 225px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_qroXGFM0DSM/S2qffa7VToI/AAAAAAAACtI/CdaFcCZeXVU/s400/book+fair+048.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;&lt;em&gt;साथियों &lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;strong&gt;आर्थिक विषयों पर लिखे मेरे लेखों की &lt;span class=""&gt;किताब &lt;span style="color:#660000;"&gt;'&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#660000;"&gt;शोषण के अभयारण्य'&lt;/span&gt;  शिल्पायन प्रकाशन से &lt;span class=""&gt;छप &lt;/span&gt;कर आ गयी है।&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;strong&gt;विस्तार के लिए &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;a href="http://likhoyahanvahan.blogspot.com/2010/02/blog-post.html"&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;यहाँ क्लिक&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt; करके पढ़ें।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;दूसरी किताब &lt;span style="color:#000099;"&gt;मार्क्स : जीवन और विचार &lt;/span&gt;संवाद प्रकाशन से प्रकाशित हुई है उसकी जानकारी के लिए&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;a href="http://ek-ziddi-dhun.blogspot.com/2010/01/blog-post_31.html"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;&lt;em&gt;यहाँ क्लिक&lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt; करें।&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;और &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;प्रेम &lt;/span&gt;पर केन्द्रित उद्धरणों की सद्यप्रकाशित पुस्तक के लिए&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;a href="http://naidakhal.blogspot.com/2009/12/blog-post_16.html"&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;यहाँ क्लिक&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt; करें !&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6821438566583405249-8849506532859002309?l=economyinmyview.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://economyinmyview.blogspot.com/feeds/8849506532859002309/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6821438566583405249&amp;postID=8849506532859002309' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6821438566583405249/posts/default/8849506532859002309'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6821438566583405249/posts/default/8849506532859002309'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://economyinmyview.blogspot.com/2010/02/blog-post.html' title='क्या आप पुस्तक मेले जा रहे हैं?'/><author><name>अशोक कुमार पाण्डेय</name><uri>https://profiles.google.com/116885901033264770599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh4.googleusercontent.com/-K5s3pyuRhYA/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAADcE/5R8Sp3ae2pk/s512-c/photo.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_qroXGFM0DSM/S2qffa7VToI/AAAAAAAACtI/CdaFcCZeXVU/s72-c/book+fair+048.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6821438566583405249.post-5043173339187463657</id><published>2010-01-10T19:37:00.000-08:00</published><updated>2011-10-20T22:04:47.686-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='गरीबी'/><title type='text'>यह रेखा ग़रीबों की गर्दन से गुज़रती है...</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_qroXGFM0DSM/S0qhngoXMbI/AAAAAAAACp4/WOBvTHqMyeI/s1600-h/small009.jpg"&gt;&lt;img alt="" border="0" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5425326401267380658" src="http://2.bp.blogspot.com/_qroXGFM0DSM/S0qhngoXMbI/AAAAAAAACp4/WOBvTHqMyeI/s320/small009.jpg" style="cursor: hand; display: block; height: 120px; margin: 0px auto 10px; text-align: center; width: 80px;" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="font-size: 180%;"&gt;आजकल दिल्ली में है जे़रे बहस ये मुद्दुआ&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;&lt;strong&gt;उन्नीसवीं सदी के प्रसिद्ध समाजशास्त्री हरबर्ट स्पेंसर&lt;/strong&gt; ने शायद सबसे पहली बार आधिकारिक तौर पर सामाजिक परिक्षेत्र में योग्यतम की उत्तरजीविता के मुहावरे का प्रयोग किया था। उनका मानना था कि &lt;strong&gt;‘‘गरीब लोग आलसी होते हैं,काम नहीं करना चाहते और जो काम नहीं करना चाहते उन्हें खाने का भी कोई अधिकार नहीं है।&lt;/strong&gt;‘‘ इसी आधार पर उनका तर्क था कि &lt;strong&gt;‘‘गरीबी उन्मूलन जैसी योजनाओं के जरिये सरकार का हस्तक्षेप न्यूनतम होना चाहिये।‘‘&lt;/strong&gt; दरअसल, स्पेन्सर पूंजीवादी दुनिया के वैचारिक प्रतिनिधि के रूप में सामने आते हैं। बीसवीं सदी के आरंभिक वर्षों में रूस सहित कई देशों में समाजवादी शासन व्यवस्थाओं की स्थापना और पूरी दुनिया में समाजवाद की एक विचार के रूप में प्रतिष्ठा तथा तद्जन्य सामाजिक- राजनैतिक आलोड़नों के बरअक्स पूंजीवाद के लिये मानवीय चेहरा अपनाना आवश्यक हो गया था। फिर भी तीस के दशक की महामंदी के दौर में क्लासिकल अर्थव्यवस्था के ‘लैसेज फेयर‘े ( सरकार के हस्तक्षेप से पूर्णतः मुक्त बाजार आधारित अर्थव्यवस्था) सिद्धांत को तिलांजलि देकर कीन्स की राज्य हस्तक्षेप पर आधारित नीतियों का लागू किया जाना पूरी दुनिया की पूँजीवादी व्यवस्थाओं की मजबूरियों को प्रदर्शित करता था न कि उनकी प्रतिबद्धताओं और पक्षधरताओं में किसी परिवर्तन को। मंदी से उबरने के साथ ही जब कालांतर में पूंजीवाद ने खुद को फिर मजबूत किया तो इस सैद्धांतिक अवस्थिति में भी परिवर्तन हुआ और पाल ए सैमुएल्सन जैसे सिद्धांतकारों ने कीन्सीय तथा क्लासिकीय सिद्धांतो के घालमेल से नवक्लासिकीय सिंथेसिस की जिस अवधारणा को जन्म दिया था उसकी तार्किक परिणिति नव उदारवादी सिद्धांतों की पुनसर््थापना के रूप में होनी तय थी। भारत सहित दुनिया के अधिकांश हिस्से में मिश्रित अर्थव्यवस्था की नीति के तहत कल्याणकारी राज्य की जो अवधारणा प्रस्तुत की गई थी वह नब्बे के दशक में सोवियत संघ के विघटन के बाद लागू संरचनात्मक संयोजन वाली नई आर्थिक नीतियों से प्रतिस्थापित कर दी गयी। इन नीतियों के तहत गरीबों तथा वंचितों को दी जाने वाली तमाम सुविधायें धीरे-धीरे छीनी जाने लगीं। पश्चिमी देशों में यह प्रक्रिया पहले ही शुरु हो चुकी थी। उदाहरण के लिये मार्ग्रेट थैचर के शासनकाल में 1980 में पेंशन निर्धारण के लिये औसत आय का आधार समाप्त कर दिया गया और 1987-88 में बच्चों पर मिलने वाली सुविधायें। इसके परिणाम भी उसी दौर में आने लगे थे - 1079 से 1997 के बीच ब्रिटेन में अमीरों और गरीबों के बीच की खाई अभूतपूर्व रूप से बढ गयी!&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;भारत में भी इन नीतियों का प्रसार निश्चित तौर पर सरकारों की बदली प्रतिबद्धताओं का स्पष्ट प्रतिबिंबन था। इनके विस्तार में जाना तो इस लेख की विषयवस्तु के मद्देनजर विषयांतर होगा, लेकिन यह तो स्पष्ट है ही अपने आरंभिक दौर में कुछ तो मुक्ति आंदोलन और नई-नई मिली आजादी के हैंगओवर और कुछ देश-दुनिया में जारी आँदोलनों के दबाव में पूँजीवादी नीतियों को भी समाजवाद के मुलम्मे में पेश किये जाने का दौर नब्बे के दशक के आरंभ में ही इतिहास बन गया और साठ के दशक में अमेरिका में विकसित ‘रिसाव के सिद्धांत‘ को आधिकारिक तौर पर स्वीकार कर पूरा जोर निजी पूंजी के विकास पर लगाया गया। आय तथा वितरण की असमानता में विस्तार अब कोई चिंता का विषय नहीं रह गया बल्कि इसे संवृद्धि के लिये आवश्यक मान कर स्वीकार किया गया और गरीबों तथा जरूरतमंदों की सहायता के लिये दी जाने वाली राशि को ‘संसाधनों की बर्बादी‘ के रूप में निरूपित किया गया। ऐसे में यह अनपेक्षित नहीं था कि पिछले दिनों जब भारत में गरीबी रेखा पर बहस के दौरान तमाम अर्थशास्त्रियों ने वास्तविक रूप से गरीबों की संख्या आधिकारिक आकड़ों से कई गुना बताई तो तर्क दिये गये कि &lt;strong&gt;‘‘अगर गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों की संख्या इतनी बढ़ जायेगी तो उनके कल्याण के लिये लागू योजनाओं में धन का अतिरिक्त आवण्टन करना होगा जिसके लिये सरकार के पास पैसा नहीं है (सक्सेना समिति को लिखे गये योजना आयोग के पत्र से)!‘‘&lt;/strong&gt; इसी सरकार के पास पिछले वर्ष पूँजीपतियों को मंदी से निपटने के नाम पर विभिन्न सहायता और छूट के रूप में करोड़ों रुपये देने के लिये पर्याप्त धन था!&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;गरीबी रेखा के रूप में गरीबी को निर्धारित करने का प्रस्ताव सबसे पहले 1957 में इण्डियन लेबर कांफ्रेंस के दौरान दिया गया था। उसी के बाद योजना आयोग ने एक वर्किंग ग्रुप बनाया था जिसने भारत के लिये &lt;strong&gt;‘आवश्यक कैलोरी उपभोग‘ की अवधारणा पर आधारित गरीबी रेखा का प्रस्ताव किया&lt;/strong&gt;। इसके तहत उस समय बीस रुपये प्रतिमाह को विभाजक रेखा के रूप में स्वीकृत किया गया। 1979 में योजना आयोग ने ही गरीबी को पुनर्परिभाषित करने करने के लिये एक टास्क फोर्स का गठन किया गया। लेकिन इसने भी मामूली फेरबदल के साथ मूलतः ‘आवश्यक कैलोरी उपभोग‘ की अवधारणा को ही आधार बनाया। 1973 की कीमतों को आधार बनाते हुए इसने ग्रामीण क्षेत्रों के लिये 49 रुपये प्रतिव्यक्ति प्रतिमाह तथा शहरी क्षेत्रों के लिये 57 रुपये की विभाजक रेखा तय की। मुद्रास्फीति के अनुसार इसमें समय-समय पर समायोजन किया गया और वर्तमान में यह शहरी क्षेत्रों के लिये 559 रुपये और गाँवों के लिये 368 रुपये है। योजना आयोग गरीबी रेखा के निर्धारण के लिये राष्ट्रीय तथा राज्य स्तर पर एन एस एस ओ के उपभोक्ता व्यय सर्वेक्षणों के आधार पर विभाजक रेखा तय करता है। 2004-2005 के लिये प्रोफेसर लकड़वाला की अध्यक्षता में 1997 में बने एक्स्पर्ट ग्रुप द्वारा की गयी अनुशंसा के आधार पर जो आंकड़े निकाले गये थे उनके अनुसार देश में उस समय गरीबों की कुल संख्या 28।3 प्रतिशत थी।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;&lt;strong&gt;‘सेन्टर फार पालिसी आल्टरनेटिव‘ की एक रिपोर्ट में मोहन गुरुस्वामी और रोनाल्ड जोसेफ एब्राहम इस गरीबी रेखा को ‘भूखमरी रेखा‘ कहते हैं।&lt;/strong&gt; कारण साफ है। इसके निर्धारण का इकलौता आधार आवश्यक कैलोरी उपभोग है। यानि इसके अनुसार वह आदमी गरीब नहीं है जो येन केन प्रकारेण दो जून अपना पेट भर ले और अगले दिन काम करने के लिये जिन्दा रहे। युनिसेफ स्वस्थ शरीर के लिये प्रोटीन, वसा, लवण, लौह और विटामिन जैसे तमाम अन्य तत्वों को जरूरी बताता है जिसके अभाव में मनुष्य कुपोषित रह जाता है तथा उसकी बौद्धिक व शारीरिक क्षमतायें प्रभावित होती हैं। लेकिन गरीबी रेखा तो केवल जिन्दा रहने के लिये जरूरी भोजन से आगे नहीं बढ़ती। इसके अलावा शायद व्यवस्था यह मानकर चलती है कि आबादी के इस हिस्से का स्वास्थ्य, शिक्षा, मनोरंजन, घर, साफ पानी, सैनिटेशन जैसी तमाम मूलभूत सुविधाओं पर तो कोई हक है ही नहीं । वैसे तो जिस ‘आवश्यक कैलोरी उपभोग‘ की बात की जाती है ( शहरों में 2100 तथा गांवों में 2400 कैलोरी प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन) वह भी दिन भर शारीरिक श्रम करने वालों के लिहाज से अपर्याप्त है। ‘इण्डियन काउंसिल आफ मेडिकल रिसर्च‘ के अनुसार भारी काम में लगे हुए पुरुषों को 3800 कैलोरी तथा महिलाओं को प्रतिदिन 2925 कैलोरी की आवश्यकता है। &lt;strong&gt;यही नहीं, अनाजों की कीमतों में तुलनात्मक वृद्धि व उपलब्धता में कमी, स्वास्थ्य तथा शिक्षा जैसे क्षेत्रों में सरकार की घटती भागीदारी, विस्थापन तथा तमाम ऐसी ही दूसरी परिघटनाओं की रोशनी में यह रेखा आर्थिक स्थिति के आधार पर समाज को जिन दो हिस्सों में बांटती है उसमें ऊपरी हिस्से के निचले आधारों में एक बहुत बड़ी आबादी भयावह गरीबी और वंचना का जीवन जीने के लिये मजबूर है और तमाम सरकारी योजनायें उसको लाभार्थियों की श्रेणी से उसके आधिकारिक तौर पर गरीब न होने के कारण बाहर कर देती है।&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;इसी वजह से भारत सरकार के गरीबी के आधिकारिक आंकड़े हमेशा से विवाद में रहे हैं। विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय तथा दूसरी स्वतंत्र संस्थाओं के अध्ययनों में देश में वास्तविक गरीबों की संख्या के आंकड़े सरकारी आंकड़ों से कहीं ज्यादा रहे हैं। अभी हाल ही में विश्व बैंक की&lt;strong&gt; ‘ग्लोबल इकोनामिक प्रास्पेक्ट्स फार 2009‘ नाम से जारी रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि 2015 में भारत की एक तिहाई आबादी बेहद गरीबी ( 1.25 डालर यानि लगभग 60 रुपये प्रतिदिन प्रतिव्यक्ति से भी कम आय) में गुजारा कर रही होगी।&lt;/strong&gt; इस रिपोर्ट के अनुसार यह स्थिति सब सहारा देशों को छोड़कर पूरी दुनिया में सबसे बद्तर होगी। यही नहीं, यह रिपोर्ट भारत की तुलनात्मक स्थिति के लगातार बद्तर होते जाने की ओर भी इशारा करती है। इसके अनुसार जहां 1990 में भारत की स्थिति चीन से बेहतर थी वहीं 2005 में जहां चीन में गरीबों का प्रतिशत 15.9 रह गया, भारत में यह 41.6 थी।&lt;br /&gt;इन्हीं विसंगतियों के मद्देनजर पिछले दिनों सरकार ने गरीबी रेखा के पुनर्निर्धारण के लिये जो नयी कवायदें शुरु कीं उन्होंने इस जिन्न को बोतल से बाहर निकाल दिया है। सबसे पहले आई असंगठित क्षेत्र के उद्यमों के लिये गठित राष्ट्रीय आयोग (अर्जुन सेनगुप्ता समिति) की रिपोर्ट ने देश में तहलका ही मचा दिया था। इसके अनुसार देश की 77 फीसदी आबादी 20 रुपये रोज से कम में गुजारा करती है। दो अंको वाली संवृद्धि दर और शाईनिंग इण्डिया के दौर में यह आंकड़ा सच्चाई के घिनौने चेहरे से नकाब खींचकर उतार देने वाला था। समिति ने असंगठित क्षेत्र के लिये दी जाने वाली सुविधायें इस आबादी तक पहुंचाने की सिफारिश की थी। लेकिन बात यहीं पर खत्म नहीं हुई। भारत सरकार द्वारा गरीबी रेखा के निर्धारण के लिये मानक तैयार करने के लिये ग्रामीण विकास मंत्रालय के पूर्व सचिव &lt;strong&gt;श्री एन के सक्सेना की अध्यक्षता में जो समिति बनाई थी उसके आंकड़े और भी चैंकाने वाले थे। इस समिति ने अगस्त-2009 में पेश अपनी रिपोर्ट में गरीबी रेखा से ऊपर रहने वालों के विभाजन के लिये पांच मानक सुझाये। जिसमें शहरी क्षेत्रों में न्यूनतम 1000 रुपये तथा ग्रामीण क्षेत्रों में न्यूनतम 700 रुपयों का उपभोग या पक्के घर या दो पहिया वाहन या मशीनीकृत कृषि उपकरणों जैसे ट्रैक्टर या जिले की औसत प्रतिव्यक्ति भू संपति का स्वामित्व।&lt;/strong&gt; इस आधार पर समिति पर गरीबी रेखा के निर्धारण पर समिति ने पाया कि भारत की ग्रामीण जनसंख्या का कम से कम पचास फीसदी इसके नीचे जीवनयापन कर रहा है। सक्सेना समिति ने खाद्य मंत्रालय के आंकड़ों का भी जिक्र किया है जिसके अनुसार गांवों में 10।5 करोड़ बीपीएल राशन कार्ड हैं। अगर इसी को आधार बनाया जाय तो भी गांवों में गरीबी रेखा से नीचे रह रहे लोगों की संख्या लगभग 53 करोड़ ठहरती है जो कुल आबादी का लगभग पचास फीसदी है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;समिति का यह भी मानना कि जहां आधिकारिक तौर पर 1973-74 से 2004-05 के बीच गरीबी 56 प्रतिशत से घटकर 28 प्रतिशत हो गयी वहीं गरीबों की वास्तविक संख्या में कोई कमी नहीं आयी। अपने निष्कर्ष में वह कहते हैं कि &lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;‘गरीब परिवारों की एक बहुत बड़ी संख्या गरीबी उन्मूलन के कार्यक्रमों से बहिष्कृत रही है और ये निश्चित रूप से सुदूर क्षेत्रों में रहने वाले बेजुबान लोग ही होंगे।‘&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;लेकिन सरकार ने इस समिति की अनुशंसाओं को लागू करने से साफ इंकार कर दिया। योजना आयोग द्वारा समिति को लिखे गये पत्र का जिक्र पहले ही किया जा चुका है। ग्रामीण विकास मंत्री श्री सी पी जोशी ने इस पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा था कि ‘सक्सेना समिति को गरीबों की गणना करने के लिये नहीं सिर्फ गरीबों की पहचान करने के लिये नयी प्रणाली विकसित करने के लिये कहा गया था।‘&lt;br /&gt;इस दौरान योजना आयोग के एक सदस्य अभिजीत सेन ने तर्क दिया था कि गरीबों की गणना आवश्यक कैलोरी उपभोग की जगह आय के आधार की जानी जानी चाहिये। उनका यह भी मानना था कि मौजूदा मानकों के आधार पर गणना से शहरी क्षेत्रों में गरीबों की वास्तविक संख्या 64 फीसदी तथा गांवों में अस्सी फीसदी है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;इस संदर्भ में केन्द्र सरकार द्वारा प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार समिति के तत्कालीन अध्यक्ष सुरेश तेंदुलकर समिति को गरीबों की संख्या की गणना की जिम्मेदारी दी गयी थी। इस आयोग की पिछले महीने प्रस्तुत रिपोर्ट एक तरफ तो आवश्यक कैलोरी उपभोग वाली परिभाषा से आगे बढ़ने की कोशिश करती है तो दूसरी तरफ आंकड़ों में गरीबी कम रखने का दबाव भी इस पर साफ दिखाई देता है।&lt;br /&gt;तेंदुलकर समिति के अनुसार 2004-05 में भारत की कुल आबादी का 37।2 फीसदी हिस्सा गरीबी रेखा के नीचे है। यह आंकड़ा योजना आयोग के 27.5 फीसदी से तो अधिक है लेकिन अभिजित सेन कमेटी या ऐसे अन्य अध्ययनों के निष्कर्षों से कम। हालांकि योजना आयोग से इसकी सीधी तुलना मानकों के परिवर्तन के कारण संभव नहीं है। आयोग के अनुसार बिहार तथा उड़ीसा में ग्रामीण गरीबी का प्रतिशत क्रमशः 55.7 तथा 60.8 है, उल्लेखनीय है कि सेन कमेटी के अनुसार इन दोनों प्रदेशों में ग्रामीण गरीबी का प्रतिशत 80 से अधिक था। &lt;strong&gt;आयोग ने ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी निर्धारण के लिये सीमारेखा 356.30 से बढ़ाकर 444.68 रुपये और शहरी क्षेत्रों में 538.60 रुपये से बढ़ाकर 578.80 की है। इस आधार पर दैनिक उपभोग की राशि शहरों में लगभग 19 रुपये और गांवों में लगभग 15 रुपये ठहरती है जो विश्वबैंक द्वारा तय की गयी अंतर्राष्ट्रीय गरीबी रेखा (20 रुपये) से कम है।&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;समिति ने आवश्यक कैलोरी वाले मानक को पूरी तरह समाप्त कर दिया है। इसकी जगह पर समिति का जोर शिक्षा, स्वास्थ्य तथा अन्य क्षेत्रों में होने वाले खर्चों को भोजन के साथ समायोजित कर ग्रामीण तथा शहरी विभाजन को समाप्त कर क्रय शक्ति समानता पर आधारित एक अखिल भारतीय गरीबी रेखा के निर्धारण पर है। यह अवधारणा के रूप में 1973-74 वाले मानकों से निश्चित रूप से बेहतर हैं जिसमें शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी तमाम जरूरतों को सरकार द्वारा मुफ्त उपलब्ध कराये जाने की मान्यता पर आधारित थे। लेकिन आवश्यक कैलोरी उपभोग वाली अवधारणा को पूरी तरह से खत्म किया जाना, खासतौर से तब, जबकि पिछले दिनों अंतर्राष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान के अंतर्राष्ट्रीय भूख सूचकांक में भारत को 66 वें पायदान पर रखा गया है और खाद्यान्न संकट, खाद्यान्नों की कीमतों में अभूतपूर्व तेजी तथा कुपोषण की समस्या लगातार गहराती गयी है, इसकी नीयत पर सवाल उठाता ही है। इस दौर में पेश की गयी इस अवधारणा का अर्थ होगा कि गरीबी रेखा से वास्तविक गरीबों का बहुलांश बाहर रह जायेगा। यहां पर यह भी बता देना आवश्यक है कि कई हालिया अध्ययन बताते हैं कि &lt;strong&gt;सबसे गरीब दस फीसदी लोगों का कैलोरी उपभोग सबसे अमीर दस फीसदी लोगों के कैलोरी उपभोग से कम है जबकि यह तो सर्वज्ञात तथ्य है कि जहां अमीर आदमी तमाम दूसरी पोषक चीजों का उपभोग करता है वहीं गरीबों का वह तबका अपनी लगभग पूरी आय भोजन पर ही खर्च करता है।&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;दरअसल मानकों के न्यायपूर्ण निर्धारण के लिये जहां एक तरफ आवश्यक कैलोरी उपभोग की अवधारणा को इण्डियन काउंसिल आफ मेडिकल रिसर्च की पूर्व में उद्धृत अनुशंसा के आधार पर और ऊंचे स्तर पर ले जाते हुए इसमें पोषण के लिये आवश्यक अन्य तत्वों के साथ समायोजित किया जाना चाहिये था और इसके साथ एक सम्मानजनक जीवनस्तर के लिये आवश्यक शिक्षा, स्वास्थ्य, मनोरंजन, घर, पीने का साफ पानी, सैनिटेशन जैसी तमाम चीजों से जोड़कर देखा जाना चाहिये था। इस संदर्भ में सेंटर फार आल्टरनेटिव पालिसी रिसर्च द्वारा मूलभूत आवश्यकताओं की कीमत पर आधारित गरीबी की विभाजक रेखा ज्यादा न्यायपूर्ण लगती है जिसमें 2004-2005 के लिये अखिल भारतीय स्तर पर 840 रुपये प्रतिव्यक्ति प्रतिमाह का निर्धारण किया गया है । इसके साथ ही एन के सक्सेना द्वारा सुझाये गये मानक भी सच के ज्यादा करीब हैं। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;साथ ही तेंदुलकर समिति गरीबी निर्धारण के आधारों में विस्तार के दावे के बावजूद गरीबी की बहुआयामी प्रकृति के बारे में कोई पहल नहीं करती। पहले की तमाम रिपोर्टों की तरह यह भी गरीबी को महज आर्थिक समस्या की तरह निरूपित करती है। इसके सामाजिक-सांस्कृतिक आयामों को समझे बिना इसे जड़मूल से समाप्त किया ही नहीं जा सकता। जाति, लिंग, शारीरिक अक्षमता, क्षेत्रीय असंतुलन जैसे तमाम कारक भारत में गरीबी को निर्धारित करते हैं।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;दरअसल वस्तुस्थिति यह है कि गरीबी के इन तकनीकी निर्धारणों के मूल में उस बड़ी हकीकत पर परदा डालना है कि इन सब कवायदों के मूल में भयावह तरीके से विस्तारित होती आर्थिक असमानता की खाई के सवाल को दबाये रखना है। नई आर्थिक नीतियों से लाभान्वित होने वाले छोटे से तबके के प्रति अपनी स्पष्ट प्रतिबद्धता और सामाजार्थिक समानता के उद्देश्य को पूर्ण तिलांजलि दे चुकीं शासन व्यवस्थाओं के लिये गरीबी उन्मूलन की योजनायें एक तरफ तो जनाक्रोशों को दबाये रखने वाले ‘सेफ्टी वाल्व‘ हैं तो दूसरी तरफ हर पांच साल पर होने वाले चुनावों के मद्देनजर एक ‘आवश्यक फिजूलखर्ची‘। ऐसे में यह स्वाभाविक ही है कि गरीबी को एक असमाधेय समस्या के रूप में निरूपित कर नरेगा जैसी कुछेक योजनाओं द्वारा थोड़ा-बहुत लाभ एक सीमित आबादी तक पहुंचाया जाता है लेकिन भूमि सुधार, आय तथा व्यय पर करों द्वारा नियंत्रण तथा पुनर्वितरण जैसे बड़े और समस्या के जड़ पर प्रहार करने वाले उपाय सरकारों की कार्यसूची में शामिल ही नहीं होते। इस नई कवायद के पीछे भी येन केन प्रकारेण आधिकारिक रूप से गरीबों की संख्या को न्यूनतम स्तर पर रखना है जिससे कि प्रस्तावित राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून में सब्सीडियों पर नियंत्रण रखा जा सके। खाद्य एवं लोक वितरण मंत्रालय द्वारा राज्य सरकारों को प्रेषित इस कानून के अवधारणा पत्र में साफ किया गया है कि गरीबी रेखा के नीचे रहने वालों की संख्या के निर्धारण का अधिकार अनन्य रूप से केन्द्र सरकारों के पास ही रहेगा। राज्य सरकारों को टारगेटेड बीपीएल के अंतर्गत लाभान्वित होने वाले परिवारों की संख्या पर नियंत्रण रखने की ताकीद की गयी है। यह कानून इस सूची की सालाना समीक्षा को आवश्यक बना देगा। अपनी ड्राफ्ट गाइडलाइन में यह पहले ही चेता चुका था कि ‘अगर राज्य सरकारों पर बीपीएल सूची बनाने का काम छोड़ दिया गया तो भारत में गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों की संख्या कुल ग्रामीण आबादी की 80-85 फीसदी तक हो जाने की आशंका है।‘ &lt;strong&gt;साफ है कि ऐसी नीयत के साथ बनने वाले खाद्य सुरक्षा कानून का हश्र भी कुछ दिनों पहले बने शिक्षा के अधिकार कानून जैसा ही होना है।&lt;/strong&gt; &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;गरीबी रेखा के रूप में आय या आवश्यक कैलोरी उपभोग के किसी एक खास आंकड़े को विभाजक बना देना रोज बदलती कीमतों और रोजगार की अनिश्चितता की रोशनी में दरअसल एक भद्दा मजाक है। &lt;strong&gt;जब दाल 90 रुपये, चावल 20 रुपये, आटा 17 रुपये किलो बिक रहा है, डाक्टरों की फीस आसमान छू रही है, दवायें इतनी मंहगी हैं और बसों तथा रेलों से कार्यस्थल तक पहुंचने में ही 10-15 रुपये खर्च हो जाते हैं तो दिल्ली में बैठकर यह तय करना कि 15 या 20 रुपये रोज में एक आदमी अपना खर्च चला सकता है और उससे अधिक पाने वालों को सहायता देने की कोई जरूरत नहीं है उस सरकार की प्रतिबद्धता को स्पष्ट कर देता है जो पिछले साल पिछले बजट में पूंजीपतियों को सहायता और करों में छूट के रूप में 4,18,095 करोड़ रुपयों की सौगात दे चुकी है। &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6821438566583405249-5043173339187463657?l=economyinmyview.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://economyinmyview.blogspot.com/feeds/5043173339187463657/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6821438566583405249&amp;postID=5043173339187463657' title='6 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6821438566583405249/posts/default/5043173339187463657'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6821438566583405249/posts/default/5043173339187463657'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://economyinmyview.blogspot.com/2010/01/1980-1987-88-1079-1997-1957-1979-1973.html' title='यह रेखा ग़रीबों की गर्दन से गुज़रती है...'/><author><name>अशोक कुमार पाण्डेय</name><uri>https://profiles.google.com/116885901033264770599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh4.googleusercontent.com/-K5s3pyuRhYA/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAADcE/5R8Sp3ae2pk/s512-c/photo.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_qroXGFM0DSM/S0qhngoXMbI/AAAAAAAACp4/WOBvTHqMyeI/s72-c/small009.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6821438566583405249.post-1467361654786626190</id><published>2009-12-19T22:50:00.000-08:00</published><updated>2010-01-10T21:00:12.930-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अर्थशास्त्री'/><title type='text'>आधुनिक अर्थशास्त्र का पिता</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_qroXGFM0DSM/Sy3J2U_go2I/AAAAAAAACng/ZxCMcYIilvM/s1600-h/0.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5417207861981782882" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 57px; CURSOR: hand; HEIGHT: 80px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_qroXGFM0DSM/Sy3J2U_go2I/AAAAAAAACng/ZxCMcYIilvM/s320/0.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;strong&gt;पाल एन्थनी सेमुएल्सन&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;strong&gt;(15 मई 191 से 13 दिसंबर 2009)&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;/strong&gt;पाल ए सेमुएल्सन से मेरा परिचय अर्थशास्त्र के आम विद्यार्थियों की तरह स्नातक के पहले साल में आर्थिक सिद्धांत पर लिखी उनकी अतिप्रसिद्ध किताब ‘&lt;strong&gt;इकोनोमिक्स-ऐन इन्ट्रोडक्ट्री&lt;/strong&gt; &lt;strong&gt;एनालिसिस‘&lt;/strong&gt; के माध्यम से हुआ था। 1948 के दौरान लिखी गयी यह किताब कीन्स की जेनेरल थियरी की ही तरह दुनिया भर के अर्थशास्त्र के विद्यार्थियों के लिये बेहद ज़रूरी किताब मानी जाती है। दरअसल दुनिया की चालीस भाषाओं में अनुदित उनकी यह किताब आधुनिक अर्थशास्त्र और विशेषकर कीन्सीय अर्थशास्त्र को समझने के लिये अद्वितीय किताब है जिसके बारे में एम आई टी में उनके सहयोगी जेम्स पोटेर्बा ने कहा था, ‘&lt;strong&gt;&lt;em&gt;यह किताब एक शोधकर्ता और एक अध्यापक के रूप में और एक ऐसे व्यक्ति के रूप में जिसने समकालीन अर्थशास्त्र के हर पहलू कि जिम्मेदारी ली, सैमुएल्सन की विरासत &lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;है।‘ समकालीन अकादमिक जगत में किसी कोर्स की किताब का यूं किंवदंती बन जाना एक आश्चर्य ही है।&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;सेमुएल्सन नवकीन्सवाद के प्रणेताओं में से एक थे और नवक्लासिकीय अर्थशास्त्र के विकास में उनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। उन्होने नवक्लासिकीय तथा नवकीन्सीय सिद्धांतों को आपस में जोडकर जिस सैद्धांतिक व्यव्स्था को जन्म दिया था उसे &lt;strong&gt;नवक्लासिकीय सिंथेसिस&lt;/strong&gt; कहा जाता है। कहना न होगा की पूंजीवादी अर्थशास्त्र का वर्तमान परिदृश्य इसी सैद्धांतिक अवस्थिति से संचालित है। इसीलिये आर्थिक इतिहासकार रेन्डल ने उन्हें &lt;strong&gt;‘आधुनिक अर्थशास्त्र का पिता&lt;/strong&gt;‘ कहा था। उनकी मृत्यु के बाद प्रकाशित एक आलेख में अमर्त्य सेन ने उन्हें &lt;strong&gt;‘आधुनिक अर्थशास्त्र का सृजनकर्ता और पद्धति निर्माता&lt;/strong&gt;‘ कहा है।&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;वह पहले अर्थशास्त्री ने जिन्होंने आर्थिक विवेचनाओं में &lt;strong&gt;गणितीय तथा भौतिकी सूत्रों&lt;/strong&gt; का व्यापक प्रयोग किया।इस पद्धति का प्रमुख इस्तेमाल उन्होंने अर्थव्यवस्था के गतिमान तथा स्थैतिक संतुलनों के समेकन से वास्तविक संतुलन की स्थितियों के लिये गणितीय माडल प्रस्तुत करने में किया। इस प्रणाली ने सामान्य संतुलन सिद्धांत के विकास में बहुमूल्य योगदान दिया। ‘उपभोक्ता वरीयता सिद्धांत‘ में उनके द्वारा प्रस्तावित ‘प्रकट वरीयता सिद्धांत‘, कल्याण अर्थशास्त्र में किसी आर्थिक निर्णय के सामाजिक कल्याण पर प्रभाव को नापने के लिये दिये गये उनके ‘लिन्ढाल-सेमुएल्सन-बावेन स्थितियों के सिद्धांत‘, लोक वित्त के क्षेत्र में लोक तथा निजी वस्तुओं के आदर्श निर्धारण के लिये प्रस्तुत माडल और अंतर्राष्ट्रीय अर्थशास्त्र में उनके द्वारा विकसित दो ट्रेड माडल आधुनिक अर्थशास्त्र को दिये गये उनके तमाम अवदानों में सबसे उल्लेखनीय हैं। वह नोबल पुरस्कार पाने वाले पहले अमेरिकी अर्थशास्त्री थे 1970 में उन्हें सम्मानित करते हुए नोबेल पुरस्कार समिति ने कहा था कि, &lt;strong&gt;‘‘सैमुएल्सन का सबसे बडा अवदान यही है कि उन्होंने अपने किसी भी अन्य समकालीन अर्थशास्त्री की तुलना में आर्थिक विज्ञान के सामान्य विवेचनात्मक एवं विश्लेशणात्मक स्तर के उन्नयन में अधिक योगदान दिया है। उन्होंने वस्तुतः आर्थिक सिद्धांत के एक बडे हिस्से का पुनर्लेखन किया है।‘‘ &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;दरअसल, महामंदी और समाजवादी ब्लाक के उभरने के साथ-साथ पूंजीवादी जगत में कीन्सीय सिद्धांतों के पूरी तरह अप्रभावी हो जाने चलते फैली निराशा और सैद्धांतिक शून्य के माहौल में सैमुएल्सन के गणितीय सिद्धांतो के जरिये प्रस्तुत माडलों और नवक्लासिकीय सिंथेसिस द्वारा राज्य के देखरेख में पूंजीपतियों द्वारा बाजार के खेल का प्रस्ताव पूंजीवाद के लिये संजीवनी जैसा था। यही वजह थी कि न सिर्फ उन्हें पूंजीवादी जगत द्वारा हाथोंहाथ लिया गया अपितु अमेरिकी व्यवस्था ने भी उन्हें भरपूर मान-सम्मान दिया। वह न केवल अमेरीकी वित्त मंत्रालय के महत्वपूर्ण पदों पर रहे अपितु जान एफ कैनेडी और जानसन के आर्थिक सलाहकार भी रहे। आर्थिक उदारीकरण का नया युग उनके सैद्धांतिक प्रस्ताव के अनुरुप ही था यही कारण है कि भारत में उदारीकरण की शुरुआत होने पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा था कि - &lt;strong&gt;चलो अन्ततः भारत ने भी आर्थिक संवृद्धि का रास्ता खोज लिया।&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6821438566583405249-1467361654786626190?l=economyinmyview.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://economyinmyview.blogspot.com/feeds/1467361654786626190/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6821438566583405249&amp;postID=1467361654786626190' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6821438566583405249/posts/default/1467361654786626190'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6821438566583405249/posts/default/1467361654786626190'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://economyinmyview.blogspot.com/2009/12/blog-post.html' title='आधुनिक अर्थशास्त्र का पिता'/><author><name>अशोक कुमार पाण्डेय</name><uri>https://profiles.google.com/116885901033264770599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh4.googleusercontent.com/-K5s3pyuRhYA/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAADcE/5R8Sp3ae2pk/s512-c/photo.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_qroXGFM0DSM/Sy3J2U_go2I/AAAAAAAACng/ZxCMcYIilvM/s72-c/0.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6821438566583405249.post-8278472043101784763</id><published>2009-11-27T01:39:00.000-08:00</published><updated>2009-11-27T05:06:25.174-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='दलित उत्पीडन'/><title type='text'>नरसिंहपुर जिले के गाडरवारा तहसील में दलित समुदाय के साथ दबंग सवर्ण/गैर दलित जातियों द्वारा किए जा रहे अत्याचार और उत्पीड़न के मामलों की फैक्ट फाइंडिंग</title><content type='html'>&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://naidakhal.blogspot.com/2009/11/blog-post_9957.html"&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;जिला - नरसिंहपुर (मध्य प्रदेष)तहसील - गाडरवाराप्रभावित क्षेत्र - गाडरवारा के आस-पास के गाॅवों के दलित (अहिरवार समुदाय)फैक्ट फाइंडिंग टीम द्वारा भ्रमण किए गए गाॅव -नान्देर, मड़गुला, देवरी और टेकापारदिनांक - 07 और 09 नवम्बर 2009नागरिक अधिकार मंच और युवा संवाद मध्य प्रदेश द्वारा जारी&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt; &lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;फैक्ट फाइंडिंग टीम सदस्य : जय भीम, मूलचंद अहिरवार, जावेद, स्कंद शुक्ला, मनोज, ,&lt;span class=""&gt;सत्यम,&lt;/span&gt; शिव &lt;span class=""&gt;कुमार,&lt;/span&gt; निशांत कौशिक&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;जिले का परिचय&lt;/strong&gt; &lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;नरसिंहपुर &lt;/span&gt;जिला मध्यप्रदेश के जबलपुर संभाग के अंर्तगत आता है। नरसिंहपुर मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल व जबलपुर के बीच में स्थित है। नरसिंहपुर का आर्थिक क्रियाकलाप मुख्यतः गन्ने व दाल की खेती है। नरसिंहपुर में राजपूत , लोधी, पटेल, किरार व अहिरवार समुदाय की आबादी ज्यादा है। गाडरवारा नरसिंहपुर की प्रमुख तहसील है। गाडरवारा नरसिंहपुर की प्रमुख तहसील गाडरवारा की आबादी 70 से 80 हजार जिसमंे अहिरवार समाज के लगभग 38 से 40 हजार लोग है। गाडरवारा की 80 से 85 फीसदी आबादी खेती के कार्यों में संलग्न है। इसमें खेतिहर मजदूर और भूमिहीन किसानों की तादाद ज्यादा है। इन खेतिहर मजदूरों में अधिकंाष आबादी दलित समुदाय की है। जिसमें सबसें ज्यादा अहिरवार (चमार) जाति के लोग है। संविधान के अनुसार यह जाति अनुसूचित जाति में षामिल है। पूरे भारत में अनुसूचित जाति की जनसंख्या में एवं हिन्दी क्षेत्र में चमार जाति (जो कि अपमानसूचक संबोधन है) की संख्या सबसे ज्यादा है। भारत में यह 700 से ज्यादा उपनाम से चिन्हित की जाती है। गाडरवारा के आस-पास के लगभग सभी गांव में अहिरवार समुदाय के लोग निवास करते हैं। उनकी यहां के सामाजिक-आर्थिक क्रियाकलापों में उपयोगी भूमिका है। अहिरवार समुदाय का सामुहिक निर्णय और मौजूदा उत्पीड़न की शुरूआतअहिरवार समाज महापरिषद द्वारा गाडरवारा तहसील में पिछले एक वर्ष से समुदाय द्वारा मृत मवेषी न उठाने के लिए आम सहमति बनाई जा रही थी जिसके तहत गांवों में अहिरवार समुदाय के लोगों द्वारा इस घृणित कार्य को बंद किया जाए और सवर्णों द्वारा मवेषी उठाने के कारण सदियों से चली आ रही छुआछूत व भेदभाव को कम किया जा सके। तत्पष्चात कई गावों में अहिरवार समुदाय के लोगों ने इस वर्ष के जुलाई-अगस्त के महीने से ही मृत मवेषी उठाना बंद कर दिया है। अहिरवार समुदाय की महापरिषद द्वारा मध्य प्रदेष स्तर पर अक्टूबर 2009 में तय किया गया कि अब समुदाय द्वारा मृत मवेशी नहीं उठाए जाएगें।उत्पीड़न का सामाजिक इतिहासभारत के सामाजिक इतिहास में यह बात स्पष्ट है कि हमारी सामाजिक संरचना में एक प्रकार की श्रेणीबद्धता ने समाज में, भेदभाव और छुआछूत जैसी अन्यायमूलक संरचनाओं को प्रतिस्थापित किया है। जिसे समाज की अन्य संरचनाओं द्वारा पोषित और बनाए रखा गया है। आजाद देश में संविधान में सामाजिक न्याय की पुरजोर वकालत के बावजूद सामाजिक असमानता हमारी समाजिक प्रणाली की प्रमुख विषेषता है। जिसमें ऊॅच-नीच के भेदभाव के आधार पर लोगों की गरिमा, आत्म सम्मान और मानवाधिकार अवरूद्ध होते रहे हंै। गाडरवारा के दलित समुदाय के साथ उत्पीड़न और शोषण की जड़े भी इनमें ही निहित हैं। अहिरवार समुदाय के पूर्वजों पर पूर्वकाल से ही सामाजिक कार्य विभाजन के दौरान मृत मवेशी उठाने का भार इस समुदाय पर डाला गया था और षताब्दियों से इन्हीं के द्वारा इस तरह का अमानवीय कार्य संपन्न किया जाता रहा है। पर आश्चर्य यह है कि इस काम को लेकर समाज द्वारा नीच व अपमानजनक कार्य का नजरिया भी बराबर विकसित किया गया है। जो कि अहिरवार जाति विषेष से छुआछूत व उत्पीड़न का ठोस आधार पहले भी रहा है और अब भी बना हुआ है। हांलाकि नये संवैधानिक कानून अनुसूचित जाति- जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम - 1989 के तहत मरे हुए जानवर उठाना एक घृणित काम है और इस काम के लिए किसी को बाध्य नहीं किया जा सकता है। पर गाडरवारा के गाॅवों की सच्चाई ठीक इसके विपरीत है। फैक्ट फाइंडिंग टीम द्वारा क्षेत्र में निरीक्षण की विस्तारित रिपोर्ट गाडरवारा क्षेत्र में दलितों द्वारा उनके साथ हो रहे उत्पीड़न के विरोध व प्र्शासन को लगातार शिकायतों व दोषियों के खिलाफ कार्यवाही की मांग किए जाने के बावजूद प्रशासन का रवैया उदासीन एवं ढीला रहा है। जबकि 5 से 7 गाॅवों से दलितों द्वारा उनके साथ मारपीट और उत्पीड़न की लगातार षिकायतें दर्ज कराई जाती रही हैं।आज के हालात यह है कि इन गाॅवों में गैर दलित (सवर्ण) जातियों के लोगों द्वारा सामुहिक अत्याचार कम नहीं हुए बल्कि और गहरे हो गये है। ऐसे में आव्श्यकता महसूस की गयी कि एक स्वतं़त्र फैक्ट फाइंडिग टीम के माध्यम से घटनाओं को गहराई से देखा और जाॅचा जाए।गाडरवारा के 4 गाॅवों में स्वतंत्र फैक्ट फाइंडिग के दौरान चार अलग-अलग गाॅवों में टीम के सामनें जो तथ्य सामने आये उसकी विस्तृत रिपोर्ट यहां दी जा रही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;गांव- देवरी&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;देवरी गाॅव में अहिरवार समुदाय की हालत गंम्भीर है। यहां सवर्णों /गैर दलित जाति के लोग दलितों को प्रताड़ित करने के क्रुरतम तरीके अपना रहे हैं। मृत मवेशी न उठाने के निर्णय के बाद सवर्ण जाति के लोगांे ने अहिरवार समाज की सार्वजनिक नाकेबंदी कर दी साथ ही गांव में सरकारी मार्ग क्र। 128 की अस्पष्टता के कारण अहिरवार समुदाय के लोंगों का घर से निकलना बंद हो गया है। पूरा समुदाय अपने ही गांव में कैद कर दिया गया है।&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;फैक्ट फाइनडिंग टीम के सामने निम्न तथ्य निकल कर आए-&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;1-दैनिक क्रियाकलाप के लिए आवश्यक चीजों पर प्रतिबंध&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;1- गांव में किराना की एकमात्र दुकान से सामान लेने पर मनाही।&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;2- मोहल्ले के सार्वजनिक नल से पानी न भरने देना।&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;3- बसों पर यात्रा करने पर रोक।&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;4- सब्जी वाले ,अनाज वाले धोबी, नाई ,अखबार वाले आदि को दलित बस्ती में जाने से रोक।&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;5- आटा चक्की से अनाज पिसाने पर रोक।&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;6- सामुदायिक ग्राम पंचायत भवन पर प्रवेश पर रोक।&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;2- बच्चों और महिलाओं पर अत्याचार,&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;देवरी गांव के सवर्ण जाति के बब्लू, जगदीश और पप्पू ने अहिरवार समुदाय की 9 वर्षीय बच्ची देवकी के सिर पर वार कर उसको घायल कर दिया। वहीं विमला बाई को गैर दलित देवेन्द्र किरार ने धमकी देते हुए कहा कि अगर तुम लोग ने हमारे खेतो ंमें पैर रखा तो तुमको नंगा करके पूरे गांव में घुमाएगें। गांव की प्राथमिक स्कूल में पढ़ रहे छात्र योगेश अहिरवार ने बताया कि हमें मध्यान्ह भोजन अलग प्लेट में दिया जाता है और अपनी प्लेट भी खुद धोने के लिए कहा जाता है।&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;3-जान से मारने की धमकी और हथियार बंद घेराव&lt;/span&gt; &lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;हरि सिंह अहिरवार और ओंकार अहिरवार ने फैक्ट फाइनडिंग टीम को बताया कि अर्जुन गुर्जर, नेपाल गुर्जर, व घनश्याम गुर्जर (गैर दलित) हमें लगातार जान से मारने की धमकी दे रहे हंै। वो कहतंे हैं कि तुम लोग ही सबसे ज्यादा शिकायत करते हो।इसके आलावा अक्टूबर के महीने में गांव के सरपंच के माध्यम से झगड़े के निपटारे के लिए बुुलाई गयी बैठक में अहिरवार समुदाय के पहुंचने पर करीब 100 से ज्यादा हथियार बद्ध गैर दलित जाति के लोगों ने उन्हें घेर लिया। अहिरवार समाज के लोग बड़ी मुष्किल से वहां से जान बचाकर निकाले। &lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;strong&gt;4-दलित और ग्रामीण जनता के लिए चल रही योजनाओं को ठप्प करना&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;केन्द्र व राज्य सरकार के सहयोग से चल योजनाओं जिनमें नरेगा, निराश्रित पेंशन योजना, इंदिरा आवास योजना, मजदूर सुरक्षा योजना और भूमिहीन किसानों को जमीन वितरण जैसी अनेक योजनाओं में अहिरवार समुदाय के हितग्राहीओं को साफ तौर पर वंचित कर दिया गया है। वंषीलाल अहिरवार, प्रकाश, विनोद और विषाल अहिरवार, मलखाम अहिरवार सहित अन्य लोगांे के नरेगा के जाॅब कार्ड सरपंच ने अपने पास रख लिए हैं। 70 वर्षीय हरकिषन सिंह अहिरवार की पेंशन का भुगतान चार महीने से नहीं किया गया है। इसके साथ ही वंशीलाल, करोड़ी प्रसाद समेत 12 लोगों को इंदिरा आवास के अन्र्तगत निर्धारित रकम अदा नहीं की जा रही है।&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;strong&gt;5-भूखों मरने की कगार परभूमिहीन अहिरवार&lt;/strong&gt; &lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;किसानों द्वारा सवर्णों के खेतों पर बटाईदारी बन्दोबस्त(ऐसी व्यवस्था जिसमें भूमि का मालिक कृषि के लिए एक बटाईदार रखता है। फसल उगाने से लेकर काटने तक की जिम्मेदारी और खर्चे बटाईदार करता है पर उपज पर उसका हिस्सा फसल के आधार पर 1/4 से लेकर 1/10 तक मालिक द्वारा तय किया जाता है।) के आधार पर जून माह में जो फसल बोयी गयी थी उसके तैयार होने पर दबंग जाति के लोगों ने फसल पर हिस्सा देने से मना कर कर दिया और जबरन हार्वेस्टर के जरिए फसल काट ली। पिछले साल से सूखे की मार झेल रहे अहिरवार समुदाय के लोगों को अब खाने के लिए भी मोहताज होना पड़ रहा है अगर हालात यही रहे तो गांव का लम्बी भूखमरी का षिकार होना तय है।आर्थिक प्रतिबंध- देवरी गांव में अहिरवार समुदाय के लगभग समस्त परिवार भूमिहीन है। वे सवर्णों के खेतों में बटाई व मजदूरी कर गुजारा करतें है। मवेषी न उठाने के निर्णय के बाद अहिरवार समुदाय पर घोषित तौर पर आर्थिक प्रतिबंध लगा दिया है। गांव वालों ने फैक्ट फाइनडिंग टीम को बताया कि इस बार गांव में किसी भी अहिरवार समाज के व्यक्ति को उसका हिस्सा नहीं दिया गया है। कई अन्य लोगों को मजदूरी भी नहीं दी गयी। गांव के लोगों ने फैक्ट फाइनडिंग टीम को बटाई में हिस्सा न मिलने के बारे में विस्तार से बताया उनमें से कुछ के नाम नीचे दीये जा रहें हैं जिनकी फसल या तो काटा ली गयी है या खेत में घुसने नहीं दिया जा रहा है।&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;strong&gt;देवरी गांव में उपज में हिस्सा न मिलने वालों की सूची-&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;क्रÛ बटाईदार/अहिरवार समुदाय भू-स्वामी/गैर दलित समुदाय बोयी गयी फसल का क्षेत्र फसल&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;1 वंशीलाल अहिरवार पुरूषोत्तम अग्रवाल 5 एकड़ सोयाबीन व धान&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;2 वंशीलाल अहिरवार देवी सिंह पटेल 3 एकड़ धान&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;3 विशाल अहिरवार धन सिंह कड़कौल &lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;4 एकड़ सोयाबीन और धान4 पुरूषोत्तम अहिरवार रामकुमार थापर 2 एकड़ धान&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;5 पुरूषोत्तम अहिरवार अमान पटेल 2 एकड़ धान&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;6 अजब सिंह अहिरवार एकम सिंह गुर्जर 6 एकड़ सोयाबीन एवं धान&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;7 प्रकाश अहिरवार चन्दर गुर्जर 2 एकड़ धान&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;8 गोपाल अहिरवार झुम्मक गुर्जर 3 एकड़ धान&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;9 पंचम अहिरवार इन्द्रपाल गुर्जर 5 एकड़ सोयाबीन, गन्ना, धान&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;10 पोटाई अहिरवार पोटाई करात 10 एकड़ सोयाबीन व धान&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;11 नेपाल अहिरवार नेपाल गुर्जर 9 एकड़ धान&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;12 मलखाम अहिरवार मदन पटेल 3 एकड़ धान&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;6-मृत मवेशी अहिरवार समुदाय की बस्ती में डालना&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;गुर्जर (सवर्ण) द्वारा मलखाम सिंह अहिरवार के घर के सामने मृत मवेशी जबर्दस्ती डाला गया। वहीं विशाल अहिरवार के घर के सामने पोखरे में निरंतर मवेशी डाले जा रहें है।दंबग जाति के लोगों ने सामुदायिक भवन के पास भी मृत पशु डाल दिया। जाहिर है कि इससे गांव के दूसरे सार्वजनिक काम प्रभावित हुए।नरेगा के तहत काम के अधिकार से बेदखलनरेगा के काम पर मृत मवेशी न उठाने के निर्णय का व्यापक असर पड़ा है। नरेगा के माध्यम से चल रहे कामों से अहिरवार समुदाय के लोगों को वंचित कर दिया गया है। उनके कार्यो को दूसरे अन्य लोगों करवाया जा रहा है।प्रषासन की तरफ से कार्यवाहीदेवरी गांव के लोगों ने लगातार दो बार अनुविभागीय दंडाधिकारी गाडरवाला को नामजद शिकायत पत्र दिया बावजूद इसके एस।डी.एम द्वारा सांत्वना देकर मामले को आज तक टाला जाता रहा है।&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;गांव- टेकापार&lt;br /&gt;टेकापार गांव की स्थिति भी दूसरे गांव से जुदा नहीं है। यहां पर भी दलित अहिरवार समुदाय को सवर्ण/गैर दलित जाति के लोगों द्वारा सामुहिक बहिष्कार और अत्याचार का सामना करना पड़ रहा है। टेकापार में आधे से ज्यादा आबादी दलित समुदाय की है। यहां पर अहिरवार समाज के लोगों में से केवल 13 लोगों के पास ही कुल 3 एकड़ जमीन है बाकि सब खेतिहर मजदूर हैं। अतः सवर्ण भूस्वामियों पर स्थायी रूप से निर्भर हैं।अक्टूबर के दूसरे सप्ताह में सवर्ण जाति के लोगों द्वारा अहिरवार समाज के कुछ लोगों को बुलाया गया और पूछा गया की तुम लोग मरे हुए जानवर उठाओगे कि नहीं? अहिरवार समुदाय के व्यक्तियों द्वारा अपने समाज के निर्णय से उन्हें अवगत करा दिया गया। अगले दिन सवर्ण जाति की तरफ से फरमान जारी हुआ कि अगर अहिरवार समुदाय के लोग सवर्णो के खेत से निकलतें हैं तो उन्हें 1000 रू. का जुर्माना देना होगा।यह क्रम यहीं नहीं रूका बल्कि इसके बाद दैनिक उपयोग की सामग्री की दुकान, सार्वजनिक नल , आटा चक्की एवं अन्य सार्वजनिक जगहों के इस्तेमाल करने पर पाबंदी थोप दी गयी। घर निर्माण के लिए आवष्यक मिट्टी जो सार्वजनिक स्थलों से ली जाती थी, पर जबर्दस्त रोक लगा दी गयी है। नेतराम अहिरवार बतातें हैं कि मिट्टी खुदाई का काम सामुहिक रूप से होता आया है पर अब वो मिट्टी लेने पर हमें धमकाते हैंै।साहेब सिंह अहिरवार ने टीम को बताया कि मैं सवर्ण के खेत में बटाईदार हूं पर अभी तक बटाई का हिस्सा मुझे नहीं मिला है।स्वराज सुरिया (सवर्ण) ने अमान अहिरवार को गांव की सार्वजनिक कांक्रीट सड़क से भी आने-जाने से रोका और प्रतिरोध करने पर जान से मारने की धमकी भी दी। वहीं नेतराम अहिरवार जब अपने खेती के उपकरणों की मरम्मत कराने गांव के लोहार जीवन विष्वकर्मा के पास गए तो उसने कहा कि अहिरवार समुदाय का कोई भी काम करने की मनाही है। वहीं मोहनलाल अहिरवार को मजदूर सुरक्षा योजना के माध्यम से प्रसूति के लिए मिलने वाला पैसा नहीं दिया जा रहा है। उपज में हिस्सा देने की उत्पीड़नकारी शर्तआगे चलकर गांव में हिंसक वारदात की आशंका और दबंग जातियों के दबाव के कारण 70 वर्षीय फुल्लू अहिरवार को मृत मवेषी उठाना स्वीकार करना पड़ा। तब जाकर सवर्णों के खेतों में उनका और अन्य कुछ अहिरवार समुदाय के लोगों को बटाईदारी में मामूली हिस्सा मिला।समुदाय को अंत्योदय योजना का कार्ड नहीं गांव के ग़रीबों के लिए वितरित किए जाने वाले अंत्योदय के कार्ड में भारी घपला किया गया है। नियमतः यह कार्ड गांव के खेतिहर मजदूर व गरीब दलित के लिए है पर संपन्न सवर्णों के नाम पर कार्ड आवंटित है। और बहुसंख्यक अहिरवार समुदाय इससे बाहर है।नरेगा में काम नहीं100 दिन के रोजगार पाने के संवैधानिक अधिकार पर यहां दबंगई कायम हैं। दलित अहिरवार समाज के लोगों को 100 दिन क्या 10 से 15 का कामे भी मुश्किल से दिया गया है।प्रशासन की प्रतिक्रियाटेकापार के लोगों को दबंग जाति के लोगों ने भयभीत करके रखा हुआ है। उनका कहना है कि अगर शिकायत हुई तो तुम लोगों की हालात खराब कर देगें बावजूद इसके टेकापार के अहिरवार समुदाय के लोगों ने अपने खिलाफ को रही ज्यादितियों को लेकर अनुविभागीय दंडाधिकारी गाडरवाला को 8 अक्टूबर 09 को ज्ञापन दिया पर तब से लेकर अब तक स्थिति जस की तस है।&lt;br /&gt;गाॅव - नान्देर&lt;br /&gt;नान्देर गाॅव के दलित समुदाय के लोगों ने टीम को बताया कि अहिरवार समाज द्वारा राज्य स्तर पर मृत मवेषी न उठाने के सामुहिक निर्णय बाद हमने तय किया कि अब से गांव में मृत मवेशी उठाने का कार्य अहिरवार समाज द्वारा नहीं किया जायेगा। अहिरवार समुदाय द्वारा अपने इस निर्णय से गाॅव के सभी लोगों को अवगत भी करा दिया गया। परन्तु गाॅव में सवर्णों को यह नगावार गुजरा। 10 अक्टूबर 2009 को एक बैलगाड़ी में मरा हुआ पशु लाकर दलित बस्ती के बीचोे बीच रमेष सिंह अहिरवार के घर के सामने फेंक दिया गया। मुकेश उपाध्याय(सवर्ण) ने कुछ आदमियों के माध्यम से जानवार के ऊपर हल्की से मिट्टी डालवा दी। इस पर रमेश सिंह अहिरवार ने उन्हें ऐसा ना करने का आग्रह किया। जिस पर मुकेष ने धमकी देते हुए कहा कि अगर मेरे मरे हुए पशु को हाथ भी लगाया तो, कुल्हाड़ी से हाथ काट डालूंगा। रमेश अहिरवार ने टीम को बताया कि अगले दिन प्रहलाद यादव ने भी उसी जगह एक मरे हुए बछ़डे को डाल दिया। दरअसल दलित बस्ती मेें यह जगह सवर्णों द्वारा जानबूझ कर चुनी गई ताकि अहिरवार समुदाय को सबक सिखाया जा सके यानि यह समुदाय के मनोबल को तोड़ने और दादागिरी का मिलाजुला प्रर्दषन था।इस स्थान पर मृत मवेशी डालने के गंभीर परिणाम तय थे। 70 वर्षीय बिरया बाई (जो पास के झोपड़े में रहती है) को मृत मवेषी की सड़ान्ध ने सांस की गंभीर बीमारी की ओर धकेला। उसे गाडरवारा अस्पताल ले जाना पड़ा। वहीं आयुधी बाई (65 वर्ष) जो कि रमेष अहिरवार की मां है कि तबीयत भी इसी वजह से खराब हुई। जाहिर है यह कृत्य गाॅव में महामारी फैलाने के लिए काफी था।सवर्णों ( गैर दलित) जाति के लोगों ने अहिरवार समुदाय पर दबाव बनाने के अगले चरण में गाॅव में अहिरवार समाज के लिए नाकेबंदी कर दी गई। जिसके मायने है- गाॅव में सवर्णो व गैर दलित के खेतों व अन्य किसी तरह की सम्पति को दलित समुदाय का कोई व्यक्ति उपयोग तो क्या छू भी नही सकता है। साथ ही गाॅव के आने जाने की सड़कों ,मेड़ों व घरेलू निस्तारण को प्रतिबंधित कर दिया गया है। पोहप सिंह अहिरवार ने टीम को बताया कि हमारे साथ गाली गलौज, मारपीट व सार्वजनिक जगहों जिनमें नल, स्कूल, पंचायत व आटाचक्की जैसी जगहों में सवर्णो द्वारा सामाजिक बहिष्कार किया जा रहा है। लालजी सिंह कहते है कि मंै स्कूल में सहायक अध्यापक हूॅ पर वो मुझे भी मरा हुआ पशु उठाने को मजबूर करते है। और अगर किसी से अपनी बात कहो तो धमकाते हैं और कहते हंै कि तुम बहुत जाॅच करा रहे हो अभी तुम्हारा बुरा हाल करते हंै।75 वर्षीय नन्हू ने बताया कि धोबी हो या नाई वर्षांे से हमारे समुदाय के साथ भेदभाव करते आ रहे है, इस तरह के कार्य या तो हम खुद करतें है या गाॅव से बाहर जाना पड़ता है।दबंग जातियों के अत्याचारों की एक और बानगी है पोहप सिंह अहिरवार। उन्होंने एक गैर दलित तकत सिंह गुर्जर से 50हजार बयाना देकर ढेड़ एकड़ की जमीन खरीदी थी। पर अब विनौद राजौरिया जमीन की रजिस्ट्री देने से मना कर रहा है। मृत मवेषी न उठाने के सामुहिक निर्णय बाद दलित बस्तियों में दलित उत्थान के लिए चलाये जा रहे कार्यक्रम जिनमें नरेगा, निराश्रित पेंशन योजना, इंदिरा आवास योजना, मजदूर सुरक्षा योजना आदि यहाॅ पूरी तरह से बन्द कर दिये गए हैं। राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारन्टी एक्ट राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारन्टी एक्ट के तहत जाॅब कार्ड तो सभी के बनाए गए हैं पर बहुत कम लोगों को ही काम मिला है। इस घटना के बाद अहिरवार समुदाय के लोगों को गांव में नरेगा का काम देना बंद कर दिया गया है। प्रषासन की प्रतिक्रिया-गाॅव में लोगों ने उस गंभीर समस्या व दलित समुदाय पर हो रहे अत्याचारों के खिलाफ एस.डी.एम. गाडरवारा को ज्ञापन दिया और मांग की कि हम पर अत्याचार बन्द हो और इस समस्या का स्थायी निराकरण किया जाए प्र्शासन की तरफ से तहसीलदार ने आकर ग्राम पंचायत सरपंच विनोद तिवारी (सवर्ण) को केवल समझाइश दी कि किसी को भी मृत मवेषी उठाने पर बाध्य न किया जाए और मृत मवेशी डालने की जगह तय की जाये। पर सरपंच द्वारा उल्टे समुदाय को किसी एक व्यक्ति को इस काम के लिए नियुक्त करने का निर्देष जारी किया गया। पर जगह तय करने की प्रक्रिया अभी तक नही की गई। तब से लेकर अब तक प्रशासन द्वारा किसी तरह की ठोस कार्यवाही नहीं की गयी है। जबकि समुदाय के साथ उसके बाद अत्याचार और बढ़े है।&lt;br /&gt;ग्राम मड़गुला&lt;br /&gt;अहिरवार समाज द्वारा मृत मवेषी न उठाने के सामुहिक निर्णय के बाद सवर्णों द्वारा अहिरवार समुदाय का सामाजिक बहिष्कार और गहरा गया है। यहाॅ पर दलित बस्ती गांव से बाहर मुख्य सड़क के किनारे स्थित है। सवर्णों ने अहिरवार समाज के लोगों पर गांव और खेतों में प्रवेष पर प्रतिबंध लगा दिया है। यहां पर अधिकांष जमीन सवर्ण जाति के लोगों के हिस्से में है। गांव में सार्वजनिक शौचालय और रास्ता नहीं है। इसलिए मड़गुला गाॅव में दलित अहिरवार समुदाय को शौच जाने तक पर प्रतिबंध है। जाहिर है कि अहिरवार समाज के लोगों को इस कारण मुख्य सड़क के किनारे ही शौच के लिए जाना पड़ता है। इस गाॅव में भी सवर्ण दबंग जातियों के अत्याचार ने अहिरवार समुदाय को गाॅव से पलायन व आत्महत्या के लिए मजबूर कर दिया है। 1-मजदूरी के दाम को कम करना31 जुलाई 2009 को गांव के कोटवार के माध्यम से आदेश दिया गया कि अहिरवार समुदाय के जो लोग सवर्णों के यहाॅ बटाईदारी करते है उन्हें वही मजदूरी माननी होगी, जो हम (सवर्ण) तय करेगंे वरना अहिरवार समुदाय को गाॅव छोड़ना होगा। वहीं दूसरी ओर अन्य कामों की मजदूरी दरें जो 70-80रु थी, को सीधे आधा कर दिया गया है, जो कि दलित परिवारों के पालन-पोषण के लिए बिलकुल अपर्याप्त और गैर कानूनी है।2-दैनिक जीवन के लिए आवष्यक चीजों पर प्रतिबंधसवर्णों द्वारा गांव के दलित अहिरवार समुदाय के लिए सार्वजनिक नल, किराना की दुकान से सामान खरीदने, आटा चक्की से अनाज पिसाने, आदि पर जबर्दस्ती रोक लगा दी गई है। 3-महिलाओं के साथ बदसलूकी और धमकीगांव में सार्वजनिक शौचालय और रास्ता नहीं होने के कारण मड़गुला गाॅव में दलित अहिरवार समुदाय को शौच जाने तक पर प्रतिबंध है। जाहिर है कि अहिरवार समाज की महिलाएं को इस कारण मुख्य सड़क के किनारे ही शौच के लिए जाना पड़ता है। अनंत अहिरवार ने बताया कि पुरुषों के न मिलने पर सवर्ण जाति के लोग दलित समुदाय की औरतों, बहू-बेटियों के साथ बदसलूकी पर उतर आए है। प्रतिरोध करने पर कहते है कि अगर हमारी बात नही मानी तो एक-एक को पेड़ पर फांसी पर लटका दिया जाएगा।अत्याचारों के खिलाफ षिकायत-गैर दलित जातियों के व्यवहारों से तंग आकर लोगों ने दिलीप राजपूत, नरवर राजपूत, राजकुमार, नरेश, इंदर, गुटपाल और 5 अन्य के खिलाफ षिकायत की जिसके बाद साईखेड़ा थानाध्यक्ष द्वारा गाॅव में आकर यह समझाईष दी गई कि आप लोग झगड़ा न करें। निष्कर्ष और मांगें-मध्य प्रदेश दलित उत्पीड़न में हमेषा से उॅचे पायदान पर रहा है। प्रदेष में सामाजिक उत्पीड़न की जड़ें आजादी के 60 वर्षों के बाद भी गहरी है। सदियों से भारत में मृत मवेषी और चमडा़ छिलने जैसे अमानवीय कृत्य दलित समुदाय से कराये जातें रहें है। लोकतांत्रिक भारत के संविधान में सामाजिक न्याय की पुरजोर वकालत के बावजूद आज भी यह अमानवीय व गैरसंवैधानिक कार्य दलित समुदाय से जबरन कराया जा रहा है। विडम्बना यह है कि इस वर्ष दलित उत्पीड़न कानून के बीस वर्ष भी पूरे हो रहे हैं।फैक्ट फाइंडिंग टीम ने मध्य प्रदेष के गाडरवारा तहसील के चार गांवोें में सैकड़ों अहिरवार समुदाय के लोगों से बातचीत करने पर पाया कि अहिरवार समाज (दलित ) द्वारा राज्य स्तर पर मृत मवेषी उठाने जैसे अमानवीय व गैरसंवैधानिक काम न करने के सामुहिक निर्णय के जबाब में सवर्ण जातियों के लिए यह कैसे नाक का विषय बन गया है। सवर्ण दलितों पर सामाजिक, आर्थिक प्रतिबंध लगा कर उनको निर्णय बदलने के लिए लगातार मजबूर कर रहे हैं। सवर्ण चाहतें है कि दलित अपने आत्मसम्मान की लड़ाई बंद कर दें। दलित सवर्णों के मृत पषु उठाकर उनकी सामाजिक-सांस्कृतिक गुलामी करतें रहें।फैक्ट फाइंडिंग टीम ने गाडरवारा क्षेत्र में मौजूद हालतों के निरीक्षण में निम्न बातें सामने आयीं-ऽ अहिरवार समुदाय के द्वारा आत्मसम्मान के लिए गया यह निर्णय दरअसल सवर्णों की जातिगत श्रेष्ठता के लिए चुनौती जैसा बन गया इलाके में सवर्ण/गैर दलित अपने सामाजिक और आर्थिक रौब दिखाकर अहिरवार समुदाय पर लगातार दबाव बना रहें है।ऽ&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;मृत मवेषी उठाना एक खास जाति का ही काम है की सांस्कृतिक-सामाजिक मान्यता को कायम रखने की जिद इस उत्पीड़न की जड़ हैअव दलितों के संवैधानिक मुल्यों की हिफाजत के बदले प्रषासन सवर्णों के यथास्थिति बनाए रखने के कवायद मंे मौन सहभागी बना हुआ है। फैक्ट फाइंडिंग टीम द्वारा गाडरवारा क्षेत्र में मौजूद हालतों के निरीक्षण के दौरान जो बातें सामने आयीं हैं। उस आधार अहिरवार समाज व सामाजिक न्याय के लिए निम्न कार्यों को तत्काल किए जाने की आवष्यकता है-1- शासन द्वारा गाडरवारा तहसील में घट रही घटनाओं की स्वतंत्र व निष्पक्ष न्यायिक जाॅच कराई जाए।2- जिन लोगों द्वारा मृत मवेषी उठाने को मजबूर किया जा रहा है उन पर उचित कार्यवाही की जाए।3- फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट व शासन के पास जो नामजद शिकायत आयीं है उनमें उल्लेखित लोगों पर तत्काल कारवाई का जाए।4- अहिरवार समाज में व्याप्त भय से निजात दिलाने के लिए प्रशासन द्वारा कड़े कदम उठाए जाएं।5-सरकार द्वारा चलाए जा रहे कल्याणकारी कार्यक्रमों में जिनसे अहिरवार समाज को वंचित कर दिया गया है। उन पर समुदाय के लोगों की भागीदारी को पुर्नस्थापित किया जाए।6-अहिरवार समाज के जिन बटाईदारों को उपज में हिस्सा नहीं मिला हैै उनको उनका हिस्सा और मुआवजा दिलाया जाए।7-इस घटनाक्रम के बाद सवर्णों द्वारा गरीबी रेखा से अहिरवार समुदाय लोगों कटे हुए नाम को फिर से जोड़ा जाए।8-इस समस्या के स्थायी हल के स्थायी उपाय किए जाएं।&lt;br /&gt;नागरिक अधिकार मंच और युवा संवाद मध्य प्रदेष द्वारा जारीसंपर्क- जयभीम नागरिक अधिकार मंचमकान नं. 900 दुर्गानगर पानी के टंकी के पास, दो नं. स्टाॅफ भोपालमोबाईल नं. 09301363498&lt;br /&gt;मूलचंदनागरिक अधिकार मंचमोबाईल नं. 09303052704जावेदयुवा संवाद भोपालमोबाईल नं. 09424401459&lt;br /&gt;मनोजयुवा संवाद भोपालमोबाईल नं. 09754762958&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6821438566583405249-8278472043101784763?l=economyinmyview.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://economyinmyview.blogspot.com/feeds/8278472043101784763/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6821438566583405249&amp;postID=8278472043101784763' title='9 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6821438566583405249/posts/default/8278472043101784763'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6821438566583405249/posts/default/8278472043101784763'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://economyinmyview.blogspot.com/2009/11/blog-post.html' title='नरसिंहपुर जिले के गाडरवारा तहसील में दलित समुदाय के साथ दबंग सवर्ण/गैर दलित जातियों द्वारा किए जा रहे अत्याचार और उत्पीड़न के मामलों की फैक्ट फाइंडिंग'/><author><name>अशोक कुमार पाण्डेय</name><uri>https://profiles.google.com/116885901033264770599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh4.googleusercontent.com/-K5s3pyuRhYA/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAADcE/5R8Sp3ae2pk/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>9</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6821438566583405249.post-3828443078830988388</id><published>2009-09-26T00:53:00.000-07:00</published><updated>2011-10-04T09:39:57.341-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हिंद स्वराज'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='समीक्षा'/><title type='text'>गांधी जी का हिंद स्वराज: एक पुनरुत्थानवादी युटोपिया का घोषणापत्र</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: #990000;"&gt;&lt;strong&gt;‘‘ गांधी का आध्यात्मवाद बहरहाल हिंदू पुनरुत्थानवाद के साथ ही मेल खाता है। अतः यह राजनैतिक अलगाववाद की ओर ले जायेगा। आध्यात्मवाद राजनीति में धार्मिक वातावरण, हठधर्मिता तथा आनुष्ठानिकता का पुनर्सृजन करता है। यह धर्मतंत्र की वापसी है तथा यह एक से अधिक धर्मों को मानने वाले देश के लिये दोहरा खतरा पैदा करता है।’’&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;em&gt;&lt;strong&gt;&lt;span class=""&gt;प्रो&lt;/span&gt; बेनी प्रसाद, हिंदू-मुस्लिम क्वेश्चन, किताबिस्तान, 1941 इलाहाबाद&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt;&lt;/div&gt;&lt;em&gt;&lt;strong&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;em&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt;&lt;span style="color: #990000;"&gt;मोहनदास करमचंद गांधी भारतीय सामाजिक-राजनैतिक परिदृश्य का एक महत्वपूर्ण , अविभाज्य और लगभग मिथकीय हिस्सा है। देश के स्वतंत्रता आंदोलन में उनकी भूमिका तो महत्वपूर्ण रही ही है, स्वातंत्रयोत्तर भारत में भी उनका नाम अक्सर राजनैतिक धाराओं-प्रतिधाराओं के लिये अपने विचारों को सही प्रमाणित करने के लिये अदालत की उस गीता /कुरान की तरह काम करता है, जिन्हें गंभीरतापूर्वक पढने या पुर्नव्याख्यायित करने की जगह पवित्र कपड़ों में लपेट कर रखा जाना बेहतर समझा जाता है। यह अकारण भी नहीं है। ‘गांधीवाद’ की कोई ऐसी विस्तृत सैद्धांतिकी गांधी ने नहीं लिखी जिसमें उस सामाजिक-राजनैतिक-आर्थिक नियमन का कोई विस्तारित और तार्किक ढांचा प्रस्तुत किया गया हो या जिसके आधार पर एक नयी तथा बेहतर व्यवस्था का निर्माण हो सके। अखबारों में लिखे तमाम छोटे-बडे आलेखों, गीता माता, अनासक्ति योग, सत्य के प्रयोग, हिन्दु धर्म जैसी किताबों के बीच अपने राजनैतिक जीवन के बिल्कुल आरंभिक दौर में लिखी ‘‘हिन्द स्वराज’’ ही एकमात्र ऐसी किताब है जिससे उनकी वैचारिक स्रोतों का पता चलता है। आज आजादी के बासठ वर्षों बाद और इस किताब के प्रकाशन के सौ वर्ष पूरे होने पर भूमण्डलीकृत सामाजार्थिक परिवेश में इसका पुनर्मूल्यांकन, दरअसल , गांधी की भूमिका तथा उनके प्रभामंडल मे पनपे प्रभावों का भी अध्ययन तथा पुनर्मूल्यांकन है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="color: #990000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: #000099;"&gt;यह पूरी किताब गुरु-चेला संवाद के रूप में लिखी गयी है- जाहिर है गांधी यहां गुरु के रूप में हैं ( वस्तुतः संपादक) और उनके विचारों पर शंका करने वाले शेष सभी जन उद्दण्ड एवं शंकालु शिष्य (पाठक) के रूप में। महेश गवास्कर इसे धार्मिक प्रवचन की प्रचलित परम्परा से जोडकर देखते हैं और इस रूप में ’’कृष्णार्जुन संवाद’’ तथा ‘‘उन्नीसवीं सदी के इसाई मिशनरियों की धार्मिक शिक्षा की पुस्तिकाओं‘‘ के करीब पाते हैं (देखें इकोनामिक एण्ड पोलिटिकल वीकली, 5 सितम्बर-2009)। पुस्तक का यह शिल्प दो बातों का स्पष्ट परिचायक है, पहला तो यह कि गांधी अपने विचारों पर शंका करने वालों से बातचीत के लिये हमेशा प्रस्तुत हैं और दूसरा यह बातचीत बराबरी के स्तर पर नहीं हो सकती - शंकालु हमेशा निचली सीढ़ी पर ही बैठेगा। दरअसल आगे हम देखेंगे कि गांधी का पूरा राजनैतिक-आर्थिक-सामाजिक दर्शन इसी सूत्र से संचालित होता है ‘‘जहां वह अंततः एक ऐसा तानाशाह के रूप में सामने आते हैं जो विरोध बर्दाश्त नहीं कर सकता।’’ (देखें आर सी मजूमदार, हिस्ट्री आफ दि फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया, पेज 22) &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="color: #000099;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color: #000099;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: #000099;"&gt;&lt;span style="color: #660000;"&gt;मै शुरुआत उनके आर्थिक विचारों से करुंगा। गांधी मशीनों के खिलाफ थे यह एक सुपरिचित तथ्य है और चरखे के प्रति उनका अतिमोह भी ( वैसे इसी किताब की प्रस्तावना में मिडलटन का जिक्र है जो कहते हैं कि ’’गांधी जी अपने विचारों के जोश में यह भूल जाते हैं कि जो चरखा उन्हें बहुत प्यारा है वह भी एक यंत्र है और कुदरत की नहीं इंसान की बनाई हुई एक अकुदरती- कृत्रिम चीज़ है।’’) लेकिन यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि इसका उत्स कहां है? गांधी का असल विरोध आधुनिकता से था। यह विरोध इतना प्रखर और इतना अंधा था कि वह आगे बढ़कर स्कूली शिक्षा और आधुनिक चिकित्सा का भी विरोध करते हैं। यह विरोध इस हद तक था कि गुजरात में प्लेग फैलने पर उन्होंने सलाह दी कि लोग ‘‘प्रकृति के कार्य में हस्तक्षेप न करें और चूहों तथा मक्खियों को न मारें और अपने आश्रम में चेचक फैलने पर टीकाकरण को गोमांस खाने के बराबर बताया’’ (देखें गांधी आर गांधीज्म , बी आर अंबेडकर )! इस आधुनिकता के विरोध की असली वजह है उनके भीतर कूट-कूट कर भरा यथास्थितिवादी और वर्णवाद समर्थक मानस। इस विरोध के आध्यात्मिक चोले के अन्दर &lt;strong&gt;उनका स्त्री, दलित और मज़दूर विरोधी चेहरा&lt;/strong&gt; बार-बार आता है। विठ्ठल भाई पटेल के जीवनीकार गोरधन भाई पटेल ने लिखा है कि ‘‘जब 1918 में विठ्ठल भाई ने जातिप्रथा विरोधी विधेयक पेश किया तो गांधी ने उसका समर्थन किया’’ ( यहां यह बता देना जरूरी है कि जिन्ना ने इस बिल का समर्थन किया था)। गोरधन भाई का निष्कर्ष है कि ’’कम से कम जाति व्यवस्था के मामले में तो गांधी पूरी तरह पुराणपंथी थे ( देखें, विठ्ठल भाई पटेल-लाईफ एन्ड टाईम्स)।’’ इस किताब (हिन्द स्वराज) के पेज़ 39 पर पश्चिमी सभ्यता में औरतों के काम पर जाने की आलोचना करते हुए वह कहते हैं कि ’’जो स्त्रियां घर की रानी होनी चाहिये, उन्हें गलियों में भटकना पडता है।़़’’ यह साफ़ तौर पर औरतों के काम करने का विरोध और उनके घर की सीमाओं के भीतर क़ैद का समर्थन है, चाहे शब्दावली कितनी भी दयालु क्यों न हो। यही नहीं , पार्लियामेंट के विरोध में उन्होंने जिस बांझ और बेसवा (वैश्या) की शब्दावली का प्रयोग किया है वह भी उनके इसी स्त्री विरोधी मानस का परिचायक है। आगे वह ‘बेसवा’ शब्द की विवेचना करते हुए कहते हैं कि वैश्या वह जिसका कोई मालिक नहीं होता या जो एक मालिक के होने पर भी एक सरीखी चाल नहीं चलती- साफ है कि औरत का मालिक किसी पुरुष का होना जरूरी है।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="color: #000099;"&gt;&lt;span style="color: #660000;"&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;शिक्षा के प्रति उनका नज़रिया उनके यथास्थितिवाद को और स्पष्ट कर देता है। पेज़ 58 पर वह कहते हैं कि ‘‘हज़ारों साल पहले जैसी हमारी शिक्षा थी वही चलती आयी। सब अपना-अपना धंधा करते रहे।’’ यह अपना अपना धंधा क्या था और क्या थी वह हजार साल से चली आ रही शिक्षा? जिसमें कि दलित को हमेशा ही शिक्षा से वंचित रहना था और ब्राह्मणों को सदा ही बिना हाथ-पांव हिलाये भोजन पाना था ( आगे की पंक्तियों में उन्होंने इस हाथ-पांव हिलाने के काफी गुणगान किये हैं।) गांधी जी को इस अपने-अपने धंधे में कोई सड़ांध नहीं आती, कोई विरूपता नहीं दिखती। जबकि अंबेडकर साफ़ देख पा रहे थे कि यह न केवल उत्पीड़क था अपितु श्रम नहीं ‘‘श्रमिकों का विभाजन’’ था। आगे उनका मंतव्य और साफ़ होता है। पेज 79-80 पर वह लिखते हैं कि ’’एक किसान जिसे मामूली तौर पर व्यवहारिक ज्ञान है उसे अक्षर ज्ञान देकर आप क्या करना चाहते हैं? उसके सुख में आप कौन सी बढ़ती करेंगे? क्या उसकी झोपडी या उसकी हालत के बारे में आप उसके मन में असंतोष पैदा करना चाहते हैं?’’ &lt;strong&gt;&lt;span style="color: #990000;"&gt;यह है ग़रीब किसानों और मजदूरों के प्रति उनका प्रेम जो कालांतर में ट्रेड यूनियन आंदोलनों से उनकी नफरत के साथ मिलकर उनके कुटिल यथास्थितिवाद का आख्यान गढ़ता है जिसमें एक शिक्षाहीन किसान को हमेशा वैसा ही बना रहना है और साधन संपन्नों को भी। &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="color: #006600;"&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;यही यथास्थितिवाद उनके आर्थिक चिंतन के मूल में है। वह मशीनों के विरोध में इसलिये हैं कि कहीं उस समय की सामंती व्यवस्था पश्चिम के रिनेसां की तार्किकता वाले पूंजीवाद में रूपांतरित न हो जाये। ठीक वैसे ही जैसे बाद में उन्होंने समाजवादी चेतना से लैस किसानों और मजदूरों के आंदोलनों का विरोध किया कि कहीं समाजवाद पूंजीवाद को प्रतिस्थापित करने मे सफल न हो जाये। यही वजह है कि मशीनों को सारे दुर्गुणों का जड़ बताने के बाद भी मिलों को बंद करने के सवाल पर वह कहते हैं कि ‘‘जो चीज़ स्थायी और मजबूत हो गयी है उसे निकालना मुश्किल है। इसीलिये काम शुरु न करना पहली बुद्धिमानी है। मिल मालिकों की ओर हमें नफरत से नहीं देखना चाहिये।’’ साथ ही वह मिलें खत्म करने का रास्ता बताते हैं कि ’’मिल मालिकों को समझाया जाये कि वे खुद अपना काम धीरे-धीरे कम कर दें।’’&lt;strong&gt; हालांकि इतिहास इस बात की कोई गवाही नहीं देता कि गांधी ने कभी अपने बजाजों या टाटाओं को यह समझाया हो या मिलों को बाहर करने के लिये कोई सत्याग्रह चलाया हो।&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;यही नहीं, वह अपनी बात को साबित करने के लिये मनगढं़त तथा झूठे तथ्य भी पेश करते हैं जैसे वह कहते हैं कि पहले लोग खुली हवा में जितना ठीक लगे उतना काम करते थे (पेज 39), जब मिलों की वर्षा नहीं हुई थी तो औरतें भूखे नहीं मरती थीं (पेज85) आदि-आदि। इतिहास और अर्थशास्त्र का मामूली विद्यार्थी भी यह जानता है कि अपनी तमाम कमज़ोरियों के बावज़ूद औद्योगीकरण ने लोगों के जीवनस्तर में बढोत्तरी की है और भारतीय कृषि अर्थव्यवस्था और सामंती शासन में ग़रीब और दलित तबका अपनी मर्जी से खुली हवा में नहीं बल्कि अपने प्रभुओं की मर्जी से नारकीय स्थितियों में गुलामों की तरह काम करता था। साथ ही उस दौर में स्त्री की पराधीनता तथा शोषण अपने चरम पर पर यथास्थितिवाद के चश्में से उन्हें भारत के इतिहास का सब अच्छा लगता था यहां तक कि सामंती शासन भी!&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;यह सच है कि इस किताब में एकाधिक बार उन्होंने उन तत्कालीन सामंती शासकों की भत्र्सना की है जो अपनी प्रजा को कष्ट देते थे परंतु यह भी सच है कि वह अंततः ऐसी ही अधिनायकवादी व्यवस्था के समर्थक थे। ब्रिटिश पार्लियामेन्टरी शासन व्यवस्था के विरोध का अपना कारण उन्होंने बताया कि वह इसलिये बुरी है ( इस संदर्भ में उनके द्वारा प्रयुक्त शब्दावली मैं पहले बता चुका हूं) कि उसका कोई एक मालिक नहीं होता। इसी क्रम में वह आगे कहते हैं कि &lt;span style="color: #000099;"&gt;&lt;strong&gt;’’ज़्यादा लोग जिस बात को कहें उसे थोड़े लोगों को मान लेना चाहिये यह तो अनीश्वरी बात है, एक वहम है।’’&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; क्या अर्थ निकलता है इसका? स्पष्टतः यह कि पहला तो जो राज्य व्यवस्था हो उसका मालिक एक हो और वह उसके हिसाब से सीधी राह चले ( हिन्दुस्तानी संदर्भ में पति के आदेश पर चलने वाली एक संस्कारी पत्नी ) और दूसरा, उस पर बहुमत का निर्णय मानने की कोई बाध्यता न हो! यह है गांधी का आदर्श स्वराज - जिसमे अदालतें नहीं होंगीं, होंगी तो पुराने ढंग की (पेज 89)। निश्चित तौर पर यह एक अधिनायकवादी, धर्म संचालित, वर्णव्यवस्था आधारित राज्य व्यवस्था का प्रस्ताव है- जहां शिक्षा भी सीमित और ऐसी ही पुनरुत्थानवादी होगी। इस धर्म आधारित तथाकथित भारतीय सभ्यता से उनका मोह इतना गहरा है कि वह चाहते हैं कि हिंदुस्तानी इससे वैसे ही चिपके रहें जैसे मां से बच्चा (पेज 60)। इस बच्चे का बड़ा होना उनको बर्दाश्त नहीं जबकि ब्रिटिश पार्लियामेण्ट के संदर्भ में वह कहते हैं कि अगर सात सौ बरस (अब इस आंकडे़ के बारे मे क्या कहा जाये? 1909 में ब्रिटिश पार्लियामेण्ट की उम्र सात सौ बरस!) के बाद भी पार्लियामेण्ट बच्चा ही बनी रही तो बड़ी कब होगी?&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: #990000;"&gt;अपनी बात को येन-केन प्रकारेण मनवा ले जाने के लिये वे कई बार अपनी ही बात से पलट जाते हैं।&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; पेज़ 41 पर वह लिखते हैं कि अंग्रेजों से पहले हिन्दू-मुसलमानों में बैर था और फिर पेज़ 46 पर बताते हैं कि जब अंग्रेज हिन्दुस्तान में नहीं थे तब हम एक राष्ट्र थे और आगे पेज 49 पर लिखते हैं कि हिंदू मुसलमानों में झगड़े तो अंग्रेज़ों ने फिर से चालू करवाये, और यह इकलौता उदाहरण नहीं है। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;दरअसल, अपने इस एजेंडे में गांधी का सबसे बड़ा सहारा धर्म है। इस पूरी किताब में धर्म और इश्वर इतनी बार आया है कि यह किसी राजनैतिक चेतनासंपन्न व्यक्ति की जगह किसी अधपढे़ हिंदू संत की रचना अधिक लगती है। धर्म से व्यामोह इस क़दर है कि उन्हें &lt;strong&gt;&lt;span style="color: #660000;"&gt;’’धार्मिक ठग दुनियावी ठगों से बेहतर लगते हैं’’!&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; और ’’धर्म के नाम पर हुई लड़ाईयों में बहा अपरिमित ख़ून सभ्यता के संकट के आगे छोटा लगता है’’। यही नहीं वह बड़े ठंढे स्वर में कहते हैं कि ‘‘जहां भोले लोग हैं वहां ऐसा ही चलता रहेगा और लोग मर गये कि सारा सवाल हल हो गया’’!! (पेज 43)। ऐसे में तो शायद मोदी पटेल की जगह गांधी को अपना नायक मानने में जरा भी नहीं झिझकें। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;धर्म की यह पवित्र चादर उन्हें वह सब कहने की इज़ाज़त देती है जिसे अन्यथा कहने पर उस समय भी उन्हें खारिज़ कर दिया जाता। बहुमत के निर्णय के अधिकार का विरोध, वर्ण व्यवस्था, जाति पंचायतों तथा ब्राह्मणवादी शिक्षापद्धति का समर्थन, किसानों तथा मज़दूरों की चेतना के विकास का विरोध यह सब वह धर्म की आड़ मंे करते हैं और इस रूप में एक कट्टर तथा शातिर पुनरुत्थानवादी के रूप में सामने आते हैं। यही वज़ह है कि उनके समकालीन कई नेता धर्म पर उनके इस अतिवाद को लेकर खिन्न रहते थे। &lt;span style="color: #660000;"&gt;&lt;strong&gt;डी ई वाचा&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; ने लिखा था कि &lt;span style="color: #990000;"&gt;‘‘&lt;strong&gt;यह व्यक्ति अत्यधिक घमंड तथा व्यक्तिगत महात्वाकांक्षा से भरा है और बहुत बडी संख्या में सोचने समझने की क्षमता से रहित लोग इस असुरक्षित गड़रिये के पीछे पीछे भेडों के झुण्ड की तरह चलने में पूरी तरह से पागल प्रतीत होते हैं, जो कि देश को अराजकता तथा अव्यवस्था के किनारे ले जा रहा &lt;/strong&gt;है’’&lt;/span&gt; और &lt;strong&gt;&lt;span style="color: #000099;"&gt;तिलक&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; का कहना था कि &lt;span style="color: #000099;"&gt;&lt;strong&gt;‘‘मंै गांधी जी का अत्यधिक सम्मान और उनकी प्रशंसा करता हूं परंतु मै उनकी राजनीति को पसंद नहीं करता। यदि वे राजनीति छोड दें तथा हिमालय की ओर प्रस्थान कर जायें तो मैं उन्हें अपनी सम्मान की भावना के चलते प्रतिदिन बंबई से ताजे फूल भेजता रहूंगा।’’ &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;धर्म को लेकर उनकी यह आसक्ति इतनी भयावह है कि वह पूरे रिनेसां को वह बस अच्छे कपड़े, खान-पान और अन्य चीज़ों में परिवर्तन में न्यूनीकृत कर देते हैं और फिर धर्म विरोधी होने के कारण खारिज़। कहीं अलग से न लिखे होने के बावजूद चर्च और राजशाही का उनका यह समर्थन भारत के भविष्य के बारे में उनके विचार का स्पष्ट द्योतक है। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;उनका यह प्रतिगामी जीवन दर्शन अंतर्जातीय तथा अंतर्धामिक विवाहों के उनके कटु विरोध में भी अभिव्यक्त होता है। यही नहीं, यह सब इस रूप में भी अभिव्यक्त होता है कि &lt;span style="color: #000099;"&gt;&lt;strong&gt;उनकी जीवनपद्धति और आचरण इन सिद्धांतों से कतई मेल नहीं खाते।&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; वह रेल का विरोध करते हैं और कहते हैं कि इससे बुरे लोग बुराई फैलाते हैं और अच्छे लोग इसका कम ही उपयोग करते हैं (पेज 46) परंतु खुद रेलों की निरंतर यात्रा करते हैं ( अब यह तो आप ही तय करिये कि वह गलत कह रहे थे या बुराई फैला रहे थे।), वह आधुनिक शिक्षा का विरोध करते हैं और न केवल खुद पढ़े लिखे हैं अपितु नेहरु जैसे अत्यंत आधुनिक और शिक्षित व्यक्ति को अपना वारिस बनाते हैं, किसी अक्षरज्ञानहीन व्यक्ति को उनकी इतनी निकटता मिली हो यह मुझे तो नहीं पता, वह अंग्रेजी के खिलाफ हैं पर अंग्रेजी में अख़बार निकालते हैं, वह आधुनिक दवाओं के खिलाफ हैं पर 1924 में बीमार पडने पर आपरेशन के लिये पूना मिलेट्री अस्पताल के सर्जन कर्नल मैडाक को चुनते हैं। (देखें ग्कोमी वोल्टन, द ट्रेजेडी आफ गांधी), वह कहते हैं कि बस हांथ-पांव जितना चलायें उतना ही चलो और खुद एक धनी सेठ की दान की हुई कार से चलते हैं, वे यंत्र के विरोधी हैं पर घड़ी-चश्में के बिना उनका काम नहीं चलता और उनके अख़बार उस समय के सबसे अच्छे प्रेस में छपते थे। यही नहीं वह भले आश्रम में रहते थे परंतु उनकी इस सादगी की क़ीमत बहुत ज्यादा थी ( देखें धनंजय कीर , महात्मा गांधी पोलिटिकल सेंट एन्ड एन अनार्म्ड प्रोफेट)। &lt;span style="color: #660000;"&gt;&lt;strong&gt;सरोजिनी नायडू के अनुसार तो वह राजनीतिक प्रचार पर लाखों खर्च करते थे, कभी-कभी मात्र उनकी संतुष्टि के लिये प्रथम श्रेणी के डब्बे को तृतीय श्रेणी का बनाया जाता था और महलों लो कुटीर कहा जाता था। उनका भोजन और रहन सहन वाकई बहुत महंगा था।( वही)&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="color: #660000;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;गांधी की नीतियां सामन्यतः तर्कों से परे होती थीं और उन्हें लागू करवाने का उनका तरीका भी। इसके उदाहरण सुभाष चन्द्र बोस के अध्यक्ष चुने जाने से लेकर जिन्ना के प्रति उनके रवैये में लगातार दिखती है। पर आश्चर्य यह है कि आर्थिकी से जुडे अपने विश्वासों के लिये यह हठधर्मिता उन्होंने कभी नहीं अपनाई। स्वदेशी के उनके आंदोलन को भारतीय पूंजीपतियों का स्पष्ट समर्थन था परंतु उन्होंने इस स्वदेशी के लिये कभी विदेशी मशीनों के बहिष्कार का नारा नहीं दिया। यह उनकी पक्षधरता को स्पष्ट करता है।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;यही वज़ह है कि आज भी भूमण्डलीकरण के खिलाफ गांधी को हथियार बनाने की वक़ालत यथास्थितिवाद के समर्थक और किसी आमूलचूल परिवर्तन के विरोधी ही कह रहे हैं। वे आज किसानों को हल-बैल की तरफ लौटने और गरीबी अपनाने की सलाह दे रहे हैं परंतु किसानांे, मजदूरों और आम जनों की संपत्ति हडपने वालों के प्रति कोई सीधा संघर्ष इनके एजेण्डे में नहीं है। हल-बैल की तरफ लौटकर आज कोई लडाई नहीं लड़ी जा सकती। हां ऐसा क़वायदें किसानों और मजदूरों की लडाई को कुंद जरूर करती है। &lt;strong&gt;&lt;em&gt;उनके असली अधिकारों की लडाई तो शांति, समृद्धि और समाजवाद के बैनर पर ही लड़ी जा सकती है।&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6821438566583405249-3828443078830988388?l=economyinmyview.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://economyinmyview.blogspot.com/feeds/3828443078830988388/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6821438566583405249&amp;postID=3828443078830988388' title='6 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6821438566583405249/posts/default/3828443078830988388'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6821438566583405249/posts/default/3828443078830988388'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://economyinmyview.blogspot.com/2009/09/blog-post_26.html' title='गांधी जी का हिंद स्वराज: एक पुनरुत्थानवादी युटोपिया का घोषणापत्र'/><author><name>अशोक कुमार पाण्डेय</name><uri>https://profiles.google.com/116885901033264770599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh4.googleusercontent.com/-K5s3pyuRhYA/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAADcE/5R8Sp3ae2pk/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6821438566583405249.post-8569689595005266400</id><published>2009-09-22T11:32:00.000-07:00</published><updated>2010-01-10T21:05:52.318-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अर्थशास्त्री'/><title type='text'>नारमन बोरलाग को याद करते हुए</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;हरित&lt;/span&gt; क्रांति&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; के पिता कहे जाने वाले विश्वप्रसिद्ध कृषि वैज्ञानिक &lt;strong&gt;&lt;span style="color:#660000;"&gt;नारमन बोर&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;लाग का गत 12 सितंबर को अमेरिका के टैक्सास शहर के डलास स्थित अपने घर में कैंसर की लंबी बीमारी के बाद देहांत हो गया। टेक्सास विश्वविद्यालय के प्रोफेसर रहे बोरलाग को ‘‘विकासशील देशों में ऊंची पैदावार वाली गेहूं की फ़सलों की नस्लों के विकास तथा कृषि के क्षेत्र में नवोन्मेष द्वारा भूख के खि़लाफ़ संघर्ष में उल्लेखनीय योगदान’’ के लिए 1970 में नोबेल पुरस्कार समिति ने शांति के क्षेत्र में सम्मानित किया गया था - शांति के क्षेत्र में इसलिए कि कृषि के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार नहीं दिये जाते। उस अवसर पर नोबेल शांति पुरस्कार समिति के अध्यक्ष एसी लायने ने कहा था कि &lt;span style="color:#990000;"&gt;&lt;em&gt;‘ इस दौर के किसी अन्य व्यक्ति की तुलना में बोरलाग ने भूखे लोगों को रोटी उपलब्ध कराने में अधिक सहायता की है, हमने उन्हें यह पुरस्कार इस उम्मीद में दिया है कि रोटी की उपलब्धता अंततः दुनिया में शांति भी ले आयेगी।’’&lt;/em&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;उनकी मृत्यु पर शोक व्यक्त करते हुए जाने-माने कृषि वैज्ञानिक और राज्यसभा सदस्य &lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;strong&gt;एम एस स्वामीनाथन&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; ने कहा कि &lt;strong&gt;&lt;span style="color:#660000;"&gt;‘‘1960 के दशक में जब पाॅल और विलियम पैडक ने अपने शोध के बाद स्पष्ट कह दिया था कि भारत को अब दुनिया की कोई ताक़त भूखमरी और अकाल से नहीं बचा सकती थी और पाल एहरिलिच ने अपनी किताब ‘द पापुलेशन बम’ में इसकी पुष्टि कर दी थी तो यह बोरलाग का अथक प्रयास ही था कि हरित क्रांति द्वारा योजनाबद्ध तरीके से उत्पादकता की वृद्धि कर अकाल के उस खतरे को टाला जा सका।’’&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; भारतीय कृषि को उनके योगदान के महत्व को इस प्रकार से भी समझा जा सकता है कि आमतौर पर बुद्धिजीवियों के मरने- जीने से असंबद्ध रहने वाले राजनीतिक समाज के हर कोने से भी उनकी मृत्यु के बाद काफी प्रतिक्रियायें आईं। राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, कृषि मंत्री, बिहार तथा आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्रियों सहित पक्ष- विपक्ष के तमाम महत्वपूर्ण नेताओं ने इस अवसर पर शोक व्यक्त करते हुए भारत के प्रति उनकी सेवाओं को याद किया।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;नार्वेजियन- अमेरिकन समुदाय के बोरलाग का जन्म आयोवा में क्रेस्को के निकट साद में अपने बाबा के कृषि फार्म में हुई थी, जहां अपने जीवन के आरंभिक वर्षों में उन्होंने खेती-बारी और पशुपालन करते हुए बिताये। वहां के हावर्ड काउन्टी के जिस एक कमरे के ग्रामीण स्कूल में उन्होने आठवीं तक की पढ़ाई की थी हव अब नारमन बोरलाग हेरिटेज़ फाउन्डेशन द्वारा संचालित किया जाता है। बाद मंे वह क्रेस्को हाईस्कूल गये और फिर महामंदी के उस दौर में ‘नेशनल यूथ प्रोग्राम’ के तहत चलाये जा रहे प्रशिक्षण कार्यक्रम के तहत उन्हें उच्च शिक्षा के लिए 1933 में मिनेसोटा विश्वविद्यालय में दाखिला मिला। मुख्य प्रवेश परीक्षा में असफल रहने के कारण उन्हें नये-नये खुले जनरल कालेज में प्रवेश मिला जहां पर उनके अच्छे प्रदर्शन के बाद अंततः उन्हें अपने पसंदीदा विषय ‘कृषि वानिकी’ की पढ़ाई करने का मौका मिला। हालांकि स्थितियां अब भी प्रतिकूल थीं और उन्हें अपनी पढ़ाई का ख़र्च उटाने के लिए बार-बार छोटी-मोटी नौकरियां करनी पड़ीं। स्नातक की उपाधि उन्हें 1937 में मिली लेकिन इसके पहले ही वह अमेरिकी वानिकी सेवा में अपनी नौकरी के दौरान देश के कुछ सबसे ग़रीब इलाकों में भूख की भयावहता का अनुभव कर चुके थे। स्नातक के अंतिम वर्षों में प्रसिद्ध कृषि वैज्ञानिक और पादप चिकित्सा के विशेषज्ञ एल्विन चाल्र्स स्टाकमैन के ‘ हमारे खाद्यान्नों को नष्ट करने वाले छोटे घूमंतू कीट ’ विषय पर दिये गये भाषण ने उनकी रुचि की दिशा पादप चिकित्सा की ओर मोड़ दी और कालांतर में अपने परास्नातक तथा शोध के लिए उन्होंने इसे ही आधार बनाया। 1942 में अपना शोध समाप्त करने के बाद उन्होंने ड्यूपोन्ट के डेलवेयर में माइक्रोबायोलाजिस्ट के रूप में काम करना शुरु किया लेकिन द्वितीय विश्वयुद्ध के कारण आगे शोध की उनकी योजना पूरी नहीं हो सकी। विश्वयुद्ध के दौरान अमेरिकी सेना की सहायता के लिए उन्होंने कई छोटे-मोटे प्रयोग किये।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;विश्वयुद्ध के बाद अमेरिकी उपराष्ट्रपति हेनरी वालेस ने &lt;strong&gt;&lt;span style="color:#660000;"&gt;राकफेलर फाउंडेशन&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; की सहायता से मैक्सिको की कैमाचो सरकार की कृषि क्षेत्र में मदद के लिए एक विशेष विभाग ‘द आॅफिस आफ स्पेशल स्टडीज’ की स्थापना की, जिसे मैक्सिको की सरकार के अधीन काम करना था, परंतु इसका संचालन राकफेलर फाउंडेशन द्वारा ही होना था। इस विभाग में अमेरिका तथा मैक्सिको दोनों के ही वैज्ञानिकों को शामिल होना था और इसका मुख्य उद्देश्य वहां ज़मीनों का सुधार, गेहूं तथा मक्के की पैदावार में बढ़ोत्तरी व कीटनाशकों का विकास था। &lt;span style="color:#660000;"&gt;&lt;strong&gt;कैमेचो की इस सहायता के मूल में वहां होने वाले विकास में सहयोग कर अमेरिका के दीर्घकालिक सामरिक तथा आर्थिक हितों को सुनिश्चित करना था।&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; इस विभाग की स्थापना तथा मैक्सिको की कृषि व्यवस्था के ‘सुधार’ के लिए राकफेलर फाउण्डेशन ने स्टाकमैन को चुना। स्टाकमैन ने जे जार्ज़ हरार को इसके प्रोजेक्ट लीडर के रूप में चुना और हरार ने वहां स्थापित सहकारी गेंहू शोध और उत्पादन कार्यक्रम की ज़िम्मेदारी नारमन बोरलाग सौंपी। शुरुआती झिझक के बाद उन्होंने यह जि़म्मेदारी स्वीकार की और यहीं से शुरुआत हुई उनके लंबे सफ़र की कालांतर में जिसका एक पड़ाव भारत भी बना। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;मैक्सिको में बोरलाग ने गेंहू की पैदावार बढ़ाने के लिये फसलों की आनुवांशिकता, उत्पादन संवर्धन, कीट विज्ञान, मृदा विज्ञान आदि के क्षेत्र में व्यापक प्रयोग किये। सोलह वर्षों के लंबे प्रयोगों के बाद वह गेंहू की नई उच्च उत्पादकता वाली &lt;span style="color:#660000;"&gt;&lt;strong&gt;अर्द्ध-बौनी प्रजातियां&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; विकसित कर पाने में सफल हुए जिसकी एक बड़ी विशेषता उच्च स्तरीय रोग प्रतिरोधकता भी थी। अपने अधिकारियों के विरोध के बावजूद उन्होंने इस प्रयोग को कम पैदावार वाले क्षेत्रों से आगे विस्तारित करते हुए साल में गेंहू की दो फसलें बोने के लिए किसानों को प्रोत्साहित किया। इस प्रयोग ने मैक्सिको में गेंहू की पैदावार में उल्लेखनीय वृद्धि की और आयात पर उसका निर्भरता को कम किया। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;1961-62 में बौने गेंहू की प्रजाति को अमेरिका के कृषि मंत्रालय ने अपनी प्रयोगशालाओं में भेजा। उसी दौरान भारत में सबसे पहले पूसा स्थित भारतीय कृषि शोध संस्थान में इस गेंहू की कुछ किस्मों को प्रायोगिक तौर पर उगाया गया। इसके बाद एम.एस स्वामीनाथन के प्रयासों से कृषि मंत्रालय ने राकफेलर फाउण्डेशन के माध्यम सेे बोरलाग को भारत आने का निमंत्रण दिया। मार्च 1963 में वह डा. राबर्ट ग्लेन एण्डरसन के साथ पहली बार भारत आये। &lt;strong&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;अक्टूबर 1963 में 100 किलो उन्नत गेहूं की फसलों के साथ उन्होंने दिल्ली, लुधियाना, कानपुर, पन्तनगर, पुणे और इन्दौर में अपने प्रयोग शुरु किये&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;। 1962 के युद्धकालीन दौर में भारत अकाल जैसी परिस्थितियों से गुजर रहा था और अमेरीका से भारी आयात के बावजूद यहां अनाज की भारी किल्लत थी। बावजूद इसके इन प्रयोगों के पूंजी आधारित होने और सांस्कृतिक अवस्थितियों से मेल न खाने के कारण शुरु में बोरलाग को सरकार का समर्थन नहीं मिला। लेकिन 1965 आते -आते स्थितियां इतनी गंभीर हो गयीं कि सभी आपत्तियों को दरकिनार करते हुए भारत सरकार ने बोरलाग को अपने प्रयोगों को व्यापक पैमाने पर विस्तारित करने की अनुमति दे दी। इस दौर में एन्डर्सन और स्वामीनाथन के साथ मिलकर बोरलाग ने अर्धबौनी प्रजाति के गेहूं के बीजों का व्यापक पैमाने पर भारतीय कृषि में प्रयोग शुरु किया।शुरुआती परेशानियों के बावजूद इन बीजों ने उम्मीद से बेहतर परिणाम दिये।एल आर 64 और सोनोरा 64 के बीजों की उत्पादकता इतनी उच्च स्तर की रही की जल्दी ही ये भारतीय किसानों के लिये परिचित शब्द बन गये।&lt;br /&gt;इन बीजों की मांग का आलम यह था कि 1966 में भारत ने 1800 टन बीजों का आयात किया। इन बीजों और उन्नत तकनीक के प्रयोग से भारत तथा दक्षिण एशिया के कई देशों में गेहूं की पैदावार में अभूतपूर्व वृद्धि हुई। जहां पाकिस्तान 1962 तक खाद्यान्नों के क्षेत्र में पूरी तरह से आत्मनिर्भर हो चुका था वहीं भारत में गेहूं का उत्पादन 1965 के 12।2 मिलियन टन से बढकर 1970 में 20.1 मिलियन टन हो गया और 1974 में हम अपनी गेहूं की जरूरतें खुद पूरी करने लगे थे। इसी सफलता से उत्साहित होकर यू एस एजेन्सी फार इन्टरनेशनल डेवेलपमेण्ट के विलियम गौड ने इस परिघटना को 1968 में हरित क्रांति का नाम दिया - हालांकि बोरलाग कभी इस शब्दावली से सहमत नहीं हुए।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;फिर भी चाहे इसे हरित क्रांति कहें या न कहें लेकिन साठ और सत्तर के दशक की उस परिघटना ने भारतीय कृषि के परिदृश्य को पूरी तरह बदल दिया। एक तरफ उत्पादकता में अभूतपूर्व वृद्धि हुई तो दूसरी तरफ भूमि सुधार, बंजर जमीनों को कृषि योग्य बनाने की योजनायें आदि पूरी तरह बिसरा दी गयीं। जाने-माने कृषि वैज्ञानिक पाल वैगनर के एक अध्ययन के मुताबिक उच्च उत्पादकता वाले इन बीजों पर अत्यधिक निर्भरता के कारण भारत में लगभग 100 मिलियन एकड बंजर जमीनों को कृषि योग्य बनाये जाने की प्रक्रिया शुरु ही नहीं की जा सकी। &lt;span style="color:#006600;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;कृषि की यह परियोजना अपने मूल में बडे़ किसानों और खास फसलों के पक्ष में थी। जमीनों को इन नयी प्रजातियों के योग्य बनाने के लिये तथा इन फसलों को कीटों से बचाने के लिये भारी मात्रा में उर्वरकों और कीटनाशकों की जरूरत पड़ी, जिसके चलते छोटे और सीमांत किसानों के लगातार कृषि मजदूरों में संक्रमण की प्रक्रिया तेज हुई।&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; यही नहीं, इन उन्नत बीजों के प्रयोग से फसलों की विविधता नष्ट हुई। वर्षोंं से बोयी जाने वाली तमाम फसलें परिदृश्य से बाहर हो गयीं और कालांतर में उर्वरकों के नियमित प्रयोग से जमीनें इन फसलों के लिये अयोग्य हो गयीं। खाद और कीटनाशकों पर अत्यधिक निर्भरता का प्रभाव पंजाब और मध्य प्रदेश सहित कई जगहों पर पारंपरिक रूप से उपजाऊ रही जमीनों की उर्वरकता के नष्ट होने के रूप में भी सामने आया है। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;अलबत्ता इन तकनीकों से अमेरीका की बीज, खाद और कीटनाशक बनाने वाली &lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;strong&gt;सिजेंटा और मोसेंटों&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को अंधाधुंध लाभ हुआ। भारत जैसे बडे विकासशील देशों में इनके लिये एक नियमित बाजार का निर्माण हुआ। यही वजह थी की बोरलाग न केवल दक्षिण एशियाई देशों अपितु अमेरीकी सत्ता वर्ग के भी अत्यंत प्रिय रहे और उन्हें समय-समय पर तमाम पुरस्कारों से नवाजा गया। इन्हीं कंपनियों के दबाव में कृषि के पूंजीवादीकरण का जो एजेण्डा लागू हुआ उसकी तार्किक परिणिति भारत में किसानों की आय में भयावह असमानता, पारंपरिक कृषि उत्पादनों के क्षरण और व्यापक पैमाने पर आत्महत्या जैसी परिघटनाओं में हुई। इन नीतियों से मिले तात्कालिक लाभ भी दीर्घजीवी साबित नहीं हुए और 2005 आते-आते एक बार फिर देश में खाद्यान्न संकट की पदचापें सुनायी देने लगीं।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;खाद और कीटनाशकों पर अत्यधिक निर्भरता का प्रभाव पंजाब और मध्य प्रदेश सहित कई जगहों पर पारंपरिक रूप से उपजाऊ रही जमीनों की उर्वरकता के नष्ट होने के रूप में भी सामने आया है। हरित क्रांति के रोल माडल रहे पंजाब पर केन्द्रित अपनी किताब &lt;strong&gt;‘‘ &lt;span style="color:#3333ff;"&gt;वायलेंस आफ ग्रीन रेवोल्यूशन’’&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; में &lt;strong&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;वंदना शिवा&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; ने पंजाब में इसके प्रभावों का विस्तृत अध्ययन किया है। उनका मानना है कि ‘‘तुरंत उच्च उत्पादकता लेने के चक्कर में जिस तरह वैकल्पिक कृषि विकास माडलों की अनदेखी की गयी उसने पंजाब की कृषि अर्थव्यवस्था को दीर्घकाल में नष्ट कर दिया। आज वहां जमीने बंजर हो रही हैं, जैव विविधता नष्ट हो गयी है, भू पट्टी का क्षरण हो रहा है, जमीनों में पोषक तत्वों की मात्रा घट गयी है, भारी मात्रा में छोटे किसानों का पलायन हुआ है, गांवों में गरीबी बढ़़ी है और साथ ही तनाव और हिंसा।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;इस पूरी परिघटना का अगर किसी को फायदा हुआ है तो बस उर्वरक तथा कीटनाशक उद्योग,बडी पेट्रोकेमिकल कंपनियों,कृषि संबंधित औजारों के उत्पादकों, बड़े पुलों के निर्माताओं और बडे भूस्वामियों को। हरित क्रांति का जादू बस नये रोगों और कीटनाशकों के पैदा करने तक सिमट कर रह गया है।’’ &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;पूर्व मे उद्धृत नोबल शांति पुरस्कार समिति के प्रशस्ति पत्र में जिस ‘‘भूख के विनाश और उससे पैदा होने वाली शांति’’ की बात की गयी थी उसे तो आॅकलैण्ड स्थित ‘खाद्य एवं विकास नीति संस्थान’ के कार्यकारी निदेषक एरिक हाॅल्ट गिमनेज द्वारा प्रस्तुत हालिया रिपोर्ट ‘विष्व खाद्य संकटः इसके पीछे क्या है और तो ‘अंर्तराष्ट्रीय खाद्य नीति एवं षोध संस्थान द्वारा प्रस्तुत दूसरी रिर्पोर्ट दुनिया भर के देषों के लिए बनाए गये ‘भूमण्डलीय भूख सूचकांक’ द्वारा पेश आंकड़े ही खारिज कर देते हैं जिनके अनुसार 1974 में विकासषील देषों में 5 करोड़ लोग भूखे थे और दुनिया से भूख मिटाने के सारे दावों के बावज़ूद 1996, 2006 और 2008 में यह लगातार बढकर क्रमषः 8।3 करोड, 8.5 करोड़ और 8.62 करोड़ हो गई।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;साफ है कि अपने सारे नवोन्मेष और सदिच्छाओं के बावजूद बोरलाग &lt;span style="color:#660000;"&gt;&lt;strong&gt;मूलतः और अंततः आम जन नहीं पूंजीवादी &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;जगत के ही सहायक बने। एक पूंजीवादी व्यवस्था में सारे नवोन्मेषों की यह तार्किक परिणिति ही है। इन सबके बावजूद वह एक ऐसे मानवतावादी वैज्ञानिक के रूप में हमेशा याद किये जायेंगे जिसने अनेक विकासशील तथा गरीब देशों को साठ और सत्तर के दशक में अकाल के संकट से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6821438566583405249-8569689595005266400?l=economyinmyview.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://economyinmyview.blogspot.com/feeds/8569689595005266400/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6821438566583405249&amp;postID=8569689595005266400' title='7 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6821438566583405249/posts/default/8569689595005266400'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6821438566583405249/posts/default/8569689595005266400'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://economyinmyview.blogspot.com/2009/09/blog-post_22.html' title='नारमन बोरलाग को याद करते हुए'/><author><name>अशोक कुमार पाण्डेय</name><uri>https://profiles.google.com/116885901033264770599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh4.googleusercontent.com/-K5s3pyuRhYA/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAADcE/5R8Sp3ae2pk/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6821438566583405249.post-4671176021366825776</id><published>2009-09-06T01:20:00.000-07:00</published><updated>2009-09-06T01:26:00.308-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विकल्प का सवाल'/><title type='text'>शांति, समाजवाद और समृद्धि के लिये</title><content type='html'>&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;&lt;em&gt;( यह लेख मेरी शीघ्र प्रकाश्य पुस्तक ' शोषण के अभयारण्य' का अन्तिम अध्याय है। यहाँ इसे  दो खंडों  में पोस्ट  कर  रहा हूँ। प्रस्तुत  है पहला हिस्सा )&lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;विकल्प का सवाल हमेशा ही एक मुश्किल और पेचीदा सवाल होता है। किसी भी आर्थिक प्रणाली की  आलोचना लेखक की अपनी पक्षधरता से तय होती है। जो प्रणाली एक लेखक के लिये अत्यंत प्रिय होती है वह दूसरे के लिये उतनी ही घृणास्पद हो सकती है। हम जब मुक्त बाज़ार पर आधारित आर्थिक माॅडल का विरोध करते हैं तो इसलिये कि देश की बहुसंख्यक आबादी इसके दुष्परिणाम झेल रही है और उसकी कीमत पर मुट्ठी भर लोग अपनी तिजोरियां भर रहे हैं। देश के भीतर आर्थिक असमानता के आधारों का विकास हो रहा है, सामाजिक जीवन में तनाव तथा हिंसा बढ़ते ही जा रहे हैं और बाज़ार के प्रभाव से राजनैतिक जीवन की शुचिता दिन ब  दिन नष्ट होती जा रही है। जिस ‘समानता , भाईचारे और स्वतंत्रता’ के नारे पर पूंजीवाद ने विश्व राजनैतिक पटल पर प्रवेश किया था वह अब ‘ मुनाफ़ा, मुनाफ़ा, मुनाफ़ा’ से प्रतिस्थापित हो गया है। असमानता की बढ़ती खाई, बेरोज़गारी और नाउम्मीदी से ही वह वातावरण निर्मित हुआ है कि देश भर में तमाम हिंसक आंदोलन पैदा हुए हैं। इसके अलावा व्यक्तिगत हिंसा की प्रवृति में भी बढोत्तरी साफ देखी जा सकती है। ज़ाहिर है यह स्थिति हर उस नागरिक को व्यथित करती है जिसकी संवेदनायें अभी जीवित हैं। आज इस लूटखसोट, हिंसा, और असमानता के विकल्प की तलाश का सवाल दरअसल मानवता के भविष्य को बचाने से भी जुड़ा है। मुनाफ़े की हवस ने ही हमारे पर्यावरण को भी तहस- नहस कर दिया है। फ्रांसुआस दोबोन्न ने सही ही कहा है - &lt;strong&gt;‘ दुनिया को बदलना ज़रूरी है ताकि दुनिया बची रहे।’&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;दरअसल, सोवियत संघ के विघटन के बाद से ही विकल्प के सवाल पर एक सतत संभ्रम और उदासीनता की स्थिति दिखाई दे रही है। जहां मुख्यधारा की सभी राजनैतिक दलों ने नव आर्थिक उदारवाद को कमोबेश स्वीकार कर लिया है वहीं वैकल्पिक राजनीति के पैरोकार कोई ऐसा माॅडल प्रस्तुत करने में सफल नहीं रहे हैं जिससे जनता को आकर्षित किया जा सके। फिर से राजकीय पूंजीवाद के नियंत्रण वाले दौर में लौटने से लेकर बीसवीं सदी की क्रांतियों के तर्ज़ पर ही नये परिवर्तनों की जो बातें की जा रहीं हैं, उनकी नीयत पर भले कोई सवाल न हो पर तार्किकता पर तो सवाल हैं ही।&lt;br /&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;नई आर्थिक नीतियों के बिल्कुल आरंभिक दौर से ही लोहियावादी समाजवादी तथा वामपंथी दलों ने पब्लिक सेक्टर के समर्थन को ही नव उदारवाद के विरोध का पर्याय बना दिया। जैसे- जैसे सरकार ने पहले घाटे वाले और फिर दूसरे पब्लिक सेक्टर संस्थानों का विनिवेश करना शुरू किया वैसे- वैसे ही इन दलों ने उन्हें जस का तस बचाये रखने के लिये प्रयास तेज़ किये। इन दलों से संबद्ध यूनियनों ने तमाम छोटे - बडे आंदोलन भी किये। देखा जाये तो यह स्वाभाविक भी था और उचित भी। लेकिन इस अंधविरोध से जो समस्यायें पैदा हुईं वे भी कम गंभीर नहीं थीं। पहला तो यह कि ज़्यादातर पब्लिक सेक्टर संस्थान जिस तरह घाटे में चल रहे थे और साथ ही भ्रष्टाचार तथा अकुशलता का पर्याय बन चुके थे, उन्हें और चला पाना संभव ही नहीं था। सेवायें प्रदान करने वाली संस्थायें, जैसे राज्यों के विद्युत बोर्ड आदि इस क़दर अलोकप्रिय हो चुके थे कि अब जनता इससे ऊब चुकी थी। ऐसे में उसे निजीकरण ही बेहतर विकल्प लगा। कारण यह कि उसे बस  पुराने और नये में ही चुनना था। चूंकि ये दल और इनकी यूनियनें कोई और संभव विकल्प प्रस्तुत करने की जगह बस उन्हें ही पुनर्जीवित करने के प्रयास में लगी रहीं, उन्हें जनता का कोई समर्थन हासिल नहीं हो सका। इसके अलावा इस क़वायद ने यह ग़लत समझ स्थापित की कि पब्लिक सेक्टर का वह माॅडल अपने आप में ‘समाजवादी’ माडल था, जबकि स्पष्ट तौर पर वह राज्य पूंजीवाद का माॅडल था। बदलते समय के साथ पूंजीवाद ने स्वयं को अद्यतन करते हुए उस अलोकप्रिय तथा अलाभकारी माॅडल की जगह नया माॅडल प्रस्तुत किया, मीडिया के माध्यम से उसे स्थापित किया और उसे लागू करने में सफल रहा जबकि वामपंथी तथा समाजवादी ताक़तों द्वारा खु़द को प्रगतिशील कहने के बावजूद नये समय में कोई नया विकल्प प्रस्तुत करने की जगह पूंजीवाद द्वारा कचरे में डाल दिये गये माॅडल को समाजवादी माॅडल के रूप में प्रस्तुत किया गया। इसने स्वाभाविक तौर पर लोगों को यह कहने का मौका दिया कि अब समाजवाद गुज़रे जमाने की बात हो गया है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;गैर संसदीय वाम ने भी कोई सार्थक विकल्प सुझाने की जगह अपना सारा ध्यान संसदीय वाम की कठोरतम संभव आलोचना, जंगलों के भीतर तथा बाहर जनसंघर्ष के नाम पर हिंसक आंदोलनों तथा एकदम जड़सूत्रवादी रवैया अपनाते हुए ‘ क्रांति के साथ ही सब समस्या हल होगी’ जैसी बातें कीं। इस तरह के माहौल में किसी व्यापक तथा जनपक्षधर वैकल्पिक आंदोलन के अभाव में पूंजीपति वर्ग अपनी मनमानी करने में सफल रहा। छुट्पुट विरोधों के चलते थोड़ी देर- सबेर हुई, थोड़ी लेन- देन पर अंततः वैश्वीकरण का अश्वमेध लगभग निर्बाध चलता रहा। हद तो यह है कि कई दशकों से वाम शासित पश्चिम बंगाल में भी जब पब्लिक सेक्टर इकाईयों की अकुशलता तथा घाटा चरम सीमा पर पहुंच गये तो इसके प्रतिस्थापन और ‘विकास’ के लिये उन्हें भी निजी पूंजी के अलावा कोई और रास्ता नहीं सूझा। ऐसे में वाम के इस धड़े के पास नव उदारवाद की आलोचना का नैतिक अधिकार रह ही कहां गया?&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6821438566583405249-4671176021366825776?l=economyinmyview.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://economyinmyview.blogspot.com/feeds/4671176021366825776/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6821438566583405249&amp;postID=4671176021366825776' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6821438566583405249/posts/default/4671176021366825776'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6821438566583405249/posts/default/4671176021366825776'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://economyinmyview.blogspot.com/2009/09/blog-post.html' title='शांति, समाजवाद और समृद्धि के लिये'/><author><name>अशोक कुमार पाण्डेय</name><uri>https://profiles.google.com/116885901033264770599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh4.googleusercontent.com/-K5s3pyuRhYA/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAADcE/5R8Sp3ae2pk/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6821438566583405249.post-8229722994830681463</id><published>2009-08-30T09:09:00.000-07:00</published><updated>2011-11-24T06:46:52.610-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='खुदरा बाज़ार'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='समयांतर'/><title type='text'>अब नज़र खुदरा बाज़ार पर</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: #990000;"&gt;पूर्ति और वितरण दोनों को नियंत्रित कर कंपनी सस्ता माल ख़रीद कर उसे ऊंची कीमतों पर बेच सकती है।&lt;br /&gt;निक राबिन्स, ईस्ट इण्डिया कंपनी संबधित अपने लेख ‘द वल्र्डस फस्र्ट मल्टीनेशनल’ में, द न्यू स्टेट्समैन, 13/12/२००४&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: #990000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;खुदरा बाज़ार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का मामला एक बार फिर से सुर्खियों में है। जहाँ एक तरफ अप्रत्याशित रूप से जीत कर आई कांग्रेस सरकार ने आरंभ से ही इस क्षेत्र में 26 से 49 फ़ीसदी तक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति देने के पर्याप्त संकेत दिये हैं , वहीं इस विषय पर गठित एक संसदीय समिति ने किराने के सामान, फल और सब्ज़ियों के खुदरा व्यापार के क्षेत्र में विदेशी ही नहीं अपितु बडे़ देशी कारपोरेट पूंजीपतियों के प्रवेश को पूरी तरह प्रतिबंधित किये जाने की अनुशंसा की है। यही नहीं, मुरली मनोहर जोशी की अध्यक्षता में गठित इस 31 सदस्यीय समिति ने एक कदम आगे बढ़कर देश में पूंजीपतियों द्वारा खोले जा रहे दीर्घाकार ‘माॅलों’ में उपभोक्ता वस्तुएं बेचे जाने पर भी अंकुश लगाये जाने की भी ज़ोरदार वक़ालत की है। पिछले दरवाज़े से फ्रेंचाइजी के सहारे खुदरा बाज़ार में प्रवेश पर निगरानी रखने के लिए ‘कैश एण्ड कैरी’ लाइसेंसों पर भी नज़र रखने की बात की गयी है, हालांकि इन बंद दरवाज़ों के बीच एक खिड़की खुली रखी गयी है- कमेटी का प्रस्ताव है कि ‘ खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश लागू करने से पहले सरकार को अपने क़ानूनी तथा नियामक ढांचे को दुरुस्त कर लेना चाहिये’। जानने वाले इन खिड़कियों की हक़ीक़त ख़ूब जानते हैं! आईये सबसे पहले देखते हैं कि मामला क्या है।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;नब्बे के दशक में नई आर्थिक नीतियों के बेहद आरम्भिक दौर में ही जब विदेशी पूंजी निवेश के लिए रास्ते खोले गये तो कृषि के बाद देश के इस दूसरे सबसे बड़े असंगठित क्षेत्र पर भी देशी- विदेशी पूंजीपतियों की गिद्धदृष्टि पड़ गई थी। फलस्वरूप 1993 में ही तत्कालीन विŸामंत्री मनमोहन सिंह ने इस क्षेत्र में क़ानूनों में आवश्यक फेरबदल किये थे। इसी दौर में बहुराष्ट्रीय कंपनी ‘डेरी फार्म ’ ने सबसे पहले भारतीय बाज़ार में प्रवेश किया लेकिन नरसिम्हाराव की सरकार के पतन के बाद सŸाा में आई संयुक्त मोर्चा सरकार के दौर में वामपंथी दलों के दबाव में तत्कालीन विŸामंत्री पी। चिदंबरम को 1996 में क़ानूनों में फिर से फेरबदल कर खुदरा बाज़ार क्षेत्र में विदेशी निवेश पर रोक लगानी पड़ी। नवउदारवाद की प्रचंड समर्थक भारतीय जनता पार्टी आरंभ से ही इस क्षेत्र में विदेशी निवेश को लेकर उतनी मुखर नहीं रही है। छोटे दुकानदारों के अपने पुराने वोट बैंक को देखते हुए पार्टी का यह स्टैंड कोई भी समझ सकता है। लेकिन यह समझ लेना नादानी होगी कि दक्षिणपंथ और वामपंथ का यह विरोध यकसां है। अपने शासनकाल में अनेकों बार एनडीए के मंत्रियों ने इसे लागू करने के संकेत दिये। इस मामले पर भाजपा का पूरा दृष्टिकोण विŸामंत्री के पूर्व सलाहकार रहे और संघ के भीतर स्वदेशी लाबी के आलोचक रहे मोहन गुरुस्वामी के इस संदर्भ में लिखित एक शोधपत्र ‘ एफ डी आई इन इण्डियाज़ रिटेल सेक्टर: मोर बैड दैन गुड’ (देखें सेंटर फार पालिसी आल्टरनेटिव की वेबसाईट) की अनुशंसाओं  से स्पष्ट हो जाता है। यहां वह खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश के तमाम कुप्रभावों का जिक्र करते हुए कहते हैं कि ‘ भारतीय खुदरा क्षेत्र की समस्याओं का अध्ययन करने के लिए एक राष्ट्रीय आयोग का गठन किया जाना चाहिए ताकि यह ऐसी नीतियां बना सके जो उन्हें प्रत्यक्ष विदेशी निवेश से निपटने में सक्षम बना सके - जब कभी वे आयेंगे... (.यानि आना तो तय हैं!) ’ साथ ही वह चाहते हैं कि ‘विदेशी कंपनियों की प्रवेश प्रक्रिया धीमी होनी चाहिए और सामाजिक सुरक्षात्मक उपायों का पूरा ध्यान रखा जाना चाहिए। शुरूआती दौर में उन्हें केवल मेट्रो शहरों में सुपरमार्केट खोले जाने की इजाज़त दी जानी चाहिए।’ संघ की दूसरी लाईन के प्रवक्ता और स्वदेशी जागरण मंच के नेता गुरूमूर्ति , जो प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के तीव्र विरोध के लिए जाने जाते हैं ने 26 जनवरी 1998 में ए. एस. पनीरसेल्वन को दिये गये एक साक्षात्कार में ‘ भाजपा की आर्थिक प्राथमिकतायें गिनाते हुए विदेशी निवेश के बारे में कहा कि -‘उपभोक्ता क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश नहीं होना चाहिये। बहरहाल इसके लिए अपने आर्थिक हितों के प्रति पूर्वाग्रहित हुए बिना रास्ते निकाले जा सकते हैं। 1970 के राष्ट्रीयकरण के दौर में जिस तरह यूनिलीवर को आने की अनुमति दी गयी वही माडल अपनाया जाना चाहिये। उनका दुख है कि हममें मोलभाव करने की दक्षता की कमी है।’ साफ़ है कि ये सारी खिड़कियां विरोध के पूरे ‘आख्यान’ का प्रतिआख्यान रचती हैं और यही उस सच का असली सच है। यही नहीं यह जो विरोध है वह भी केवल विदेशी पूंजी का है। देशी पूंजीपतियों के इस बाज़ार पर कब्ज़े को लेकर कहीं कोई संशय नही है  मानो इस क्षेत्र पर उनके कब्ज़े से खुदरा बाज़ार में लगे पांच करोड़ से अधिक लोगों के रोज़गार और शहरों के पारिस्थितिक संतुलन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;दरअसल स्वदेशी जागरण मंच का यह पूरा ‘विरोध’ इसी मोलभाव को बढ़ाने और इसके हितों को भारतीय पूंजीपतियों के हितों में मोड़ने का आयोजन है जिसमें आमजन के लिए कोई जगह नहीं इसीलिए तो बंेगलूर में ज़र्मन रिटेलर मेट्रो एजी के आने पर उसके विरोध में लिखे हुए लेख (जो उनकी आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध है) में बड़ा हिस्सा बजाज और दूसरे देशी पूंजीपतियों के प्रति उनकी वफ़ादारी और उनके हितों के लिए गुरूमूर्ति द्वारा निभाई गई बिचैलिये की भूमिका के महिमामण्डन को समर्पित है।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;खैर, इन सबके बीच भारतीय मध्यवर्ग का बड़ा आकार रिटेल चेन चलाने वाले वालमार्ट, कैरीफोर, टेस्का जैसे बहुराष्ट्रीय निगमों को हमेशा से आकर्षित करता रहा और भारतीय सरकार पर भीतर और बाहर दोनों तरफ से दबाव बनाये जाते रहे। यह दबाव विश्व व्यापार संगठन के दोहा चक्र के दौरान अपने चरम पर पहुंच गया जब भारत को सीधे-सीधे धमकी दी गयी कि यदि खुदरा क्षेत्र में पूंजी निवेश पर रोक नहीं लगायी गई तो उसे गैट के तहत दी जा रही मदद रोक दी जायेगी और उसके खि़लाफ़ प्रतिबंधात्मक कार्यवाही भी की जायेगी। यह दबाव कारगर साबित हुआ और दसवीं पंचवर्षीय योजना की मध्यावधि समीक्षा में सरकार ने इस क्षेत्र को आंशिक रूप से खोलने की घोषणा की। वामपंथियों तथा कुछ अन्य समर्थक दलों की आपŸिायों को नज़रअंदाज करते हुए सरकार ने 10 फरवरी 2006 को ज़ारी प्रेस नोट के द्वारा कुछ शर्तों के साथ ‘एकल’ ब्राण्ड के उत्पादकों को 51 फ़ीसदी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की छूट दे दी। इसके बाद थोक व्यापार तथा गोदामों में भंडारण के क्षेत्र में भी शतप्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की छूट दे दी गई। इससे बहुराष्ट्रीय निगमों के लिये पिछले दरवाज़े खुल गये। इस सीमित, परंतु महत्वपूर्ण सफलता से उत्साहित वालमार्ट ने सुनील मिŸाल की भारती इंटरप्राईजेज के साथ एमओयू पर हस्ताक्षर किये जिसके तहत वालमार्ट बैकएण्ड( यानि वस्तुओं की आपूर्ति) संभालेगा और भारती फ्रंटएण्ड (यानि वितरण की व्यवस्था)। लेकिन यह सीमित छूट लूट की उनकी महात्वाकांक्षा को पूरा नहीं कर सकती तो और छूट के लिये दबाव बनाने की प्रक्रिया ज़ारी है। विदेशी कंपनियों की इस सक्रियता के बरअक्स भारतीय उद्योग घरानों ने भी इस क्षेत्र में पूरी तैयारी के साथ प्रवेश किया। गोयनका के आरपीजी ग्रुप, किशोर बियानी के यूचर ग्रुप, वाडिया ग्रुप, रहेजा ग्रुप और आदित्य बिड़ला ग्रुप के अलावा इस क्षेत्र में सबसे बड़ा नाम है मुकेश अंबानी के रिलायंस का जिसने देश में 25 हज़ार करोड़ से ज़्यादा का निवेश कर डेढ़ हज़ार शहरों में एक हज़ार हाईपर मार्केट, तीन हज़ार सुपर मार्केट और पांच सौ से अधिक स्पेशियालिटी स्टोर खोलने की योजना को मूर्त रूप देना शुरू कर दिया है। रिलायंस की विशिष्टता इस तथ्य में भी अंतर्निहित है कि दूसरों की तुलना में काफ़ी पहले ही उसने इस क्षेत्र के सबसे लाभकारी क्षेत्र खाद्यान्न, फल और सब्ज़ी व्यापार के क्षेत्र में प्रवेश के लिए पूर्ति की पूरी तैयारी कर ली थी। वायदा बाज़ार के जरिए इसने देश भर से भारी मात्रा में इन उत्पादों की ख़रीदारी की है। इनकी कार्यपद्धति वालमार्ट की ही तरह सीधे-सीधे पूर्ति और वितरण दोनो क्षेत्रों पर पूर्ण नियंत्रण कर लेने की है। पिछली सरकार के दौरान कृषि उत्पाद विपणन समिति क़ानूनो (एपीएमसी) में हुए सुधारों तथा ठेके पर कृषि व्यवस्था के पर्याप्त प्रोत्साहन ने इनका काम और आसान कर दिया है। फलस्वरूप प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के बिना भी भारतीय खुदरा बाज़ार में संस्थागत क्षेत्र की भागीदारी तेज़ी से बढ़ रही है। 1999 में कारपोरेट जगत की इस क्षेत्र में कुल भागीदारी थी पंद्रह हज़ार करोड़ रूपये जो 2005 में बढ़कर पैंतीस हज़ार करोड़ हो गई और अब भी यह 40 प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से बढ़ रही है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार संगठित क्षेत्र 2003 के दो प्रतिशत से बढ़कर 2008 तक पांच प्रतिशत खुदरा व्यापार पर कब्ज़ा जमा चुका है। इस वृद्धि का सीधा अर्थ है 42 मिलियन छोटे दुकानदारों का लगातार खेल से बाहर होता जाना। इस तथ्य की तस्दीक तो अपनी हालिया किताब ‘’द वल्र्ड इज़ लैट’ में थामस एल फ्रीडमैन भी करते हैं। देश में कुल रोज़गार का सात फ़ीसदी रोज़गार उपलब्ध कराने वाले इस क्षेत्र की तबाही का असर पहले ही रोज़गारविहीन विकास और मंदी की मार से जूझ रहे इस देश पर क्या होगा इसका अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है। इसके अन्य कुप्रभावों पर पहले भी विस्तार से लिखा जा चुका है जिसके चलते न सिर्फ भविष्य में एकाधिकार जमाकर ये कंपनियां मनमानी लूट मचायेंगी बल्कि पहले से बदहाल आम आदमी के लिए रोटी दाल को और अधिक मुश्किल बना देंगी।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;इस पूरी अवधारणा तथा निगमों की कार्यपद्धति को समझने के लिए रिलायंस के अनुभव को देखा जा सकता है। रिलायंस के काम करने का तरीका बिल्कुल साफ है - वह उत्पादक और उपभोक्ता के बीच की पूरी कड़ी (आढ़तिये, कमीशन एजेण्ट,थोक व्यापारियों और खुदरा व्यापारी) पर कब्ज़ा जमा लेना चाहता है। इस प्रक्रिया में दावा किया जाता है कि ‘कुटिल दलालों’ से यह मुक्ति एक तरफ़ किसानों को सही दाम दिलायेगी तो दूसरी तरफ़ उपभोक्ता को भी उचित क़ीमत पर सामान उपलब्ध करायेगी। लेकिन हक़ीक़त इसके उलट है- रिलायंस ने अब तक जो भी अनाज़, फल और सब्ज़ियां खरीदे हैं वे किसानों से न ख़रीद कर मण्डियों से ही ख़रीदे हैं, वह भी दलालों के माध्यम से। ऐसे में उसने सिर्फ़ थोक और खुदरा व्यापारियों की भूमिका ही समाप्त की है जिससे किसानों को कोई लाभ नहीं मिलने वाला। उपभोक्ता के लिए जो क़ीमत है वह थोक और खुदरा क़ीमतों के बीच की ही है और अगर कहीं इससे कम है तो वह कृत्रिम रूप से रखी गयी है जिसका उद्देश्य छोटे व्यापारियों की प्रतिस्पद्र्धा को पूरी तरह नष्ट करना है जिससे भविष्य में बाज़ार पर पूरी तरह कब्ज़ा जमाकर मनमानी लूट की जा सके। थोक और खुदरा क़ीमतों के बीच का यह मामूली अंतर भी बड़े स्टोरों के रखरखाव के भारी ख़र्च के कारण लंबे समय तक बनाये रख पाना संभव नहीं होगा। दूसरे अगर यह मान भी लिया जाये कि भविष्य में रिलायंस किसानों से सीधे अनाज़ ख़रीद सकेगा तो भी किसानों की स्थिति कतई बेहतर होने की उम्मीद नहीं है। अपनी विशाल मोलभाव क्षमता और बाज़ार पर एकाधिकार के चलते रिलायंस (या कुछ अन्य कंपनियांे के साथ बना उसका कार्टेल) किसानों से मनचाही कीमतों पर अनाज़ खरीदने में आढ़तियों से ज्यादा कारगर होगा और मुनाफ़े की अंधी भूख के कारण यही अनाज़ ऊंची क़ीमतों पर वातानूकूलित दुकानों में बिकेगा। दूसरे तरीके ठेके की खेती के बारे में तो अब हम सब जानते हैं। इस बारे में वालमार्ट के बारे में अमेरिका में किये गये एक सर्वे की रिपोर्ट हमारे लिए आंख खोलने वाली हो सकती है जिसमें कहा गया कि ‘अमरिका के जिन क्षेत्रों में वालमार्ट स्टोर खोले गये वहां के किसान तुलनात्मक रूप से अधिक ग़रीब हो गये।’&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;लेकिन यह भी तस्वीर का एक पहलू ही है। यदि इस प्रक्रिया के व्यापक सामाजार्थिक प्रभावों की विवेचना करें तो कई दूसरे भयावह तथ्य सामने आते हैं। सामान्यतः ये स्टोर नगरीय क्षेत्रों के उच्च तथा उच्चमध्यवर्गीय रिहाइशी इलाकों में ही खोले जा रहे हैं। छोटी दुकानों के उलट यहां एक साथ बड़ी मात्रा में ख़रीदारी को प्रोत्साहन दिया जाता है। स्पष्ट है कि निम्नमध्यवर्गीय तथा ग़रीब उपभोक्ता अब भी छोटी दुकानों से ही सामान ख़रीदेगा। इन कंपनियों द्वारा भारी मात्रा में बेहतर गुणवŸाा के सामान ख़रीद लिये जाने का अर्थ होगा बाज़ार में ऐसे सामानों की कमी और कम गुणवŸाा वाले सामानों की मांग तथा क़ीमतों में बढ़ोŸारी। अतः जहां उच्च तथा उच्चमध्यवर्गीय वर्ग बेहतर गुणवŸाा के सामान, कम से कम आरंभिक दौर में, सस्ती कीमतों पर खरीद सकेगा वहीं निम्नमध्यवर्गीय तथा ग़रीब उपभोक्ता घटिया उत्पाद बढ़ी क़ीमतों पर ख़रीदने पर बाध्य होगा जिससे पहले से व्याप्त आर्थिक विषमता के आधारों में और वृद्धि होगी। जालंधर में रिलायंस ने यही किया है। यहां वह पहले भारी मात्रा में आढ़तियों से फल और सब्ज़ियां ख़रीदता है फिर उनमें से अच्छे-अच्छों को छांट कर बाकी को उसी दाम पर पुनः आढ़तियों को बेच दिया जाता है जिसे छोटे व्यापारी ऊंची कीमतों पर ख़रीदने के लिये बाध्य होते हैं (देखें फ्रंटलाईन, 13 जुलाई,2007)&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;मुनाफ़े की यह अपार संभावना ही निगमों के इस आकर्षण का कारण हैं। 27 जून 2008 को प्रस्तुत एक रिपोर्ट  के अनुसार वर्ष 2011 तक भारत में खुदरा क्षेत्र मे संगठित व्यापार का परिमाण 50 बिलियन अमेरिकी डाॅलर के बराबर हो जायेगा। 2007 से 2015 के बीच मॅालों की संख्या में वृद्धि की दर 18।9 प्रतिशत रहेगी और ग्रामीण बाज़ारों का परिमाण बढ़कर कुल बाज़ार का आधा हो जायेगा। रिपोर्ट के अनुसार इस वृद्धि में सबसे बड़ा हिस्सा होगा खाद्य पदार्थो और किराना संबधित वस्तुओं का। इसी आधार पर भारत को रिटेल व्यापारियों  केे लिये सबसे आकर्षक  गंतव्य के रूप में चिन्हित किया गया है। और भारत को जारी यह इकलौता सर्टिफिकेट नहीं है- हाल ही में अमेरिका स्थित वैश्विक प्रबंध सलाहकार फर्म एटी कैयर्नी द्वारा ज़ारी एक रिपोर्ट में यही सब दोहराया गया हैं। इसके अनुसार विश्व की 30 उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं में रिटेल क्षेत्र में निवेश के लिए भारत सबसे आर्कषक स्थान है। कैयर्नी द्वारा निर्मित भूमण्डलीय रिटेल विकास सूचकांक में भारत को रूस, चीन, यूएई और सऊदी अरब से ऊपर रखा गया है। पिछले वर्ष जारी कैयर्नी के रिर्पोट में भारत का स्थान दूसरा था। प्रतिवर्ष जारी होने वाली इस रिपोर्ट के पिछले पांच में से चार बार भारत को पहले स्थान पर रखा गया है। इस रिपोर्ट में यह उम्मीद भी जारी की गयी है कि जल्दी ही इस क्षेत्र की बची-खुची बाधायें दूर कर प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की राह आसान कर दी जायेगी जिससे दुनिया के बड़े रिटेल चेन चलाने वाले निगमों को यहां प्रवेश का मौका मिलेगा।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;सरकार भी इन निगमों को उपकृत करने के लिये बेहद उत्सुक है। वैसे भी कांग्रेस के मन में 1993 से ही इसे लेकर कोई विशेष दुविधा नहीं रही है। यूपीए के पिछले कार्यकाल में भी इसके लिए काफी प्रयास किये गये लेकिन वामदलों के कड़े रूख के कारण यह संभव नहीं हो पाया। प्रधानमंत्री की उत्सुकता 29/06/2005 को नये मंत्रियों के शपथग्रहण समारोह के बाद पत्रकारों के सवालों के जवाब में झलकती है जब उन्होंने कहा था कि ‘हम अपने वामपंथी साथियों को खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के लिए मना लेंगे...मुझे उनकी राष्ट्रभक्ति पर पूरा विश्वास है’  और अब जबकि वामपंथियों का दबाव भी नहीं है तो मनमोहन सिंह अपनी ‘राष्ट्रभक्ति’ का अचूक प्रदर्शन कर सकते हैं। पिछली फरवरी में ही इसमें कुछ परिवर्तन किये गये और अब गत दो जून को दिये गये एक बयान में वाणिज्य और उद्योग मंत्री आनंद शर्मा ने सरकार की प्रतिबद्धता को स्पष्ट कर दिया। इस बात की पूरी उम्मीद की जा रही है कि आगामी बजट में खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में 26 से 49 फ़ीसदी छूट दे दी जायेगी और बहुराष्ट्रीय निगम पूरे धज के साथ मुख्यद्वार से प्रवेश कर सकेंगे।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;ऐसे में यह मुश्किल ही लगता है कि यह रिपोर्ट सरकार के निश्चय पर कोई प्रभाव डाल पायेगी। संसद में अपनी बेहद कमज़ोर स्थिति और बंगाल से लेकर केरल तक अपने ही दल के भीतर मचे घमासान से परेशान सीपीएम के नेतृत्व में संसदीय वाम इस मसले पर रस्मी विरोध से आगे बढ़ पायेगा, ऐसा मानने का कोई आधार नज़र नहीं आता। रहा सवाल भाजपा का तो अमेरिका के सबसे विश्वस्त चाकर से ऐसी उम्मीद की ही नहीं जा सकती। संसद के बाहर और भीतर भले ही यह अपने परंपरागत वोटबैंक को बचाने के लिए संघर्ष की मुद्रा में नज़र आये लेकिन वह किसी बड़ी लड़ाई में तब्दील नहीं हो पायेगी। महिला आरक्षण के मुद्दे पर ज़हर खाने को तैयार समाजवादी ऐसे मौकों पर कुछ बेहतर खाना पसंद करते हैं तो बात-बात पर तोड़-फोड़ मचाने वाले संघ के ‘राष्ट्रभक्त‘ पतली गली से निकलना। ज़ाहिर है कि कांग्रेस की इस सरकार के दौर में नवउदारवाद के घोड़े को सरपट दौड़ना है। पर यह भी तय है कि देर-सबेर जनता का आक्रोश विभिन्न रूपों में दिखाई देगा ही। देखना यह है कि ख़ुद को जनपक्षधर कहने वाली ताक़तें उसे कितने सकारात्मक रूप में प्रयोग कर पाती हैं।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;(यह आलेख समयांतर के पिछले अंक में छपा था)&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6821438566583405249-8229722994830681463?l=economyinmyview.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://economyinmyview.blogspot.com/feeds/8229722994830681463/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6821438566583405249&amp;postID=8229722994830681463' title='13 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6821438566583405249/posts/default/8229722994830681463'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6821438566583405249/posts/default/8229722994830681463'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://economyinmyview.blogspot.com/2009/08/blog-post_30.html' title='अब नज़र खुदरा बाज़ार पर'/><author><name>अशोक कुमार पाण्डेय</name><uri>https://profiles.google.com/116885901033264770599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh4.googleusercontent.com/-K5s3pyuRhYA/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAADcE/5R8Sp3ae2pk/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>13</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6821438566583405249.post-6982452092422447979</id><published>2009-08-23T08:34:00.000-07:00</published><updated>2009-08-23T08:46:11.582-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='नंदीग्राम'/><title type='text'>नंदीग्राम के सवाल</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;(&lt;em&gt; नन्दीग्राम परिघटना के तुरन्त बाद लिखा यह आलेख इतिहासबोध में प्रकाशित हुआ था)&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;14 मार्च 2007 हमारे समकालीन इतिहास का एक निर्णायक मोड़ है । हम चाहें न चाहें, समर्थन करें या विरोध, नंदीग्राम में इस दिन घटित घटनाक्रम ने नई आर्थिक नीतियों के समर्थकों तथा विरोधियों दोनों ही के लिये, एक सर्वथा नवीन परिदृष्य निर्मित कर दिया है । अपने तमाम अंर्तविरोधों और विचलनों के बावजूद इसके पहले तक सीमित अर्थांे में ही सही, संसदीय वाम व्यापक स्तर पर भूमण्डलीकरण तथा आर्थिक उदारीकरण का विरोधी माना जाता था । सेज़ के प्रश्न पर भी राजस्थान, उड़ीसा सहित देश के तमाम हिस्सों में विरोध का सबसे मुखर स्वर इसी का सुनाई दे रहा था । संप्रग सरकार के समर्थक वामदल संसद के भीतर और बाहर दोनों जगह आर्थिक मुद्दों पर दबाव बनाने में सफल हो रहे थे। विनिवेष की प्रक्रिया तो लगभग रुक ही गई थी, पेटेण्ट के मुद्दे पर भी माशेलकर कमीशन की अनुशसायें स्वीकार नहीं हो सकीं और इसी वजह से वामपंथियों के प्रति अपनी स्पष्ट घृणा के बावजूद मीडिया तथा दक्षिणपंथी दल कुछ घटिया आक्षेपों तथा रटे रटाये सूत्रों से अधिक कुछ भी कह पाने में सफल नहीं हो पा रहे थे । हालांकि इसका अर्थ यह भी नहीं है कि यह वामपंथी खेमा वाकई आमजन की पीड़ाआंे की आवाज बन गया था । अनेक मुद्दों, ख़ास तौर पर किसानों की आत्महत्याओं के संदर्भ में कृषि नीति पर पुर्नविचार हेतु यह सरकार पर कोई दबाव बनाता नहीं दिख रहा था । लेकिन कुल मिलाकर आर्थिक नीतियों के संदर्भ में यह ज़रूर कहा जा सकता है कि नन्दीग्राम के पहले संसदीय वामपंथ की भूमिका संसद के भीतर एक प्रभावी प्रेशर ग्रुप की तो थी ही... पर नन्दीग्राम ने एक झटके में पूरा परिदृश्य बदल दिया ।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;नंदीग्राम की घटना पर इतना कुछ लिखा जा चुका है कि अब उसका विस्तृत विवरण देना कतई ज़रूरी नहीं । पूरे देष ने उन लौहमर्षक घटनाओं की विभिन्न समाचार चैनलों पर ष्लाईव देखा । ह़तों समाचार पत्र-पत्रिकायें सूक्ष्मतम विवरणों और चित्रों से भरे रहे । राजनैतिक क्षेत्र के हर कोने, धुर दक्षिणपंथियों से लेकर नक्सलवादी संगठनों तक से उग्रतम प्रतिक्रियायें आई । बुद्धिजीवी वर्ग भी अछूता न रहा, जहां पूंजीवादी लिक्खाडों के लिये यह वाम के अधोपतन के सेलिबे्रषन का समय था वही क्रा्रंतिकारी वाम के लिये वर्षांे से लगाये जा रहे अपने आरोपों के सत्य साबित होने का ऐतिहासिक अवसर । सुमित सरकार, तनिका सरकार जैसे प्रतिबद्ध लेखकों के लिये यह मोहभंग की स्थिति थी तो महाष्वेता देवी जैसी लोगों के लिये दुःख एवं विक्षोभ की पराकाष्ठा और इन सबके बीच जनता का एक बड़ा तबका, जो वामपंथी तो नहीं था, लेकिन देष के अलग-अलग हिस्से में इन्हीं दलों के नेतृत्व में सेज़ तथा दूसरे मुद्दों पर संघर्षरत था या फिर इन संघर्षो से सहानुभूति रखता था, अवसन्न रह गया। यह निरा मोहभंग नहीं था-आस्था के अंतिम अवलम्ब का धाराषायी होना था....और ऐसे में इस घटना का प्रभाव भी स्थानीय नगरपालिका चुनाव तक सीमित नहीं रहा। नन्दीग्राम में सेज़ और इसके बहाने आर्थिक उदारवाद के आड़ में ग़रीबों को मुक्त बाज़ार के रहमोकरम पर छोड़ पूंजीपतियों को संरक्षण देने वाली नीतियों के खिलाफ़ देश भर में चल रहे स्वतःस्फूर्त आंदोलनों के पांव के नीचे से ज़मीन सरका दी ।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;अगर नंदीग्राम के ठीक पहले के राजनैतिक परिदृश्य को देखें तो पूरे देश में सेज़ के विरूद्ध एक माहौल सा बनता दिखाई दे रहा था । उत्तर प्रदेश में रिलांयस को ज़मीन दिये जाने के विरूद्व किसानों का संघर्ष उफान पर था (विष्वनाथ प्रताप सिंह तथा राज बब्बर के अवसरवादी नेतृत्व के धोखे से यह आंदोलन भले असफल रहा लेकिन प्रदेष में मुलायम सरकार की कब्र खोदने में इसकी भूमिका को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता), बंबई के पास रिलांयस की प्रस्तावित योजना के खिलाफ संघर्ष धीरे-धीरे उग्र हो रहा था और इसके नेता विदर्भ के किसानों की तरह आत्महत्या करने की जगह आखिरी सांस तक संघर्ष की बात कर रहे थे, उड़ीसा में पास्को परियोजना से प्रभावित आदिवासियों के विरोध प्रदर्षनों पर गोलीबारी की घटना से पूरा आदिवासी समाज ही उद्वेलित नही था बल्कि भाजपा तथा बीजद का गठबंधन भी प्रभावित हुआ था, राजस्थान में सेज़ तथा पानी के मुद्दे पर बड़े आंदोलन उठ खड़े हुये थे, (श्रीगंगानगर में तो पुलिस फायरिंग में कई किसानों के मारे जाने के बाद स्थिति बेहद तनावपूर्ण हो गई थी) और नरेन्द्र मोदी के कुख्यात अभयारण्य में भी इन्हीं मुद्दों पर असंतोष के बादल साफ़ दिखाई दे रहे थे । अरसे बाद किसान तथा ज़मीन एक बार फिर मुख्य एजेण्डे पर थे और जनपक्षधर बुद्धिजीवियों की भी इसमें स्पष्ट सहभागिता थी। वाम तथा प्रगतिषील-जनवादी पत्र-पत्रिकाओं में ही नहीं मुख्यधारा की इण्डिया टुडे और आउटलुक जैसी पत्रिकाओं और जनसत्ता, इण्डियन एक्सप्रेस, नवभारत टाईम्स से लेकर क्षेत्रीय अखबारों तक में इन मुद्दों पर प्रमुखता से चर्चा हो रही थी और सरकार पर दबाव भी स्पष्ट परिलक्षित हो रहा था । भाजपा और कांग्रेस को छोड़कर लगभग सभी प्रमुख राजनैतिक दल, अपने वोट बैंक आधारों की चिन्ता में ही सही, इन मुद्दों पर धीरे-धीरे प्रखर हो रहे थे । राजद के विष्वस्त सहयोगी शरद यादव अगर खाद्य असुरक्षा का प्रश्न उठा रहे थे तो संप्रग के सबसे वाचाल सिपहसालार लालू प्रसाद तथा रघुवंश नारायण सिंह कृषि योग्य भूमि के औद्योगिक उपयोग का विरोध कर रहे थे । ज़मीनों के उचित मुआवजे़ के सवाल पर तो कृषि मंत्री शरद पवार और जयपाल रेड्डी भी सवाल उठा रहे थे... और इन सबका असर भी सतह पर दिखने लगा था । सेज़ पर पुनर्विचार तथा नयी परियोजनाओं पर लगी रोक इसका स्पष्ट प्रतिविंबन थी.....लेकिन यह सारा किस्सा नंदीग्राम से पहले का है । &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;नंदीग्राम ने सारे समीकरण पलट दिये । जहां एक तरफ विरोधियों की तलवारें धार-विहीन हो गई वही समर्थकों की बाछें खिल गई । पीछे हटते जा रहे सेज़ के पैराकारों को जैसे अचानक अमोघ अस्त्र मिल गया । अब सेज कहीं नहीं था। अखबारों के पन्नों पर, पत्रिकाओं के कालमों में, समाचार चैनलों के रूपहले पर्दों पर बस नंदीग्राम था। रातोंरात पूरा पंूजीवादी मीडिया सेज़ का विरोधी हो गया गाजियाबाद, भुवनेष्वर, बंबई, श्रीगंगानगर, हरियाणा सब नेपथ्य में चले गये । अब सेज़ और नंदीग्राम, नंदीग्राम और बुद्धदेव भट्टाचार्य, बुद्धदेव भट्टाचार्य और वामपंथ सब पर्यायवाची थे । सेज़ के घोषित समर्थक नन्दीग्राम के किसानों के लिये आंसू बहा रहे थे । सेज के प्रथम स्वीकार के समय मंत्रिमण्डल की सदस्य रही ममता बनर्जी सेज़ विरोध का प्रतीक बन चुकी थी। परिणाम वही हुआ जिसका डर था- नंदीग्राम के कुहासे में जनता के प्रतिरोधों की चिंगारी दब गई और इन नीतियों के लागू होने की प्रक्रिया अबाध रूप से आरंभ हो गई । विरोध के नाम पर रह गया सिर्फ नंदीग्राम । हरियाणा में पर्यावरणवादियों के विरोध के बावजूद रिलांयस की परियोजना मंजूर हो गई, नवी मुंबई में बाज़ार से आधे से भी कम मुआवजे़ के बदले हजारों एकड़ जमीन मुकेष अंबानी को दे दी गई, मैसूर में नारायणमूर्ति की परियोजना को हरी झण्डी मिल गई और गुजरात में बिना किसी मुआवजे के कच्छ का समुद्रतट मछुआरों से छीन लिया गया (प्रसंगवष ये सारे मछुआरे मुसलमान थे) .... और यह सब ऐसे हुआ कि बस मक्खन से छूरी गुजर गई। कहीं कोई विरोध नहीं। वामपंथी कार्यकर्ताओं तथा बुद्धिजीवियों की जुबान पर ताला बनकर लटक गया नंदीग्राम । राजनैतिक दलों के लिये अपने वोट बैंक को संतुष्ट करने वाला लालीपाप बन गया नंदीग्राम और केन्द्र सरकार के हाथ में पहली बार वामपंथियों को साधने का एक मजबूत डंडा बन गया नंदीग्राम ।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;लेकिन इस संदर्भ में एक तीसरा पक्ष भी था । जिसकी भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है- क्रांतिकारी तथा सीपीएम विरोधी संसदीय वाम । यहां यह साफ़ कर देना ज़रूरी है कि स्वयं को वाम घोषित करने जैसे आधार को छोड़ दें तो इन्हें एक साथ रखने का कोई कारण नहीं है । कार्यनीति के आधार पर इसके तीन प्रमुख घटक बनाये जा सकते हैं पहला सरकार में शामिल अन्य वामपंथी दल जैसे सीपीआई, आर।एस.पी. वगैरह दूसरा नक्सलबाड़ी से प्रेरणा लेने वाले संसदीय तथा संसदविरोधी दल जैसे सीपीआई (एम.एल.) और सीपीआई (माओवादी) तथा तीसरा एसयूसीआई ।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;लम्बे समय से सीपीएम की सरपरस्ती में सत्ता सूख भोग रहे वाममोर्चे के घटकों का विरोध उनके रीढ़विहीन चरित्र के चलते हद से हद रस्मी ही कहा जा सकता है । हालांकि जिस तरह ए।बी।बद्र्वन ने देष के कई शहरों में जाकर सेज पर विरोध दर्ज कराया है, कहीं न कही सीपीएम के बड़े भाई वाले मनमानी रवैये से उपजा विक्षोभ साफ दिखाई दे रहा है लेकिन अपना अलग रास्ता चुनने या सेज़ के विरूद्ध व्यापक जनांदोलन खड़ा करने की इच्छाशक्ति अभी भी दिखाई नहीं देती ।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;जहां तक नक्सलबाड़ी की विरासत मानने वाले संगठनों का सवाल है तो नंदीग्राम में माकपा सरकार की जनविरोधी साजिश का सबसे पहले विरोध करने वाला यही खेमा था, लेकिन मीडिया के बनाये कथानक में इसे बड़ी आसानी से दरकिनार कर दिया गया । लेकिन अपनी सारी ईमानदारी के बावजूद इनका विरोध भी कारगर शक्ल लेता दिखाई नहीं देता । सीपीआई एम।एल। (विनोद मिश्रा ग्रुप) का तो प्रमुख सरोकार नंदीग्राम को नक्सलबारी दो साबित करना तथा ‘‘हम तो पहले से कह रहे थे’’ वाली शैली में सीपीएम को धिक्कारना ही लग रहा था । जितनी षिद्दत से यह संगठन 1857 को जनक्रांति साबित करने में लगा है उसका दसांष भी किसानों और मज़दूरों के व्यापक विरोध की संगठित तथा संचालित करने में लगाता तो परिदृष्य कुछ और होता । माओवादी दल भी नवजनवादी क्रांति की रूमानियत में कुछ इस क़दर डूबे हैं कि बाजार बनती जा रही दुनिया में जंगल तलाषे जा रहे हैं । जितना बलिदान इस दल ने किया है और जो दुर्दमनीय क्रांतिकारी स्पिरिट दिखाई है वह स्तुत्य है, परंतु वह समय आ गया है कि अपनी रणनीतियों पर पुर्नविचार किया जाये । ख़ैर, लब्बोलुआब यह कि यह घटक भी किसानों के संघर्ष को एक ठोस दिशा देने के बजाय संसदीय वामपंथ को गरियाने तथा उस पर अतिरिक्त अंक अर्जित करने में ही लगा रहा ।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;लेकिन सबसे खराब भूमिका रही एस।यू.सी.आई की । तेलंगाना से भी पहले महाबोध पा चुके शिवदास घोष का यह संगठन अपने अंध माकपा विरोध में सीधे- सीधे ममता बनर्जी के साथ ही खड़ा नहीं हुआ अपितु लाईमलाइट के लिये हर उचित अनुचित हरकत की। सवाल यह नहीं है कि माकपा का विरोध सही है कि नहीं। निष्चित तौर पर नंदीग्राम के विरोध के अलावा और कुछ नहीं किया जा सकता। लेकिन असली सवाल यह है कि जब देष भर में सेज़ के खिलाफ किसान संघर्षरत थे उस समय खामोष रहे लोगों के नंदीग्राम पर हो हल्ला मचाने के पीछे असली मंतव्य क्या थे ? क्या यह सच नहीं कि ऐसा करके वे दरअसल पूंजीवादी मीडिया के कुचक्र के ही सहभागी बन रहे थे? और हमारे पास यह मानने का ठोस कारण भी है-नंदीग्राम के बाहर की इनकी खामोशी ।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;इसीलिये, नंदीग्राम, इतना सीधा नहीं है । इसकी परतें हैं-बेहद महीन, बेहद उलझी। लेकिन सवाल सिर्फ उन्हें खोलने का नहीं है-सवाल है नंदीग्राम के मोड़ से आगे बढ़ने का। नंगे हो चुके चेहरों को इतिहास की गर्द के हवाले कर नई तैयारी के साथ एक लम्बी और फैसलाकुन जद्दोजे़हद का हिस्सा बनने का। यही एक सच है जो नंदीग्राम से पहले भी था और अब भी है ।   &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6821438566583405249-6982452092422447979?l=economyinmyview.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://economyinmyview.blogspot.com/feeds/6982452092422447979/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6821438566583405249&amp;postID=6982452092422447979' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6821438566583405249/posts/default/6982452092422447979'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6821438566583405249/posts/default/6982452092422447979'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://economyinmyview.blogspot.com/2009/08/blog-post_23.html' title='नंदीग्राम के सवाल'/><author><name>अशोक कुमार पाण्डेय</name><uri>https://profiles.google.com/116885901033264770599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh4.googleusercontent.com/-K5s3pyuRhYA/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAADcE/5R8Sp3ae2pk/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6821438566583405249.post-7134760709570484601</id><published>2009-08-16T10:41:00.000-07:00</published><updated>2010-01-10T21:08:00.677-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विकास'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='समयांतर'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='गरीबी'/><title type='text'>रोशन कंगूरों की स्याह बुनियाद</title><content type='html'>&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;विकास क्या है और इसके वास्तविक पैमाने कौन से होने चाहिए इसे लेकर एक सनातन बहस चलती ही रही है। लेकिन समाजवादी रूस के पतन के बाद जैसे-जैसे दुनिया भर में नवउदारवादी नीतियों का वर्चस्व स्थापित होता गया है विकास का अर्थ आर्थिक वृद्धि तक सीमित होता गया है। एक आम समझ यह बनी है कि अगर पूँजी की उत्पादकता लगातार बढ़ रही है और उद्योगपतियों की समृद्धि का स्तर सतत् ऊँचा उठ रहा है तो अर्थव्यवस्था का विकास हो रहा है। रहा सवाल आम लोगों और ग़रीब बहुसंख्या का तो उन्हें &lt;strong&gt;‘टपक बूंद (ट्रिकल डाऊन) सिद्धांत’ के भरोसे छोड़ दिया जाता है जिसके अंर्तगत यह मान्यता दी जाती है कि दीर्घकाल में समृद्धि की कुछ बूंदे रिस-रिस कर निचले संस्तरों तक भी पहुंचेंगी।&lt;/strong&gt; समानता का विचार तो ख़ैर यहाँ सिरे से ही गायब होता है लेकिन समृद्धि के आधारों के क्रमिक विस्तार के इस दीर्घकाल की अवधि होती कितनी है यह भी किसी को पता नहीं होता। इस सिद्धांत की अर्थषास्त्रीय व्याख्या तो एक अलग मसला है लेकिन अगर इसे अनुभव के आधार पर कसें तो भी इसमें तमाम झोल दिखाई देते हैं। विगत दो दशकों से चल रही नवउदारवादी नीतियों के फलस्वरूप उद्योगपतियों की आर्थिक समृद्धि के महासागर की बूंदे उस सबसे निचले संस्तर तक नहीं पहुंची हैं बल्कि वंचित जन का जीवनस्तर कई माामलों में तो और भी बदतर हुआ है।&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;अभी हाल ही में विश्व बाज़ार के बेताज बाद्शाह अमेरिका में ही स्थित दो अलग-अलग संस्थानों की रिर्पोटें सच के इस बदशक्ल चेहरे को बेपर्दा करती हैं। यहाँ यह स्पष्ट कर देना भी ज़रूरी है कि इसमें दुनिया भर के बाज़ारों में जारी मंदी का क़िस्सा शामिल नहीं है ; इन दोनो रिर्पोटों का अध्ययन काल इस परिघटना के सतह पर आने से पहले का है।&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;इनमें पहली रिपोर्ट आॅकलैण्ड स्थित ‘&lt;strong&gt;खाद्य एवं विकास नीति संस्थान’&lt;/strong&gt; के कार्यकारी निदेषक एरिक हाॅल्ट गिमनेज द्वारा प्रस्तुत ‘विश्व खाद्य संकटः इसके पीछे क्या है और इस बारे में हम क्या कर सकते हैं’ विश्व भर में व्याप्त खाद्य संकट के कारणों तथा इसके हल के लिए आवश्यक नीतिगत प्रयासों की पड़ताल करती है तो &lt;strong&gt;‘अंर्तराष्ट्रीय खाद्य नीति एवं शोध संस्थान&lt;/strong&gt; द्वारा प्रस्तुत दूसरी रिर्पोर्ट दुनिया भर के देषों के लिए बनाए गये ‘भूमण्डलीय भूख सूचकांक’ के जरिये भूख और कुपोषण की भयावह तस्वीर पेष करती है। &lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;गिमनेज अपनी रिपोर्ट के पहला अध्याय &lt;strong&gt;‘एक ख़ामोश सूनामी’&lt;/strong&gt; का आरंभ करते हैं एक बेहद अर्थवान टिप्पणी से: ‘&lt;em&gt;&lt;strong&gt;’लोग भूखे हैं और यह प्राकृतिक नहीं है’।&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt; खाद्य संकट की भयावहता का जिक्र करते हुए वह बताते हैं कि 1974 में विकासशील देषों में 5 करोड़ लोग भूखे थे और उस वर्ष आयोजित विश्व खाद्य सम्मेलन ने अगले दस सालों में दुनिया से भूख को पूरी तरह से समाप्त करने का प्रस्ताव पास किया था लेकिन 1996, 2006 और 2008 में यह लगातार बढकर क्रमश 8।3 करोड, 8.5 करोड़ और 8.62 करोड़ हो गई। यही नहीं, अब तक विकासशील और पिछड़ी अर्थव्यवस्थाओं में ही सिमटी यह बीमारी अमेरिका में भी पहुंच गई है। 2008 में वहाँ भूख के शिकार लोगों की संख्या 35 लाख (12 प्रतिशत) तक पहुंच गयी जबकि इस वर्ष सरकारी ख़जाने से पोषण कार्यक्रमों के लिए कुल बज़ट 60 लाख डालर दिया गया! ऐसे में एशिया और अफ्रीका के हालात कोई भी समझ सकता है ( इस पर विस्तार से चर्चा आगे अंर्तराष्ट्रीय खाद्य नीति एवं शोध संस्थान द्वारा प्रस्तुत दूसरी रिर्पोर्ट के संदर्भ में की जायेगी )।&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;गिमनेज इसके कारणों की सटीक तलाश करते हैं। &lt;strong&gt;पहली बात तो यह कि इसका जनसंख्या वृद्धि से कोई लेना-देना नहीं है। &lt;/strong&gt;पिछले वर्षों में हमेशा यह तर्क दिया जाता रहा कि जनसंख्या बढने की तेज़ ऱतार के चलते खाद्यान्नों का उत्पादन पिछड़ जाता है लेकिन विगत चार वर्षों में जहाँ जनसंख्या की वार्षिक वृद्धि दर 1.14 प्रतिशत रही वहीं अनाज का उत्पादन 2 फीसदी सालाना की दर से बढ़ा। वल्र्ड हंगर प्रोग्राम के कार्यकारी निदेषक जोसेट शीरन कहते हैं कि &lt;strong&gt;‘‘ पहले से ज्यादा लोग अब भूखे हैं। अनाज भरा पड़ा है लेकिन लोग खरीद नहीं पा रहे हैं।’’&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;strong&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;इसलिए अगर प्रति व्यक्ति खाद्यान्न उपलब्धता में कमी आई है तो फिर कारण अन्य हैं। कारण हैं - जनविरोधी नीतियां, गैरबराबरी आधारित व्यापार संबंध और विकास की गलत अवधारणा। गिमनेज का मानना है कि वर्तमान खाद्यान्न संकट के लिए बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ निम्मेदार हैं। कृषि में उनके बढ़ते हस्तक्षेप से किसान तबाह हो रहे हैं। ब्रेटनवुड्स समझौते से प्राप्त अकूत ताक़त से इन्होंने कृषि उत्पादों से लेकर खाद, बीज, कीटाणुनाषकों और उत्पादन तकनीकों तक पर कब्ज़ा कर लिया है और इसका प्रयोग कर अपार लाभ कमाया है। बाज़ार से कृषि को जोड़ने का कोई लाभ कम से कम एषिया और अफ्रीका के ग़रीब किसानो को तो नहीं ही मिला है। इसका दूसरा पक्ष है अनाजों की क़ीमतों में भारी वृद्धि। मार्च 2008 में विष्व बाज़ार में गेंहू का दाम पिछले साल की तुलना में 130 फ़ीसदी, सोया का 87 फ़ीसदी चावल का 74 फ़ीसदी और मक्के का 31 फ़ीसदी बढ़ गया। पिछले तीन वर्षों में अनाजों के विष्व मूल्य सूचकांक मंे 83 फ़ीसदी की बढ़ोत्तरी हुई जबकि पिछले तीन महीनों में यह वृद्धि 45 फ़ीसदी की हुई जिससे यह सूचकांक 1845 में अपने निर्माण से अब तक के सबसे ऊँचे स्तर पर पहुंच गया। इसका सीधा परिणाम आम आदमी की क्रय षक्ति के सतत संकुचन रूप में सामने आ रहा है। लोग अनाज के रूप में अपनी सबसे प्राथमिक ज़रूरत को पूरा करने में भी असमर्थ हैं नतीजा भूख से पीड़ित और कुपोषित लोगों की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि। इसी तथ्य का प्रतिबिंबन अंर्तराष्ट्रीय खाद्य नीति एवं शोध संस्थान द्वारा प्रस्तुत रिर्पोर्ट में होता है।&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;इस रिर्पोर्ट में वर्ष 2001-2006 के आँकड़ों के आधार पर विभिन्न देषों को कुपोषण तथा भूखमरी के आधार पर क्रमवार व्यवस्थित किया गया है। इसके लिए एक ‘भूमण्डलीय भूख सूचकांक’ बनाया गया है और 1990 के आधार वर्ष पर विभिन्न देषों को शून्य से सौ तक के पैमाने पर रखा गया है और सबसे ख़राब स्थिति वाले 88 देषों को चिन्हित किया गया है। इस सूचकांक के निर्धारण लिए तीन आधार लिए गए हैं- पहला, कुपोषण की षिकार जनसंख्या का अनुपात, दूसरा पाँच साल से कम उम्र के कुपोषित बच्चों का अनुपात और तीसरा इसी उम्र के बच्चों की मृत्यु दर। इस अध्ययन में अन्य देशों के साथ-साथ भारत के संदर्भ में भी अनेक महत्वपूर्ण निष्कर्ष सामने आये हैं जिनसे इस अवधि में दुनिया भर में बढ़ती हुई असमानताओं और पूंजी के सतत संकेन्द्रण के चलते निचले संस्तरों की बढ़ती जा रही बदहाली के स्पष्ट प्रमाण मिलते हैं। &lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;इस अवधि में विश्व की कुल मिलाकर स्थिति सुधरी है। 1990 के 15।2 से बढ़कर दुनिया के लिए इस सूचकांक का स्तर 2008 में 18.7 हो गया है। लेकिन इसका वितरण बेहद असमान रहा है। सबसे बुरी स्थिति सब-सहारा देषों तथा दक्षिणी एषिया के देषों की है जहाँ इस सूचकांक का मूल्य क्रमषः 23.3 तथा 23.0 है। कांगो, इरीट्रिया, बरण्डी, नाईजर, सियेरा लियेन, लिबेरिया, इथियोपिया जैसे देषों में हालात पहले से भी बद्तर हो गये हैं जबकि कुवैत, पेरू, सीरिया, तुर्की, मैक्सिको और क्यूबा में स्थिति में सबसे ज्यादा सुधार हुआ है। &lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;भारत के संदर्भ में इस अध्ययन के नतीजे चैंकाने वाले हैं। वैष्विक परिदृष्य पर नायक की तरह उभरने के दावों के बीच भारत इस रिर्पोर्ट में शामिल सबसे बदतर स्थिति वाले 88 देषों में 66वें क्रम पर है। यहाँ 2 करोड़ से भी अधिक भूखे तथा कुपोषित लोग रहते हैं और इस तरह यह दुनिया की सबसे बड़ी कुपोषित आबादी का घर है। विकसित पष्चिमी देषों और चीन कोे तो छोड़िये हमारा क्रम मंगोलिया, म्यानमार, श्रीलंका, कीनिया, सूडान और पाकिस्तान के भी बाद आता है। देष के प्रमुख 17 प्रदेषों, जिनमें लगभग 95 फ़ीसदी जनसंख्या निवास करती है, के विषद अध्ययन के दौरान प्राप्त राज्यवार आँकड़े तो और भी चैंकाने वाले हैं। इनमें से कोई भी प्रदेष ऐसा नहीं जिसे सामान्य या फिर निम्न स्तर पर भूख तथा कुपोषण प्रभावित कहा जा सके। जहाँ सबसे बेहतर प्रदर्शन पंजाब का है वहीं मध्यप्रद्श की स्थिति सबसे बुरी है।&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;राज्यवार स्थिति का थोड़ा और विष्लेषण करें तो यह अध्ययन राज्योें को तीन श्रेणियों में बांटता है। पंजाब, असम, केरल और आंध्र प्रदेष क्रमश पहले तीन स्थानों पर हैं और इन्हें गंभीर रूप से प्रभावित क्षेत्रों में रखा गया हैजिनके लिए सूचकांक 20 से नीचे पाया गया। दूसरी श्रेणी में सूचकांक 20 और 29।9 के बीच हरियाणा, राजस्थान, पष्चिम बंगाल, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेष, महाराष्ट्र, कर्नाटक, उड़ीसा, गुजरात, छत्तीसगढ़, बिहार, और झारखण्ड को भयावह स्थिति वाले क्षेत्रों के रूप में चिन्हित किया गया है और अत्यंत ख़तरनाक रूप से प्रभावित क्षेत्र के रूप में मध्यप्रदेष को जहाँ सूचकांक 30.9 पाया गया। दूसरे शब्दों मे कहें तो जहाँ पंजाब की स्थिति 33 अन्य विकासशील देशों के जैसी ही है वहीं बिहार और झारखण्ड के हालात जिम्बाबवे और हैती से भी बदतर हैं और मध्यप्रदेश की हालत इथियोपिया और चाड के बीच की!&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;इस स्थिति के मूल में वही सारे मसाईल हैं जिनका जिक्र गिमनेज़ ने अपनी रिर्पोर्ट में किया है। विकास के नवउदारवादी माॅडल से बहिष्कृत लोगों की जिंदगी दिन ब दिन बदतर होती गई है। कृषि को बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हाथों में सौंपने के तमाम विनाषकारी परिणामों ने अनाज़ को आदमी से दूर कर दिया है। चंद्रयान भेजने और विकास के नित नये कंगूरे सजाने की होड़ में बुनियाद की स्याहियों को नज़रअंदाज किया जा रहा है। इस मुक्त बाज़ार में जहाँ मुद्रा को पर लग गये हैं वहीं श्रम की जं़ज़ीरें और मज़बूत हुई हंै फलस्वरूप न तो रोज़गार बढ़ रहे हैं न ही वास्तविक श्रम मूल्य। और अगर इसमें विष्वव्यापी मंदी के असर को भी जोड़ दें तो एक बेहद ख़ौफनाक पसेमंज़र दिखाई देता है जिसमें उस ‘जादूई बूंद’ के इंतजार में टकटकी लगाये दम तोड़ते लोगों की लंबी कतारें हैं। &lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;&lt;em&gt;पुनश्च - अभी हाल में संघ ने हिंदू सम्मान की रक्षा के लिए चार बच्चे पैदा करने की सलाह दी है। मौलाना लोग भी ऐसी सलाहें बाँटते ही रहते हैं। सुदर्शन जी और उनके मौलाना भाई जानते हैं कि ये भूखे-नंगे-बीमार लोग सबसे ज्यादा उन्हीं के काम आते हैं खा़सकर तब, जब दुनिया को बदलने का दावा करने वाले पस्तहिम्मती का षिकार हों। वैसे जानते तो यह हम भी हैं।&lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6821438566583405249-7134760709570484601?l=economyinmyview.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://economyinmyview.blogspot.com/feeds/7134760709570484601/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6821438566583405249&amp;postID=7134760709570484601' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6821438566583405249/posts/default/7134760709570484601'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6821438566583405249/posts/default/7134760709570484601'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://economyinmyview.blogspot.com/2009/08/blog-post_16.html' title='रोशन कंगूरों की स्याह बुनियाद'/><author><name>अशोक कुमार पाण्डेय</name><uri>https://profiles.google.com/116885901033264770599</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh4.googleusercontent.com/-K5s3pyuRhYA/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAADcE/5R8Sp3ae2pk/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6821438566583405249.post-5248746172597119931</id><published>2009-08-16T08:03:00.000-07:00</published><updated>2009-08-16T08:06:11.346-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पहली पोस्ट'/><title type='text'>आर्थिक मुद्दों को समर्पित यह ब्लॉग</title><content type='html'>मित्रों&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;यह ब्लॉग आर्थिक विषयों को समर्पित होगा।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6821438566583405249-5248746172597119931?l=economyinmyview.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://economyinmyview.blogspot.com/feeds/5248746172597119931/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6821438566583405249&amp;postID=5248746172597119931' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6821438566583405249/posts/default/5248746172597119931'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6821438566583405249/posts/default/5248746172597119931'/><link rel='alternate' type='text/html' 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